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त्रयी की अंतिम कड़ी (डॉ गिरिधारी राम गोन्झू) भी टूट गई : संजय कृष्ण

त्रयी की अंतिम कड़ी भी टूट गई

-संजय कृष्ण

 

डाॅ गिरिधारी राम गौंझू का निधन कोई मामूली घटना नहीं है। वे हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की भेंट चढ़ गए। अब नेता मातम मना रहे हैं। वे कोई सामान्य आदमी नहीं। झारखंड का चलता-फिरता इनसाक्लोपीडिया थे। वे उस त्रयी की अंतिम कड़ी थे। पहले डाॅ रामदयाल मुंडा गए, फिर बीपी केशरी और अब दोनों के साथ कदम मिलाकर चलने वाले गौंझू जी भी विदा हो गए। झारखंड के बौद्धिक आंदोलन वह जीवित कड़ी भी आज टूट गई। वे ज्ञान के पुंज थे, पर उतने ही सरल और सहज। नए से नए शोधार्थियों की मदद को हमेशा तत्पर। उन्होंने अपना पूरा जीवन झारखंड की कला-संस्कृति के अध्ययन और उसकी पहचान को लेकर समर्पित रहा। गीत-संगीत से लेकर मौखिक साहित्य तक। उन्हें हम सिर्फ नागपुरी साहित्य तक सीमित नहीं कर सकते। हिंदी में उन्होंने झारखंडी संस्कृति समाज को लाकर एक वृहतर समाज से रूबरू कराया।

गौंझू जी ने पीटर शांति नवरंगी के व्यक्त्वि और कृतित्व पर शोध किया था। यह पुस्तक 1990 में प्रकाशित हुई। इसका पुरोवाक् डाॅ रामदयाल मुंडा ने लिखा था। उनके शब्द थे-‘‘हमारा विश्वास है कि झारखंड प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को उजागर करन की दिशा में यह शोध प्रबंध अत्यंत ही महत्वपूर्ण प्रमाणित होगा।’’ गिरिधारी जी का एक महत्वूपर्ण काम था डाॅ जयपाल सिंह मुंडा के जीवन पर नाटक। इसके काफी मंचन हुए रांची से लेकर जमशेदपुर तक। इसके बाद उनकी लेखनी चलती तो रही, लेकिन कोई कृति प्रकाशित नहीं हुई। लेकिन छिटपुट काम चलता रहा। जब वे जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के विभागाध्यक्ष बने तो
काम का बोझ काफी बढ़ गया, लेकिन रचनात्मकता जारी रही। पत्र-पत्रिकाओं में उनकी उपस्थिति आश्वस्त करती थी।

इधर, उनकी एक के बाद किताबें झारखंड झरोखा से आई। कुछ पाठ्य पुस्तके हैं जिनमें नागपुरी सीखें हैं तो नागपुरी प्रकीर्ण साहित्य भी है, जिसमें मुहावरे, कहावतें, पहेलिां, मंत्रा औ खेलगीत शामिल हैं। इसके साथ नागपुरी के प्राचीन कवि उनकी बहुत महत्वपूर्ण कृति है। महाराजा मदरा मुंडा हिंदी व नागपुरी में है। उरांव एवं सदान संस्कृति को एक नए सिरे से देखते हैं। झारखंड की सांस्कृतिक विरासत हम अपने सूबे की सांस्कृतिक वैशिट्य से परिचित हो सकते हैं। ये सब किताबें हाल में आई हैं।

अवकाश ग्रहण के बाद वे अपनी चीजें लगातार सहेज रहे थे और उन्हें किताब की शक्ल दे रहे थे। इसकी का परिणाम है- झारखंड की पारंपरिक कला, अंगना, झारखंड का लोकसंगीत आदि पुस्तकें। झारखंड के गीत, संगीत और नृत्य पर उनकी कई छोटी-बड़ी पुस्तकें हैं।

वे झारखंड के सामासिक संस्कृति के हिमायती थे, जिनमें सदानों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। उनके असमय जाने से झारखंड की अपूरणीय क्षति ही नहीं हुई, जिसकी भरपाई संभव नहीं, उनका जाना एक युग के समाप्ति की घोषणा है। वे सहज, सरल और मिलनसार थे। भीतर कोई मैल नहीं। जो अंदर था, वही बाहर था। 13 को जब फोन किया कि सरहुल पर लेख भेज दीजिये, ना नहीं कहा। बस बोले घुटने से परेशान हूं। दर्द काफी बढ़ गया है। वे कई सालों से पीड़ित थे तब भी हर सार्वजनिक कार्यक्रम में हाजिर हो जाते।

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