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पुस्तक समीक्षा: संजय कृष्ण- अखंड भारत के शिल्पकार सरदार पटेल

— संजय कृष्ण ( समीक्षा लेखक)

अखंड भारत के शिल्पकार

हमारे देश के इतिहासकारों ने पटेल पर बहुत कम शब्द खर्च किए। पटेल के साथ न समाज ने न्याय किया और न उस कांग्रेस ने, जिसके लिए उनका कतरा-कतरा चला गया।

देश और समाज के लिए अपने जीवन को समर्पित कर देने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल को भले हम लौह पुरुष जैसे शब्दों से विभूषित करें, लेकिन जरूरी सवाल यह है कि क्या हम उनके काम, उनके महत्व और उनके विचारों को कभी समझने का प्रयत्न किए?

भारत के निर्माण में जब हम गांधी, नेहरू और पटेल का नाम भी जोड़ते हैं, तब भी, पटेल को लेकर हमारे पास शब्दों की कमी हो जाती है। उनके प्रति एक उदासीन किस्म का मितव्ययी रवैया अपनाते हैं। क्या इसलिए कि वे बहुत कम बोलते थे और अपने बारे में तो उन्होंने कतई बहुत कम लिखा, बनिस्पत गांधी और नेहरू के।

गांधी को याद करें तो गांधी एक-एक पत्र की नकल तो रखते थे। वे हर चीज बहुत संभालकर रखते थे। तो क्या, गांधी को अपने वर्तमान से ज्यादा भविष्य की चिंता थी कि उन्हें किस तरह लोग याद करेंगे? अपने सार्वजनिक और व्यस्त जीवन में भी चरखा और नियमित लेखन के साथ अपनी चीजों को सहेजने में भी समय निकाल लेते थे। और नेहरू? इनके बारे में तो कहना ही क्या?

सोवियत संघ के राष्ट्रपति निकोलाई बुल्गानिन ने कहा था-आप भारतीय लोग विशिष्ट हैं। कैसे आपने राजाओं को न मिटाकर रियासतों (भारत में) को मिटा दिया।

आप सोचिए, तब भारत में पांच सौ से अधिक रियासतें थीं। इनमें से कइयों की अपनी करेंसी, रेलवे, और मोहरें चलती थीं। भला, ये सब विलय क्यों चाहतीं? उनके लिए विलय और समर्पण इतना आसान काम नहीं रहा होगा? लेकिन दो को छोड़कर सभी ने आखिरकार, विलय को मंजूरी दे दी।

इनके महत्वपूर्ण कार्य के बारे में भी हमें बहुत सतही और कमतर करके बताया जाता है, जैसे यह कोई बड़ा काम न हो? पर, जब आपको पता चलेगा, सरदार का भारत भारत-पाक बंटवारे के बावजूद-समुद्रगुप्त, अशोक और अकबर के भारत से भी बड़ा था।

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एस निजलिंगप्पा ने अपनी डायरी में ठीक ही लिखा था-हजार नेहरू मिलकर भी इसे प्राप्त नहीं कर सकते थे। ये नेहरू थे, जिन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा गया।

जब पटेल की मुंबई में 15 दिसंबर 1950 को निधन हो गया तो खबर दिल्ली तक पहुंची। इस खबर पर नेहरू की अजीब प्रतिक्रिया दिखी-नेहरू ने सभी मंत्रालयों और सचिवों को निर्देश जारी किए कि कोई भी उनके संस्कार में शामिल होने के लिए बंबई नहीं जाएगा।

नेहरू ने डॉ राजेंद्र प्रसाद से भी अनुरोध किया कि वे बंबई न जांए, लेकिन राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू की बातों को नहीं माना। पटेल कोई सामान्य आदमी नहीं थे। देश के गृहमंत्री थे और गृहमंत्री के प्रति नेहरू का ऐसा रवैया? इस बात का जिक्र उस में सरकार में मंत्री रहे और लेखक कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने भी अपनी किताब में इसका जिक्र किया है।

सचमुच, नेहरू कितने महान थे कि अपने ही कार्यकाल में, खुद को भारत रत्न की उपाधि ले ली। इंदिरा भी उनकी ही राह पर चली। पटेल को इसके लिए लंबा इंतजार करना पड़ा-1991।

आखिर, नेहरू को चिढ़ क्यों थी पटेल से ? यह पटेल के कामों से देख सकते हैं।

देश के विकास को लेकर भी दोनों की सोच में अंतर था। पटेल जैसा विकास चाहते थे, वह गांधी के नजदीक था। ग्राम स्वराज्य। किन्तु इतिहास की विडंबना देखिए, गांधी ने अपना उत्तराधिकारी चुना तो नेहरू को, जिसे गांधी के विचारों, कार्यक्रमों और योजनाओं से कोई लेना-देना नहीं था। बेशक, नेहरू के आधुनिक मंदिर की भी जरूरत थी। इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती थी-लेकिन गांव को भी सशक्त किए बना, उसे आत्मनिर्भर बनाए बिना, एक बेहतर भारत का निर्माण संभव नहीं था।

इसे ठीक से समझने के लिए हम अपने वर्तमान काल के इस वैश्विक बीमारी को देख सकते हैं। एक बीमारी ने पूरी दुनिया को पंगु कर दिया और गांव-गांव से लंबे समय से जो काम के सिलसिले में प्रवासन हुआ था, वे हजारों किमी पैदल चलकर अपनी जान की परवाह किए बिना गांव लौटने लगे थे। भारत की एक बड़ी आबादी शहरों से अपने गांव लौट रही थी-सरकारें चुपचाप तमाशा देख रही थीं।

अब जरा सोचिए, हमें गांव-गणराज्य को मजबूत किया होता, कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया होता, छोटे-छोटो बाजारों को विकसित किया होता तो क्या पलायन होता? इसके साथ ही सोचिए, नेहरू के आधुनिक मंदिरों की स्थिति क्या है? वे अब खंडहर होते जा रहे हैं। यदि हम अपनी आबादी और देश के मिजाज के हिसाब से विकास की रेखा खीची होती तो आज यह दुर्दशा नहीं होती।

नेहरू राजेंद्र प्रसाद को भी पसंद नहीं करते थे। वे नहीं चाहते थे कि राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति बनें, लेकिन वह बने। एक बार नहीं, दो बार। दूसरी बार भी नेहरू का अड़ंगा काम नहीं आया। नेहरू तो यह भी नहीं चाहते थे कि राजेंद्र प्रसाद सोमनाथ के पुनर्निर्मित मंदिर का उद्घाटन करें? उस समय टाइम्स आफ इंडिया ने खबर छापी कि मंदिर के उद्घाटन अवसर पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिए गए भाषण को भी आल इंडिया रेडिया ने प्रतिबंधित कर दिया।

पटेल ने चीन को लेकर भी नेहरू को आगाह किया था, पर नेहरू तो दूसरी दुनिया में विचरण कर रहे थे। समाज में पटेल की ऐसी छवि बना दी गई कि वे मुस्लिम विरोधी थे? यह सब किसके इशारे पर हुआ होगा? लंबे समय तक नेहरू देश के प्रधानमंत्री रहे।

देश को नई दिशा देने में उनकी भूमिका कम न थी, लेकिन इन सच्चाइयों से भी मुंह मोड़ा नहीं जा सकता। पटेल तो लगभग इतिहास से ओझल ही कर दिए गए थे। कांग्रेस ने बहुत महत्व नहीं दिया। यह काम किया मोदी ने। पहले अटल की सरकार ने भारत रत्न दिया। मोदी ने गुजरात में उनकी दुनिया की सबसे विशाल प्रतिमा स्थापित कर दी। पटेल अब याद किए जा रहे हैं, कई मिथक भी अब ध्वस्त हो रहे हैं।

झूठ की बुनियाद पर टिकी दीवार भी ढह रही है। यह एक नया भारत है। पटेल केंद्रस्थ हो रहे हैं। इतिहास ने अन्याय किया, उसे सुधारना भी इतिहासकारों का काम है। हिंडोल सेनगुप्ता की किताब कई तरह के झूठ पर विराम लगाती है और उनके महत्व को, अखंड भारत के शिल्पकार को बहुत ईमानदारी के साथ पाठकों के सामने रखती है।
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हिंडोल सेनगुप्ता

पुस्तक का नाम: अखंड भारत के शिल्पकार सरदार पटेल (हिंदी अनुवाद)
लेखक-हिंडोल सेनगुप्ता
प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन, आसफ अली रोड, नई दिल्ली
कीमत-सात सौ रुपये

(#Sanjay Krishna जी के फेसबुक वॉल से साभार)

 

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