साहित्य जगत

मैं बाँदा में रचता हूँ नेपाल : डॉ. बाल गोपाल श्रेष्ठ की तीन कवितायें

Bal Gopal Shrestha

मैं बाँदा में रचता हूँ नेपाल-II
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डॉ. बाल गोपाल श्रेष्ठ की तीन कवितायें
(अनुवाद- पवन पटेल)

कवि परिचय :

कवि व मानवशास्त्री डॉ. बाल गोपाल श्रेष्ठ का जन्म काठमांडू के उपनगर सांखु में 15 जून, 1960 को हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा काठमांडू में हुई। उच्च शिक्षा त्रिभुवन यूनिवर्सिटी, काठमांडू से होते हुए लीडेन विश्वविद्यालय, नेदरलैंडस से एन्थ्रोपोलॉजी में पीएचडी।

त्रिभुवन युनिवर्सिटी, काठमांडू के सेण्टर फॉर एशियन स्टडीज में करीबन एक दशक तक अध्यापन और कालांतर में लीडेन विश्वविद्यालय में कुछ समय तक अध्यापन।

सम्प्रति ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय, लन्दन में रिसर्च फेलो। अब तक दो कविता संग्रह यथा “कुलामय् थ्वयाच्वंगु सः” अर्थात “क्षितिजमा गुंजिरहेको आवाज” (1995) और हाल ही में “डायरी पानाय बुयावगु कविता” अर्थात “डायरी पानामा उम्रेको कविता” (2020) सहित लघुकथा, पत्रकारिता से सम्बंधित नेपाल भाषा में दस पुस्तकें प्रकाशित। साथ ही नेपाली समाज के अनुसन्धान से सम्बंधित बहुचर्चित किताब “द सेक्रेड टाउन ऑफ़ सांखू: द एन्थ्रोपॉलजी ऑफ़ नेवार रिचुवल, रिलिजन एंड सोसाइटी इन नेपाल” (कैंब्रिज स्कॉलर्स; 2012) सहित पाँच किताबें प्रकाशित. सम्प्रति लीडेन में निवास।

दो शब्द इन कविताओं के बारे में :

नेपाली भाषा और नेपाल भाषा मूलतः रूप और शब्द विन्यास में दो अलग अलग भाषाएँ हैं। देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली नेपाली भाषा को आम बोलचाल में खस भाषा कहने का चलन है। वहीँ नेपाल भाषा अतीत में भुन्जिमोल, रंजना, नेपाल लिपि आदि अन्य लिपियों में लिखी जाती थी। बहरहाल आजकल देवनागरी में भी लिखी जाने लगी है।

नेपाल के तागाधारी प्रभु वर्गों ने अपनी विशिष्ट शासकीय पहचान निर्मित करने के लिए नेपाल में विद्यमान कई दर्जनों भाषाओँ को हाशिये पर लाने के लिए नेपाली को खस भाषा (ख़ास कुरा यानि ख़ास बातचीत) कहा।

इस अंक के कवि डॉ. बाल गोपाल श्रेष्ठ की कवितायें परम्परागत रूप से काठमांडू घाटी में रहने वाली जनजाति नेवार समुदाय की मातृभाषा नेपाल भाषा में रची गयी हैं। यहाँ प्रस्तुत किये गए हिंदी अनुवाद नेपाली भाषा पर आधारित हैं। पहली दो कविताओं का नेपाल भाषा से नेपाली भाषा में अनुवाद स्वयं कवि द्वारा किया गया है और तीसरी कविता का नेपाली तर्जुमा आर. मानन्धर ने।
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(1) आधा अधूरा

प्रेम किया तो आधा ही था
मन को भाया आधा ही था
ब्याह हुआ तो आधा ही था
दिया भोज था इष्ट जनों को आधा ही था
आधा अधूरा
हाँ जी केवल आधा अधूरा

परिवर्तन जी हाँ परिवर्तन
आधा अधूरा मात्र हुआ था
आन्दोलन भी आधा हुआ था
था लेकिन यह आधा धोखा
ईमान की बात यहाँ थी आधी
बेईमानी ने बाहें भी आधी थी साधी

जीवन में गोया सुख था आधा
इसीलिए तो दुख था आधा
मन की मौज का भाव था आधा
तिरे साथ को मन अतृप्त अब भी था आधा
जीवन की यह कथा रही आधी अधूरी
हुई नहीं जो कभी भी पूरी

इंकलाब तो हुआ था आधा
समझौते का बाना साधा
जीत अधूरी यहाँ हुई थी जन गण मन की
हार अधूरी बन ये गयी थी गैर जरुरी
सच ने यहाँ था दामन साधा भी तो आधा
झूठ का कारोबार था फैला आधा आधा

स्वप्न फलित तो हुआ था आधा
आँखें खोली दिवास्वप्न रह गया ये आधा
आधा अधूरा रहा स्वप्न कभी नहीं होगा अब पूरा
अहा ! रह गया आधे में ही सफ़र अधूरा

जटिल लग रहा सारा मसला गुणा गणित करने जब बैठा
षणयन्त्र किसी का इसमें है क्या
आधे के हिसाब में अक्सर हो जाया करता गोलमाल
नष्ट भ्रष्ट सब आधा अधूरा यह अहवाल

हँसना आधा
रोना धोना करके आधा
जीवन जीना तिल तिल मरना आधा आधा
कितनी दारुण है यह पीड़ा
कटी जिन्दगी आधी मेरी यूँ ही ऐसे रोते बिसुरते
बाकी आधी खालीपन में शून्य को तकते

यह सारा वृतान्त मेरा
सुनने में क्या सुखकर है
यहाँ तो केवल दुख भर है
आधा अधूरा
सिर्फ़ अधूरा
सिर्फ़ अधूरा I

(अनुवाद: 7 अक्टूबर, 2020)

 

(2) आसान नहीं हुआ करती बहूबेटी की जिन्दगी

आसान नहीं हुआ करती
बेटी की जिन्दगी
बेटों की तरह

वैसे तो कहा जाता है उन्हें
देवी और लक्ष्मी का रूप भी
पर मान लो
कहीं वह छत से कूदकर भाग गयी तो !
इसीलिए सब रहा करते हैं
अन्दर ही अन्दर भयभीत, डरे हुए

अगर वह स्कूल गयी तो
माँ घुलती रहती है चिन्ता में हर क्षण
कहीं वह काम पर नौकरी में गयी तो
पिता जाने क्या बडबडाते रहते हैं
संगी साथियों के साथ कहीं गयी तो
भाई लोग डाँटते डपटते रहते हैं
थोड़ा बन संवर कर घर से निकली तो
पास पड़ोस के लोग जाने क्या ख़ुसर फ़ुसर किया करते हैं
मनाही के अंदाज में

हल्ला पीटने की तर्ज पर
कि ये लड़की किसी के साथ एक दिन भाग सकती है ?
ख़सम के यहाँ गयी क्या ?

यदि मजबूत इरादों के साथ निडर हो
अपने पैरों पर कहीं खड़ी हुई तो
नवाज़ दी जाती है
वेश्या, रण्डी की संज्ञाओं से

कहा जाता है स्त्री को
एक एक कदम आगे बढ़ाने के लिए हजार बार सोचना पड़ता है
एक गलती और गई जिन्दगी गड्ढ़े में
बचते बचाते बिना आवाज किये
चुपचाप, मौन
बढ़ाने पड़ते हैं छोटे छोटे कदम
आक्रांत हो अपनी परछाईं से भी
उसे चलना होता है
कदम ब कदम

बेटी के बहू बन जाने पर तो
मानो क़यामत का ही दौर शुरु हो जाता है
जिन्दगी निहायत ही कठिन बन जाती है
बेटी के एक बार बहू बन जाने पर
फुर्सत नहीं मिलती साँस लेने को भी
चाहनी होती है सास की आज्ञा
मुँह खोलने के लिए भी
घर की देहरी से बाहर एक कदम आगे रखने के लिए भी
चाहनी होती है पति की आज्ञा

महदूद रहती है उसकी दिनचर्या यहीं तक
बेडरुम से छत का उपरी तल्ला
छत से कुंआ
चूल्हा-चौका, रसोई,
बालकनी तक ही

कुंए से पानी भरकर लाना
भात पकाना
तरकारी पकाना
बर्तन धोना
बर्तनों के घिसने के साथ साथ
कब उम्र बीत गयी
पता ही नहीं चला

चूल्हा फूँकते हुए
भूं भूं कर
नियति है उसकी
चूल्हे की आग के साथ जलकर खत्म हो जाना

ख़त्म हो जाया करता है आधा दिन तो
सुबह का कामकाज निपटाने में ही
दम लेने को भी फ़ुर्सत नहीं मिलती
कि दिन बीत जाता है
साँझ अभी हुई कि नहीं
कि खाना पकाने की तैयारी में लग जाना पड़ता है
चाहे चूल्हा जलाने के लिए
ह्रदय ही सुलगाना क्यूँ न पड़े
एक क्षण को भी हाथ धरने की फ़ुर्सत नहीं
कि बेसुध हो जाती है वह निद्रा में

ह्रदय में कहाँ कहाँ घाव लगा
इसके लिए रोने को भी फ़ुर्सत नहीं होती
और दिल खोलकर हँसने के लिए भी

कोल्हू के बैल की माफ़िक
जितना रगड़ सको
उसे रगड़ा जाता है अनवरत
कोल्हू के बैल की तरह गुलामी करते करते
सारी जिन्दगी बीत जाने के बाद भी
लोगों के मुँह से अनायास निकल पड़ता है
अरे !
बहू तो बहुत धूर्त निकली
और निहायत पक्षपातपूर्ण
पिसती रहती है जुएँ के तले
जब तक बीमार न पड़ जाए

गह में बाँधकर छुपा लिया करती है अपने आँसू
ओंठों पे ला सदाबहार मुस्कान
पीड़ा से भाव विह्वल होते हुए भी
आगे बढ़ना पड़ता है उसे
दिल के अन्दर की कसक को बहुत गहरे दबाकर

आसान नहीं हुआ करती
बहूबेटी की जिन्दगी
बेटों की तरह I

(अनुवाद: 11-16 अक्टूबर, 2020)

 

 

(3) लै जा लै जा अरे कोरोना लै जा लै जा

लै जा लै जा
अरे कोरोना लै जा लै जा
मरे नहीं जो स्वतः मृत्यु से
याकि अगरचे हैजे से
जनता थूक रही है उन पर
हँस हँस कर वे बगुले बने निर्लज्ज डुलाते अपने सर
तानाशाह धूर्त शासक को
अरे कोरोना लै जा

लै जा लै जा
अरे कोरोना लै जा लै जा
महाव्याधि के इस प्रकोप में
संकट में जब बिलख रहा है देश कोप में
बाज नहीं आते हैं शासक
घूस कमीशन खाने से
भ्रष्ट प्रशासक शासक के संरक्षक को
अरे कोरोना लै जा

लै जा लै जा
अरे कोरोना लै जा लै जा
गरीब दुखी जनता का नाम ले सत्ता की सीढ़ी चढ़कर
डूब गए हैं शासक केवल अपनी चिंता कर कर
मेहनतकश जनता का वे लहू चूसकर
देश को खाई में ढकेलकर
मरणासन्न बना शमशान घाट पर ले जाकर
मस्त हो रहे सत्ता शक्ति प्रतिष्ठा का खेल खेलकर
इन रोगी पदलिप्सा से ग्रस्त शासकों को
अरे कोरोना लै जा

लै जा लै जा
अरे कोरोना लै जा लै जा
श्रमजीवी जनता को विदेश भेजकर
लाश कफ़न में जब तक वे परिणत न होते वहीँ ठेलकर
उनके द्वारा भिजवाये गए रेमिटेंस को देश की तिजोरी में भरकर
खा डकार कर छप्पन भोग अति आनन्दित नाचगान में ये रमकर
गद्दार और जन मन द्रोही औ नरपिसाच
पाषाण ह्रदय के इन नेपाली हुक्मरानों को
अरे कोरोना लै जा

लै जा लै जा
अरे कोरोना लै जा लै जा
सिर्फ़ स्वयं के औ रिश्तेदारों के हित में
बाज नहीं आते ये कैसे भी कुकर्म करने में
राष्ट्र ही क्या जनता को नंगा करने में
अपना ख़जाना भरने में
नेपाल देश के भ्रष्ट पतित अकर्मण्य दल से उपजे
विवेकशून्य राजनीतिज्ञों को
अरे कोरोना लै जा

लै जा लै जा
अरे कोरोना लै जा लै जा
भिन्न भिन्न जाति भाषा से बने देश नेपाल में
शासक ये कहते न थकते एक ही सुर में
मात्र मेरी है तागाधारी जाति महान
मात्र सनातन धर्म महान सब धर्मों में
मात्र नेपाली खस भाषा अरे महान इस दर में
जोर जबर कर लादते जाते अपनी केवल यह भाषा स्कूल अदालत ऑफिस में
सरकारी काम में
मेची से महाकाली तक मधेस पहाड़ में
कई कई दर्जन यहाँ बोलि जाने वाली भाषाओँ समुदायों को विनष्ट करने में
लगे हुए इस देश नेपाली के शासक तागाधारी सत्ताधारी रेसिस्टों को
अरे कोरोना लै जा

लै जा लै जा
अरे कोरोना लै जा लै जा
हथियार बेचकर धन बटोर रहे
दूसरे देश में युद्ध मचा रहे
कीड़े मकोड़ों की तरह आदमी को मार रहे
लिथड़े-चिथड़े कपड़े पहने विपन्न देश को भीख माँगने पर मजबूर कर रहे
मानवता विकास लोकतंत्र का नाम जप रहे
सरमायेदारी पूँजी का जयगान गा रहे
पूँजीवादी साम्राज्यवादी मुल्कों के इन नरपिपासु नेताओं को
अरे कोरोना लै जा लै जा

लै जा लै जा
अरे कोरोना लै जा लै जा
मरे नहीं जो स्वतः मृत्यु से
याकि अगरचे हैजे से
लम्पट स्वार्थी दुराचारी
अपराधी ब्राह्मणवादी नश्लवादी शासक वर्गों को
अरे कोरोना लै जा

लै जा लै जा
अरे कोरोना लै जा लै जा
उपर्युक्त इन सबको अपने साथ लै जा I

(अनुवाद: 21-24 अक्टूबर, 2020)
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फुटनोट :

गह = पहाड़ की महिलाओं द्वारा सिर में स्कार्फ की मानिंद बांधा जाने वाला काला सूती कपड़ा तागाधारी = द्विज अथवा सवर्ण। नेपाली समाज में तागाधारी समुदाय के अंतर्गत बाहुन, ठकुरी-छेत्री, गिरि, दशनामी व सन्यासी (सिर्फ़ पुरुष) आते हैं, जिन्हें तागा अर्थात जनेऊ धारण करने का अधिकार है।

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पवन पटेल
अनुवादक :
पवन पटेल कवि व नेपाली समाज के एक भारतीय विद्यार्थी हैं। शोध अध्ययन “द मेकिंग ऑफ़ ‘कैश माओइज्म’इन नेपाल: ए थाबांगी पर्सपेक्टिव”, आदर्श बुक्स: नई दिल्ली से 2019 में प्रकाशित। पहला कविता संग्रह“एक स्वयंभू कवि की नेपाल डायरी”, मैत्री पब्लिकेशन; पुणे से शीघ्र प्रकाश्य। सम्प्रति बाँदा में निवास और आजीविका के लिए संघर्षरत। सुझावों के लिए लिखें pawanman@yahoo.com

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