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हिंदू राष्ट्र बनाम लूटतंत्र की मजबूती : उषा सिंह

हिंदू राष्ट्र बनाम लूटतंत्र की मजबूती

—उषा सिंह

लंबे समय से देश में साजिश चल रही है कि हिंदू राष्ट्र की अवधारणा गलत नहीं है। योगी आदित्यनाथ,साक्षी महाराज और अन्य मंहतों की राय से हिंदू राष्ट्र की माँग के लिए संविधान में संशोधन की माँग कर चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट भी हिंदूत्व को ‘वे ऑफ लाइफ बताता है। हिंदूत्व शब्द ही सावरकर की देन है। इसका हिंदू धर्म से कोई संबंध नहीं है। समाजवादी इसे देश के टुकड़े टुकड़े होना मानता है। वेद पुराणों में कहीं भी हिंदू धर्म का जिक्र तक नहीं किया गया है और इसे ‘सनातन धर्म’ कहा गया है। बाद में इसे हिंदू धर्म से जोड़ना और पीढ़ियों से लोगों के जेहन में इसे परंपरा स्वरूप फिट कर देना ही लूटतंत्र है।

आज देश आंदोलित है किसान सड़कों पर है, युवा बेरोजगार हैं, मजदूर के घर आटा नहीं है। महँगाई एक बीमारी बन चुकी है जो जल्द ही महामारी का रूप लेगी। और, सब कुछ इस देश में होते हुए सबकी गुलामी तय है।

इस देश में हिंदू राष्ट्र की माँग करने वाले पड़ोसी देश जो हिंदू राष्ट्र का दंश झेल चुका है और बड़ी मशक्कत से कम्युनिस्ट पार्टी ने उन्हें इससे निजात दिलायी थी, को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। क्योंकि उनके राजघरानों से इनके पुराने संबंध रहे हैं और वहीं से ये धर्म के नाम पर लूट (राम-सीता) वाला कॉंसेप्ट आया है। विवाह-शादियों को खूब तरजीह देकर ये संबंध और भी मजबूत बनाये गए हैं। और इसमें सबसे बड़ा धर्म का लबादा औढ़ाया गया है “गो-रक्षा” के नाम पर और दुनिया जानती है बीफ का व्यापार किन देशों में मजबूती से पनप रहा है।

हिंदू राष्ट्र पड़ोसी देशों का कचरा यहाँ महानगरों में देखा जा सकता है जो आधुनिकता और विकासशील होने का दंभ भरता है। यहाँ के लोगों को रूढ़िवादी और अज्ञानी बता कर खूब शोषण करता है। क्योंकि उनके अंदरूनी संबंध इस देश के साथ मजबूत है। आज का ताजा उदाहरण, पेट्रोल की स्मगलिंग सामने है।

देश को इन थाईलैंडियों के लूटतंत्र से बचाने के लिए सबसे पहले पढ़े-लिखे युवाओं को आगे आना होगा जो भगत सिंह के वंशज होने का दावा करते हैं। और कुछ शिक्षा के बूते खुद को शोषण से निजात पा लेने का दंभ भरते हैं जबकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि हिंदू राष्ट्र उनके लिए सिवाय ठोकरें मारने के कुछ भी रहम नहीं रखता है।

भ्रष्टाचार और महँगाई इतनी ज्यादा होगी की उनके लिए आरक्षण नाम की मिठाई धरी रह जाएगी। देश के सामने जो मौजूदा हालात किसान आंदोलन है जो सबसे बड़ी चुनौती है। आखिर किन लोगों को इस आंदोलन से दिक्कत है और क्यूँ है ? यह समझना और समझाना बेहद जरूरी है। वे लोग जो लुट के लिए शरणार्थी बनकर आये हैं या शरणार्थियों के वंशज है, उन्हें कोई मतलब ही नहीं है मजदूर-किसान से क्योंकि न तो उनकी जमीनें है न ही जमीर।

इनके वंशज यानि के जो यहाँ अपनी ही जातियों के बेकार, निट्ठले, चोर लूटेरे आरएसएस के दल्ले इन शरणार्थियों से पैदा हुई औलादें आज के “रांगड़” है। इन रांगड़ो में कोई हमदर्दी नहीं है। ये सिर्फ अपना स्वार्थ सिद्ध करने को तत्पर रहते हैं दोगलापंथी व्यापत है इनमें पूरी तरह। ताकि अपने मंसूबों को अंजाम दे सके, किसी भी तरीके से और इस देश के पीढ़ियों से मजबूत भाईचारे को बाँटते आये हैं कभी खालिस्थानी के नाम पर कभी हिंदू-मुस्लिम के नाम पर।

जो आज किसान आंदोलन इस साजिश का पर्दाफास कर रहा है। किसान आंदोलन को जातीय भेदभाव में न बाँट कर मजबूती से सबके साथ आने की जरूरत है। क्योंकि ये रांगड़ ही है जो हिंदू राष्ट्र के पक्षधर हैं। और रांगड़ो तुम भी होश में आओ, वक्त रहते संभल जाओ थाईलैंडी कल्चर तुम्हारे परिवार खत्म कर चुका है तुम्हारे रोजगार खत्म हो रहे हैं। बाज आओ इन रंगिनियों से, छुपे हुए पूँजीवादियों…। (लेखक के निजी विचार हैं)

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