साहित्य जगत

‘दशानन रावण’ नया उपन्यास डॉ0 स्नेह ठाकुर : डॉ0 दीपक पाण्डे

डॉ दीपक पाण्डे
डॉ दीपक पाण्डे
— डॉ दीपक पाण्डे

कनाडा में 1967 से निवास कर रहीं डॉ.स्नेह ठाकुर हिन्दी साहित्य की विविध विधाओं में साहित्य का सृजन कर रही हैं, ‘श्रीरामप्रिया सीता’, ‘लोक-नायक राम’ और ‘काइकेयी:चेतना-शिखा‘ उपन्यासों के क्रम में आपका नया उपन्यास ‘दशानन रावण‘ प्रकाश में आया है।

इस उपन्यास के संदर्भ में डॉ स्नेह ठाकुर से प्रश्न का उत्तर मिला वह आप सभी के पठनार्थ —

‘दशानन रावण’ लिखने का उद्देश्य क्या रहा और आपने इसकी कथा को कैसे सन्योजित किया है ?
स्नेह ठाकुर : “दशानन रावण” लिखने का उद्देश्य एक ही व्यक्ति में दोहरा चरित्र, एक ही व्यक्ति के दो व्यक्तित्व अपनी चरम सीमा तक दर्शाना है। सामान्यत: कोई भी व्यक्ति न सम्पूर्ण बुरा है न सम्पूर्ण अच्छा। रावण के सन्दर्भ में भी कुछ ऐसा ही है। यह भी मान्यता है कि संतान पर पिता से अधिक माँ का प्रभाव पड़ता है, रावण के सन्दर्भ में तो यह शत-प्रतिशत सटीक बैठता है। इसी सन्दर्भ में “दशानन रावण” से ही उद्धृत कर रही हूँ–
……..एक बार अतीत की बीथिकाओं में रावण जो घुसा तो वहीं अपने दसों आनन के साथ दशानन विचरता ही गया। स्मृति का एक द्वार खुला तो जन्मों के द्वार खुलते चले गये। विगत जन्मों के दृश्य दृश्य-पटल पर उभरते चले गये। अपना राजा प्रताप भानु कारूप सामने आया जब वे वेद सम्मत उत्तम रीति से अपने वीर, आज्ञाकारी भाई अरिमर्दन एवं राजा का हित करने वाले और शुक्राचार्य के समान बुद्धिमान् मंत्री धर्मरुचि के साथ प्रजा पालन कर रहे थे। उनके राज्य में पाप का लेश-मात्र भी नहीं था। अपनी भुजाओं के बल पर सातों द्वीपों, भूमि-खण्डों को विजित कर वह चक्रवर्ती राजा बन गया था। वेद-पुराणों में बताये गये यज्ञों को निष्काम-रूप से, प्रेमपूर्वक भगवान् वासुदेव को अर्पित करते हुये, बारम्बार किये। स्मृति में उभरा – प्रताप भानु एक दिन गहन वन में आखेट हेतु गये जहाँ उसने एक विशालकाय सुअर को देखा जो अपने दाँतों के कारण ऐसा दिखाई पड़ रहा था मानों चंद्रमा को मुँह में पकड़े हुये, उसे ग्रस कर राहु वन में आ छिपा है। चंद्रमा का आकार बड़ा होने के कारण उसके मुँह में समा नहीं रहा है, और वह क्रोधवश उसे उगल भी नहीं रहा है। न निगला जाये, न उगला जाये की स्थिति है।

आखेटक की मार से बचता हुआ वह ऐसी कन्दरा में घुस गया जहाँ से उसे निकालना सम्भव न जान राजा पलट कर वापस जाने लगा पर दुर्भाग्यवश वह रास्ता भटक गया। बहुत परिश्रम करने से थका हुआ और घोड़े समेत भूख-प्यास से व्याकुल राजा नदी-तालाब खोजता-खोजता एक आश्रम में पहुँचा जहाँ उसे उसके द्वारा पराजित किये गये छद्म मुनि भेष धरे एक राजा ने वन में भूखे-प्यासे भानु प्रताप को पहचान कर, अपना कपटी रूप बनाये हुये ही बुरे मन्तव्य से एक कुचक्र के अन्तर्गत उसकी सहायता की। राजा प्रताप भानु से अपनी पराजय का बदला लेने हेतु अपना रूप छिपाये हुये ही कपटी मुनि ने अध्यात्म के वाग्जाल में राजा प्रताप भानु को फँसा, एक यज्ञ हेतु ब्राह्मणों को निमंत्रित करने हेतु कहा। कपटी तपस्वी का मित्र और प्रताप भानु का एक अन्य छल-प्रपञ्च जानने वाला शत्रु कालकेतु राक्षस जो सुअर का रूप धर राजा को आश्रम तक भटका कर ले आया था, मंत्रणापूर्वक निश्र्चित समय जान पुरोहित का भेष धर प्रताप भानु के राज्य में पहुँच गया। प्रताप भानु ने पूर्व-निर्णयानुसार मुनि द्वारा बताये छद्म पुरोहित के वर्णित रूप में मुनि को ही समझ उसका स्वागत किया। पुरोहित बने कालकेतु राक्षस ने उस आयोजन में आमंत्रित ब्राह्मणों के लिये छ: रस और वेद-वर्णित चार प्रकार के भोजन की मायामयी रसोई में अनगिनत व्यंजनों के साथ-साथ पशु-माँस एवं नर-माँस भी सम्मिलित कर दिया। ज्यों ही राजा प्रताप भानु भोजन परोसने लगे, आकाशवाणी हुयी, “हे ब्राह्मणों ! उठ-उठकर अपने घर जाओ। यह अन्न मत खाओ। इसमें बड़ी हानि है। रसोई में ब्राह्मणों का माँस बना है”। और तब ब्राह्मणों ने क्रोधित हो प्रताप भानु को श्राप दे दिया, “तू परिवार सहित राक्षस हो जा”।

दशानन रावण स्मृतियों के बीहड़ जंगल में एक बार जो घुसा तो वहाँ से निकल नहीं पा रहा था। पिछली सोच कभी इस करवट तो कभी उस करवट नागिन-सी उलट-पलट उसे डस रही थी।
…..”स्मृति ने पलटा खाया। थकी देह की ग्रीवा पर लटका सिर स्वत: ही बिन प्रयास पीठिका की पीठ पर टिक गया और एक अधूरा-सा उच्छ्वास खूँटा तुड़ाये नवजात बछड़े की भाँति बिचक कर मुँह के बंधन से छूट भागा। उच्छ्वास में छिपी चैन की साँस जब तक एक अचिन्तनीय दीर्घ श्वास में परिवर्तित होती कि एक और स्मृति स्मृतियों की दौड़ में दौड़ी आयी और झटककर स्मृतिपटल पर सर्वाधिकार कर उभर उठी। दृश्य उभरा सनकादि मुनि का क्रोधाग्नि से तमतमाया राक्षस बनने का श्राप देता हुआ मुख जब उसने विष्णु जी के द्वारपाल के रूप में उन्हें अन्दर जाने से रोक दिया था….स्मृति और अधिक गहराती कि कक्ष के झरोखे पर बैठा पंछी फड़फड़ाया। रावण का ध्यान भंग हुआ। दशानन रावण अतीत के गह्वर से निकल वर्तमान की धरा पर आ खड़ा हुआ। वह सोचने लगा, “आज मेरी बहन ने सभागार में मेरे ऊपर जो आरोप लगाये थे वो वास्तव मेें सत्य ही तो हैं। हाँ ! मैं मदान्ध हूँ, अहंकारी हूँ, क्रूर हूँ, स्वार्थी हूँ”….जो कुछ शूर्पणखा ने नहीं भी कहा वे आरोप भी उसने स्वयं पर आरोपित कर लिये”।

  1. रावण सोचने लगा, “हाँ, मैं विश्रवा ऋषि का पुत्र हूँ। जो ब्रह्माजी के पुत्र पुलत्स्य, जो ब्रह्मा के समान ही सर्वगुण सम्पन्न थे, के पुत्र थे; और उन्हीं सर्वगुणसम्पन्न पुलस्त्य के पुत्र सर्वगुणसम्पन्न विश्रवा का पुत्र मैं हूँ। पर जहाँ पिता का ज्ञान मुझमें आया है वहीं क्या राक्षसी माँ कैकसी के अवगुणों से दूर रह पाया हूँ मैं ? क्या उनका असर मुझ पर नहीं पड़ा ? और फिर पिताश्री ब्रह्मर्षि विश्रवा ने तो मेरे जन्म से पहले ही मेरी माता से कह दिया था, “भद्रे ! तुम मेरे द्वारा पुत्र पाने की इच्छा लेकर इस दारुण बेला में यहाँ आई हो। अत: हे भद्रे ! तुम ऐसे पुत्रों को जन्म दोगी जो भयंकर राक्षसों से प्रेम करने वाले तथा भयंकर-विशाल स्वरूप वाले होंगे। हे सुश्रोणि ! तुम क्रूर कर्मा असुरों को ही जन्म दोगी”।

रावण को इसके प्रत्युत्तर में अपनी माँ के वचन भी याद आये – “भगवन ! आप जैसे परम तेजस्वी-ब्रह्मवेत्ता द्वारा मैं ऐसे दुराचारी पुत्रों को पाने की इच्छा नहीं रखती, अत: आप मुझ पर कृपा करें”।
रावण अपनी भाग्य-विडम्बना पर अट्टहास कर उठा। उसकी सोच का निरंकुश अश्व अपनी तीव्र गति से दौड़ पड़ा, “हाँ ! पिताश्री ने माँ को सांत्वनावश उसके अंतिम पुत्र को धर्मात्मा बनाने का आश्वासन तो दे दिया पर पहले दो पुत्रों के निर्णय पर दृढ़ रहे और इस प्रकार माँ कैकसी ने काजल के समान काले, भयंकर, वीभत्स, महाराक्षसी रूप वाले, नीले पर्वत के समान विशालकाय, विकराल दाँत, ताँबे जैसे होंठ, बीस भुजाओं वाले, दशग्रीव तथा चमकीले केशों वाले प्रथम पुत्र अर्थात् मुझे जन्म दिया। मेरा जन्म होते ही पृथ्वी पर अंधकार छा गया। उल्कापात होने लगा। भूकम्पों से पृथ्वी काँपने लगी। साथ ही माँसभक्षी गिद्ध, मुँह में अंगार भरे गीदड़ियाँ तथा पक्षी आदि चारों ओर घूमने लगे। मेघ बहुत भयंकर गर्जना करने लगे, देवतागण रुधिर की वर्षा करने लगे, सूर्य का प्रकाश कम पड़ गया। भयंकर आँधी चलने लगी, पृथ्वी हिलने लगी तथा कभी भी क्षुब्ध न होने वाला समुद्र क्षुब्ध हो गया। तभी ब्रह्मा के समान तेजस्वी पिता मुनि विश्रवा ने मेरा नामकरण करते हुये कहा, “यह बालक दशग्रीवाएँ लेकर पैदा हुआ है, इसलिये इसका नाम “दशग्रीव” होगा”। तो यह है मुझ दशानन की जन्म-कथा”।

दशानन रावण की सोच गहराती गई, “मेरे पश्चात् माँ कैकसी के उदर से विशालकाय कुम्भकर्ण ने जन्म लिया। कुछ समय के पश्चात् शूर्पणखा का जन्म हुआ और अंतत: उस धर्मनिष्ठ विभीषण ने जन्म लिया जिस धर्मात्मा के विषय में पिता विश्रवा ने पहले ही संकेत दे दिया था। मैं दशग्रीव दशानन रावण व कुम्भकर्ण ऋषि-मुनियों तक को कष्ट देने लगे और विभीषण शास्त्र अध्ययन व वेद-पाठन में संलग्न हो गया”।

दशानन रावण अपनी सोच में गहरे ही गहरे पैठता चला गया। सोच गहराती चली गयी। एक आह भर कह उठा, “आह ! ऊपर से कच्ची युवावस्था में राक्षस सोमाली का नाना के रूप में प्राप्त होना क्या आग में घी डालने के समान नहीं था ? क्या उसकी शिक्षाओं ने मुझ दशानन रावण के इस रूप को मढ़ने में कोई कसर छोड़ी है ? उनकी राक्षसी शिक्षा का क्या उस कच्ची उम्र में दुष्प्रभाव नहीं पड़ा ? क्या उस अवस्था में मेरे लिये उस प्रभाव से अछूता रहना सम्भव था ?”
उपर्युक्त प्रश्नों के दंश दशानन रावण को चुभते रहे पर वह इस चुभन की अवहेलना कर चुभन के उस जंगल में और भी गहरे पैठ अंदर ही अंदर धँसता चला गया। ऊपर से अपने विगत जन्मों की गाथा का स्वयं पर प्रभाव की बात सोच एक आह भर वह कह उठा, “इन सबके सम्मिश्रण से जो मेरा व्यक्तित्व गढ़ा गया है वह मेरे जैसा है इसमें क्या आश्चर्य है ? क्या ऐसा ही नहीं होना चाहिये था ? ऐसा न होना ही आश्चर्यजनक होता”।

रावण की स्मृति में कौंधा वह दिन जब तेज प्रदीप वाले कुबेर को पुष्पक विमान पर देख कर माता कैकसी ने रोष से विकल, वक्र दृष्टि से, एक दीर्घ आह भर कहा था, “अरे पुत्र ! तुम अपने परम तेजस्वी भाई वैश्रवण की ओर देखो। इसका तेज, इसका वायु के समान वेगवान् विमान देखो। भाई होने के कारण तुम्हें भी इन्हीं की तरह होना चाहिये। इसकी माता मन्दाकिनी को अवश्य ही इसे अपनी कोख से जन्म देने का गर्व होगा। मेरी सौत के कोख के रत्न कुबेर ने अपनी शिक्षा व तप से अपनी माता के विमल वंश को अपने जन्म से और भी उज्जवल बना दिया है। पर तू तो मेरे गर्भ का कीड़ा है। केवल अपना पेट भरने में ही लगा हुआ है। अरे ! तुझे तो घोर परिश्रम करना चाहिये ताकि कुबेर के समान बन जा”।

“हूँ, किस तपस्या से इन्हें ऐसा विमान प्राप्त हुआ है माँ ?” दशानन की दृष्टि कुबेर की शिक्षा, उसके गुणों पर नहीं थी, उनकी अपेक्षा वह उनके विमान से अत्यधिक प्रभावित था।
“कुबेर ने अपनी तपस्या से भगवान् शंकर को संतुष्ट करके लङ्का का निवास, मन के समान वेगशाली विमान तथा राज्य और सम्पत्तियाँ प्राप्त की हैं। संसार में वही माता धन्य, सौभाग्यवती तथा महान् अभ्युदय से सुशोभित होने वाली है, जिसके पुत्र ने अपने गुणों से महापुरुषों का पद प्राप्त कर लिया हो”।

मुनि का बड़ा पुत्र कुबेर, दशग्रीव का बड़ा भाई कुबेर, दोनों एक ही पिता की संतान ! दशानन भयंकर ईर्ष्या से जलने लगा। क्रोधित हो बोला, “अरे माँ ! मैं तेरे गर्भ का कीड़ा नहीं हूँ। कीड़े-की सी हस्ती रखने वाला तो यह कुबेर है। अरे ! ऐसा क्या महत्वपूर्ण है यह ? ऐसी कौन-सी विलक्षण वस्तुएँ है इसके पास ? इसकी थोड़ी-सी तपस्या किस गिनती में है जिसे तुम इतना श्रेय प्रदान कर रही हो ? लङ्का की क्या बिसात है ? बहुत थोड़े-से सेवकों वाला इसका राज्य भी किस काम का है ? माता ! मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं इससे अधिक प्रतापशाली बनूँगा। यदि मैं अन्न, जल, निद्रा और क्रीड़ा का सर्वदा परित्याग करके ब्रह्माजी को सन्तुष्ट करने वाली दुष्कर तपस्या के द्वारा सम्पूर्ण लोकों को अपने वश में न कर लूँ तो मुझे पितृलोक के विनाश का पाप लगे”।

“दशानन रावण” लिखने का परम उद्देश्य श्री राम द्वारा दी गई गुण-ग्राह्यता की महान् शिक्षा भी है। साथ ही क्षम्यता, उदारता का उत्कृष्ट उदहारण कि मारे गए हर राक्षस को मोक्ष देने में भी श्रीराम नहीं चूके थे। क्योंकि उनकी मान्यता कि “वैमनस्य बुराई से था, व्यक्ति विशेष से नहीं” उनके चरित्र का एक बहुत ही सर्वोच्च आदर्शमय कीर्तिमान स्थापित करता है।

श्रीराम की महानता और व्यक्ति की दुर्बलता, इन्हीं दोनों पक्षों से “दशानन रावण” रचित हुआ है। श्रीराम की आदर्श की पराकाष्ठा पर बैठी महानता और रावण की लक्ष्य को हर हाल में पाने की दुर्बलता, शोधपूर्ण प्रमाणित तथ्यों के आधार पर “दशानन रावण” की रचना का आधार-स्तम्भ बना है। पुरुषोत्तम श्रीराम ने उस राक्षसराज रावण जिसने व्यक्तिगत् रूप से उन्हें अत्यधिक दारुण पीड़ा दी, के गुणों को सराहने में अंशमात्र भी कोताही नहीं की, वरन् बिना किसी द्विविधा के यह आदर्श उपस्थित किया कि गुण गुण है और वह कहीं भी हो, ग्राह्य है। गुण कहीं से भी, किसी से भी, हर स्थान से, हर परिस्थिति में स्वीकार्य होना चाहिए। श्रीराम के चरित्र की यह नीर-क्षीर विवेकी महानता उन्हें ईश्वरत्व प्रदान करती है – जहाँ दुष्प्रवृत्ति वाले निन्दित राक्षसराज दशानन रावण की भर्त्सना की, वहीं उसके ज्ञानमय गुणों की सराहना भी।
“राम अनन्त अनन्त गुन अमित कथा बिस्तार।
सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल विचार॥”

रावण के आखिरी क्षणों के बारे में एक कहानी, दंतकथा ही नहीं, एक लोक-विश्वास, एक लोक-कथा, जनारूढ़ि प्रचलित है। वह अपने जमाने का निस्‍संदेह श्रेष्‍ठ विद्वान माना गया था। एक वीर योद्धा माना गया था। रक्ष-संस्कृति की विस्तारवादी नीति के शासक के रूप में दशानन रावण की दसों दिशाओं की ओर जाती बुद्धि उसे हर ओर से भिज्ञ रखती थी। हालाँकि उसने अपनी विद्या का, बुद्धि का, पराक्रम का गलत उपयोग किया, फिर भी बुरे उद्देश्‍य परे रख मनुष्‍य जाति के लिये उस विद्या का संचयन आवश्‍यक था। इसलिये श्रीराम ने दशानन रावण के अंतिम समय में उसके पास अनुज लक्ष्‍मण को उससे राजनीति-शिक्षा लेने हेतु भेजा। लक्ष्मण के प्रश्न का कोई भी उत्तर न दे रावण मौन रहा। लक्ष्‍मण निरुत्तर ही श्रीराम के पास वापस आ गये। पूछे जाने पर उन्‍होंने अपने बड़े भाई से अपनी निरुत्तरता, अपनी असफलता का कारण रावण का अहंकार बताया। श्रीराम ने वहाँ जो हुआ था उसका पूरा विवरण जानना चाहा, परिस्थिति से अवगत होना चाहा, अत: सम्पूर्ण वस्तु-स्थिति पूछी। तब उन्हें ज्ञात हुआ कि प्रश्न पूछते समय लक्ष्‍मण रावण के सिरहाने खड़े थे। श्रीराम ने पुन: लक्ष्‍मण को शिक्षा प्राप्त करने हेतु, प्रश्न-निवारणार्थ भेजा, यह समझा कर कि इस बार वे रावण के पैताने खड़े हो कर शालीनतापूर्वक, विनम्र निवेदन करें।

श्रीराम ने लक्ष्मण को सदाचार की शिक्षा देते हुये कहा, “मेरे भाई ! अहंकारवश हो शिक्षा ग्रहण नहीं की जाती। तुम जिसे रावण का अहंकार बता रहे हो वह रावण का नहीं, वस्तुत: तुम्हारा अहंकार था। लक्ष्मण ! तुम अपने अहंकार में डूबे हुये, केवल मेरी आज्ञा पालन हेतु रावण के पास शिक्षा प्राप्त करने गये थे। परिणामस्वरूप जब तुम उसके पास शिक्षा लेने गये तो अहंकार तुम्हारे सिर चढ़कर बोल रहा था और तुम रावण के सिरहाने उस पर अपना अधिकार जता शिक्षा माँग रहे थे। मेरे भाई ! रावण से शिक्षा प्राप्त करना तुम्हारा अधिकार नहीं है। शिक्षा देने वाला कोई भी हो, उस समय वह गुरु के पावन-पुनीत आसन पर पदासीन होता है। उसके उस रूप की मर्यादा को अक्षुण्ण रखना सभी के हित में है, सबका परम-धर्म है। यद्यपि महर्षियों का भयंकर वध, सम्पूर्ण देवताओं के साथ विरोध, अभिमान, रोष, वैर और धर्म के प्रतिकूल चलना, ये सब दोष दशानन रावण में हैं, जिन्होंने उसके ऐश्वर्य और प्राण दोनों का नाश किया है। जैसे बादल पर्वतों को आच्छादित कर देते हैं, उसी प्रकार इन दोषों ने दशानन रावण के गुणों को ढक दिया है। तथापि उसकी विद्वत्ता से भी नकारा नहीं जा सकता है। लक्ष्मण ! अच्छी शिक्षा कहीं से भी ग्रहण करने योग्य है और प्राप्त भी की जानी चाहिये। उसका स्त्रोत मत देखो उसकी गुणशीलता देखो। अत: लक्ष्मण मेरे भाई ! तुम अपने अहंकार को त्याग कर, अपने विजय-दर्प को त्याग कर, एक आदर्श शिष्य के रूप में विनम्रतापूर्वक राक्षसाधिराज दशानन रावण के पैताने, उनके पैरों के पास खड़े होकर, शालीनता की प्रतिमूर्ति बन उनसे शिक्षा देने का आग्रह करो और यदि वे परिणामस्वरूप शिक्षा देना स्वीकार कर तुम्हें शिक्षा प्रदान करें तो अवश्यमेव साभार कृतज्ञतापूर्वक उसे ग्रहण करना”।

लक्ष्मण ने अग्रज श्रीराम के आदेश का अक्षरश: पालन किया और रावण ने भी लक्ष्मण के उस रूप को राजनीति की शिक्षा प्रदान की।
शिष्‍टाचार की यह सुंदर कहानी अद्वितीय और अब तक की कहानियों में सर्वश्रेष्‍ठ है। शिष्‍टाचार निश्‍चय ही उतना महत्‍वपूर्ण है जितनी नैतिकता। सद्व्‍यवहारी पुरुष या स्थितप्रज्ञ व्‍यक्ति की परिभाषा है – ऐसा व्‍यक्ति जो अपने ऊपर वैसा नियंत्रण रखता है जैसे कछुआ अपने शरीर पर। अपने नियंत्रण के कारण वह जब चाहे अपने अंगों को समेट सकता है। असावधानी में कोई हरकत नहीं हो सकती। अन्‍य क्षेत्रों में चाहे जो भी भेद हो, लेकिन शिष्‍टाचार के क्षेत्र में सचमुच अपने निखरे रूप में मर्यादित होता है। जो भी हो, मरणासन्‍न और श्रेष्‍ठ विद्वान के साथ शिष्‍टाचार की श्रेष्‍ठतम कहानी के रचयिता श्रीराम हैं।

प्यार, त्याग, शौर्य और सहिष्णुता के चारों स्तम्भों पर खड़ी रामायण आज भी एक किताब न होकर भारतीयों के लिए आचार-संहिता है। उपनिषद का सार है। जीवन के इन मूलमंत्रों का खुद अनुसरण करना और भावी पीढ़ी तक पहुँचाना हर अभिभावक व जागरूक भारतीय की जिम्मेदारी है। विध्वंसकारी परिवेश में ऋषि या विद्वानों को शान्त और मनोनीत पर्यावरण दिया जा सके, आज भी यही समाज के हित में है। तभी समाज की अच्छी सोच और आचरण के आदर्श उदाहरण सामने आ पाएँगे और उनके तप को भंग करने वाली राक्षसी प्रवृत्तियों का कैसे शमन किया जाए, यह जिम्मेदारी शाषक या समाज के संरक्षकों की ही होनी चाहिए। क्योंकि न्याय के लिए भी एक संतुलित समझ की जरूरत है और न्याय भी तभी तक न्याय है जबतक क्षमा के महत्व को समझकर दिया जाए। सुधार की गुँजाइश तो हर जगह ही होती है। बार बार समझाने पर भी न समझे, तभी अपराधी दंड का भागी है और दंड में भी सामूहिक हित में ही होना चाहिए, निजी वैमनस्य से नहीं।

मनुष्य, समाज या परिवार को वही लौटाता है जो समाज या परिवार उसे देता है, इस तरह से अगर दीन हीनों पर ध्यान न दिया जाए, तो सामाजिक अपराधों की साझेदारी भी सबकी ही होनी चाहिए और बुराइयों को दूर करने की भी। यदि हमारी तश्तरी में जरूरत से ज्यादा है और पड़ौसी दाने-दाने को भटक रहा है तो संघर्ष और बगावत तो होंगे ही। अराजकता बढ़ेगी ही, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि निर्बलों को आलसी और निकम्मा कर दें। इसीलिए तो वानर और रीछ प्रवृत्तियों के लोगों को भी संगठित करके उनकी सेना बना डाली थी रामजी ने, जो बड़े से बड़े राक्षसों से लड़े ही नहीं, उन्हें जीतकर भी लौटे। आदर्श राम-राज्य की परि-कल्पना दलित अछूत हरेक को साथ लेकर ही कर पाए थे तुलसी दास भी। मारे गए हर राक्षस को मोक्ष देने में भी उनके राम नहीं चूके थे क्योंकि वैमनस्य बुराई से था, व्यक्ति विशेष से नहीं। जाति और वर्ण के भेद को भूल प्रेमवश राम शबरी के झूठे बेर खाते हैं और उच्चकुलीन वशिष्ठ अछूत निषाद को गले लगाते हैं।

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