साहित्य जगत

‘आज के कवि’ श्रृंखला : दामिनी यादव- एक तारीख़ में समेट कर टुकड़ा-भर आसमान का …

आज के कवि
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दामिनी यादव एक साहसिक कवयित्री और युवा पत्रकार है। वे स्त्री विषयों पर बेहद बोल्ड और सशक्त कविताएं लिखती हैं। चाहे वह स्त्री देह से संबंधित विषय हों या सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ़ हो, सब पर खुल कर लिखती हैं। उनकी यही शैली उन्हें अलग पहचान देती है या यूं कहें कि उन्होंने अपनी पहचान बनाई है। दामिनी यादव का एक संग्रह ‘ताल ठोक के’ प्रकाशित हो चुकी है।

दामिनी अपनी कविताओं में वंचित वर्ग की आवाज़ उठाती हैं। वे समाज के बनाये तमाम पाखंड और दकियानूसी नियमों को चुनौती देती हैं-

“औरतें गाड़ देंगी अब कामयाबी के झंडे
नज़र नहीं आएंगे अब उनके जिस्म के
रौंदे, कुचले, मसले दुपट्टे,
ये ख़बरें ही बताती हैं कि आज
न बचपन या बुढ़ापा सुरक्षित है,
न बकरी तक की नस्लें..”

दामिनी यादव की कविताएं हमारे समय और समाज का दस्तावेज़ है। इनकी कविताएं आज जितनी प्रासंगिक हैं, कल भी होंगी। दरअसल यही कविता की ताकत होती है। इनकी कविताएं पढ़ते हुए पाठक अपने आसपास हो रहे या हो चुके घटनाओं को महसूस कर सकते हैं।

पूरी दुनिया में आज भी महिलाओं को अपने हक़ के लिए संघर्ष करना पड़ता है। भारतीय समाज में यह और भी कठिन कार्य है। क्योंकि यहां स्त्री को संपत्ति समझा जाता है। हमारा समाज पुरुष प्रधान है। बेटियां पराई धन! दरअसल हमारे समाज में लैंगिक विषमता बहुत अधिक है। बात सिर्फ हमारे समाज या देश तक सीमित नहीं है। लगभग पूरी दुनिया में यह भेद है-

“जाओ तुम जनेऊ संभालो, तुम संभालो जा नमाज़
मेरे सवाल हैं ख़ुद ही ख़ुद से, चीख़ क्यों तुमको लगे
मैं तो कब से दफ़्न हूं अपनी ही बनाई क़ब्र में
मेरी क्या औक़ात मुझ से क्यों भला डरने लगे
मैं तो बंद घड़ी का समय हूं जो बीत चुका जो मिट चुका
ज़िंदा समय की मुर्दगी में ज़िंदगी कैसे लगे
कुछ भी कहने की एक हद तो होनी चाहिए
ख़ासतौर पर तब ज़रूर जब कुछ भी कहना बेमानी लगने लगे।“

दामिनी की कविताओं में प्रतिरोध के अलग-अलग आयाम और रंग हैं। वह केवल स्त्री केन्द्रित विषयों तक ख़ुद को सीमित नहीं करतीं। इनकी कविताओं में राजनीतिक चेतना भरपूर है। इन पंक्तियों को देखिए–

“उधेड़ दो खाल इनकी हंटरों से
चाहे उखाड़ लो इनके नाखून
सड़ा दो यूं इनकी लाशों को
कि उनसे आए बदबू,
पर अजीब है ये नौजवां कौम
अजीब है ये नस्लें
कटे हाथों से भी उगा रहे हैं
खेतों में उम्मीद की फसलें..”

श्रृंगार, सुन्दरता, फूल आदि विषयों पर कविता लिखना बुरा नहीं है, ये विषय भी ज़रूरी हैं। क्योंकि कविता की विषय-वस्तु बनकर ही प्रकृति और भी सुंदर हो जाती है। किन्तु कवि का एक सामाजिक दायित्व होता है। उसे पता होना चाहिए अपना पक्ष, तभी वह दे पाएगा नये विचार, नई राह-

“बिकी हुई कलम के दाम बहुत होते हैं
पर बिकी हुई कलम के काम भी बहुत होते हैं
बिकी हुई कलम को कीचड़ को कमल कहना पड़ता है
बिकी हुई कलम को क़ातिल को सनम कहना पड़ता है
बिकी हुई कलम को मौक़े पर ख़ामोश रहना होता है
और बेमौक़े ‘सरकार की जय’ कहना होता है
बिकी हुई कलम एक खूंटे से बंधी होती है …”

हालांकि यह कविता एक सपाट बयानी लगती है, किन्तु ध्यान से पढ़ने पर इसकी गहराई समझ आने लगती है। दरअसल जो हमें सरल और सपाट लगे वह हमेशा सरल और सपाट होता नहीं।

दामिनी यादव बिकी हुई कलम की हालत जानती हैं। दरअसल कलम का बिकना एक वस्तु मात्र का बिकना नहीं है। यह एक लेखक का बिक जाना है, एक विचार का झुक जाना होता है। यह बात कवयित्री जानती हैं, तभी वह बिकी हुई कलम जैसी कविता लिखती हैं।

दामिनी की कविताओं का विषय बहुत आम है। आम है इसलिए उनकी कविताएं आम लोगों को जोड़ती और उनसे जुड़ती हैं। हालांकि कवयित्री को भाषा, शिल्प और बिम्बों पर थोड़ा ध्यान देने की ज़रूरत है ऐसा मुझे एक पाठक के तौर पर महसूस होता है। किंतु यह कोई जरुरी नहीं कि वे मेरी इस बात से सहमत हों।

इस बेबाक कवयित्री को भविष्य की शुभकामनाएं।

– नित्यानंद गायेन
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दामिनी यादव की कविताएं

 

1. 8 मार्च और मैं

    एक तारीख़ में समेट कर
    टुकड़ा-भर आसमान का,
    जो आज हमें हमारे होने का
    एहसास दिलाते हैं,
    निवेदन है उनसे
    रखो ये टुकड़ा-भर एहसान अपने ही पास
    भले ही न हो
    पतंगों की उड़ान हमारे बचपन में,

भले ही हम
गुड़ियों के घर सजाते हैं,
मगर हम हमेशा सिर्फ़
निवाला गुड़ियों के मुंह में रखने के अभ्यास से
ममता का पहला सबक दुनिया को सिखाते हैं,
आसमान में आंचल ही नहीं उड़ाते हैं
बलखाती मस्ती में बल्कि
जब चाहें अपने इरादों से
आसमान को ही
पल्लू में समेट लाते हैं,

इसीलिए नहीं रहता है
हमें अपना ही भान अक्सर
अपनी सुध लिए हो जाती है
सुबह से शाम अक्सर
लेकिन हम दुनिया के हर घर में
छिपी धड़कनों की तरह,
धीमी सांस की तरह,
ख़ामोशी से आते हैं, जाते हैं
इसीलिए हमसे हर घर बनता है घर
और हम घर की धुरी बन जाते हैं
जी हां, हमीं औरत कहलाते हैं।

 

2. ताज़ा ख़बरों का बासीपन

अचानक से मुझे सारी जानकारियां
बेमानी सी लगने लगी हैं,
सड़ांध, ऊब और बासीपन से भरी
लगने लगी हैं सारी ख़बरें,
ये ख़बरें या तो धमकी लगती हैं या झूठे सपने,
ये या तो डराती हैं अब
या लगती हैं सच को ढकने,
इन ख़बरों में बस ऐसी ही ख़बरें मिलती हैं,
जिनका वजूद मेरे वजूद के लिए
मायने नहीं रखता है,
चांद पर पानी मिलने से
क्या बदल जाएगा,

मेरी प्यास मोहल्ले के नल में अगर आया
तो वही पानी ही बुझा पाएगा,
रौशन हों भले ही और हज़ारों सूरज ब्रह्मांड में,

मेरे अंधेरे के हिस्से में तो
एक अदद बल्ब का उजाला ही आ पाएगा,
क्या पता खेल में शामिल हो गई है राजनीति
या राजनीति में ही सारे खेल होते हैं,
क्या पता क्या पाने के लिए
लोग अपना ज़मीर खोते हैं,
विदेशी भाषाओं की हमारी जानकारी अब
विदेशियों तक को डराएगी,
तो क्या वह रिश्तों में फैलते
सन्नाटों को भी समझ पाएगी,
दुनिया ख़रीदेगी हमसे अब
तरक्की के साज़ोसामान
तब तो किसानों की लाशें भी अब पक्का
पेड़ों से लटकी नज़र नहीं आएंगी,

औरतें गाड़ देंगी अब कामयाबी के झंडे
नज़र नहीं आएंगे अब उनके जिस्म के
रौंदे, कुचले, मसले दुपट्टे,
ये ख़बरें ही बताती हैं कि आज
न बचपन या बुढ़ापा सुरक्षित है,
न बकरी तक की नस्लें,

धर्म गले नहीं काटेगा किसी के
देगा इंसानों की बगल में इंसान को बसने
ऐसी ही जाने कितनी ख़बरों से
भरा पड़ा है ये अख़बार,
फिर भी मुझे लगने लगा है ये बेमानी-बेकार
बस एक ही जानकारी
मेरे कुछ पल्ले पड़ी है कि
अख़बार और पानी से साफ़ करने पर
आईने चमक जाते हैं,

किरदारों की बात करना तो
मेरे बस में ही नहीं है,
चलिए अख़बार से पाए इस टिप्स की बदौलत
मैं अपने घर के आईनों को ही चमका देती हूं,
इन पर जमी हुई थोड़ी धूल हटा देती हूं
और ख़ुश हो लूंगी कि
अब आईने पर धूल नज़र नहीं आएगी,
अख़बार और पानी के संयुक्त समाधान से
झूठी ख़बरों की सच्चाई कुछ और दिन छिपी रह जाएगी।

 

 

3. एक फ़ालतू से समय में

किस तरह लिखी जा सकती हैं प्रेम कविताएं उस दौर में
जब प्रेम तो क्या जिस्मानी हरारतें तक उकताने लगे
किस तरह की जा सकती हैं शांति की बातें उस दौर में
जब मुंह में आवाज़ तो क्या ज़ेहन तक सोचने से बचने लगे
मिले तो कैसे मिले आधा आसमान आधी ज़मीन

जब एक लिंग के पांव फैलाने की कोशिश भ्रूण-रूप में ही कटने लगें
कौन सा खेत बचाओगे किस प्यास की बातें करते हो
जब नदियों की प्यास शीतल पेय में बंटने लगे
किस पराजित का हुआ है सगा इतिहास कभी
जब जीते हुओं की नीयत और ईमान तक बंटने लगे
कुत्ते और इंसान जब फुटपाथों पर सोते हों संग

जब किसी ममता की लोरी हलक़ में ही घुटने लगे
आग जब चारों तरफ़ हो मल्हार राग गाए कौन
जिन हाथों में पानी के घड़े हों वे ही पीछे हटने लगे
फाड़ दो सारी किताबें जिनमें लिखे हैं सिद्धांत
इस सदी की वफ़ादारियां पिछवाड़ों से चटने लगे
बात करना ही हो जब बकवास तब मुंह खुले तो क्यों
कुछ भी सुनना कुछ भी कहना बग़ावती जब लगने लगे
क्यों न तारीफ़ें अंधेरों की हों बतलाओ तो ज़रा

जब नंगे सिरों पर आग बरसाने-भर को सूरज उगने लगे
क़लम का सही उपयोग दांत का मैल कुरेदना ही हो जब
तब किसी सत्ता को क़लम से डर क्योंकर लगे
जान देकर भी न जब जानें बचाई जा सकें
ऐसे में फिर बंद दरवाज़ों की सांकल क्यों खुलने लगे

जाओ तुम जनेऊ संभालो, तुम संभालो जा नमाज़
मेरे सवाल हैं ख़ुद ही ख़ुद से, चीख़ क्यों तुमको लगे
मैं तो कब से दफ़्न हूं अपनी ही बनाई क़ब्र में
मेरी क्या औक़ात मुझ से क्यों भला डरने लगे
मैं तो बंद घड़ी का समय हूं जो बीत चुका जो मिट चुका
ज़िंदा समय की मुर्दगी में ज़िंदगी कैसे लगे
कुछ भी कहने की एक हद तो होनी चाहिए
ख़ासतौर पर तब ज़रूर जब कुछ भी कहना बेमानी लगने लगे।

 

 

4. भविष्य की मौत

ये जो दहक रही हैं चिताएं
यहां से वहां तक, वहां से यहां तक
देखते हैं ये वक़्त
ले जाएगा हमको कहां तक,
मांस का लोथड़ा-भर है
अभी मुंह में ज़बान
कुछ न कहने का जारी किया है
आक़ा ने फ़रमान

कटी जबानों से भी
कुछ लोग बड़बड़ा रहे हैं
लहू से रंगी हत्यारी कटारों की
खिल्ली उड़ा रहे हैं,
देखते रहो अभी खामोशी से कि
आक़ा के हाथी के पांव तले
ये सब के सब कुचल दिए जाएंगे
पर ज़िद ऐसी है कि
सर फिर भी नहीं झुकाएंगे,

उधेड़ दो खाल इनकी हंटरों से
चाहे उखाड़ लो इनके नाखून
सड़ा दो यूं इनकी लाशों को
कि उनसे आए बदबू,
पर अजीब है ये नौजवां कौम
अजीब है ये नस्लें
कटे हाथों से भी उगा रहे हैं
खेतों में उम्मीद की फसलें,

लाशों पे रख के कुर्सी
बैठा है आज जो आक़ा
डाल रहा है आज जो
मुल्क़ के हर घर में डाका,
कितने घर, कितनी बस्तियां
ये अभी और जलाएंगे
आख़िर तो जाके उनके पांव
खुद बहाए लहू की कीचड़ में धंस जाएंगे,
कांपेगी इनकी भी रूह
मौत का डर इनके सर पर भी मंडराएगा
तब इनके लहू से सूरज धोकर ही
ये आज का कुचला वर्ग नया सवेरा लाएगा,
तब तक सर्द पड़ा है जिनका लहू
उसे पिघलने दो,
जलने दो ये चिताएं अभी
यहां से वहां तक,
वहां से यहां तक जलने दो।

 

 

5. बिकी हुई एक कलम

बिकी हुई कलम के दाम बहुत होते हैं
पर बिकी हुई कलम के काम भी बहुत होते हैं
बिकी हुई कलम को कीचड़ को कमल कहना पड़ता है
बिकी हुई कलम को क़ातिल को सनम कहना पड़ता है
बिकी हुई कलम को मौक़े पर ख़ामोश रहना होता है
और बेमौक़े ‘सरकार की जय’ कहना होता है
बिकी हुई कलम एक खूंटे से बंधी होती है

बिकी हुई कलम की सियाही जमी होती है
बिकी हुई कलम रोती नहीं, सिर्फ़ गाती है
बिकी हुई कलम से सच की आवाज़ नहीं आती है
बिकी हुई कलम शाहों के तख़्त नहीं हिला पाती है
बिकी हुई कलम सिर्फ़ चरण-पादुका बन जाती है
बिकी हुई कलम से आंधियां नहीं उठती हैं

बिकी हुई कलम से सिर्फ़ लार टपकती है
बिकी हुई कलम एक वेश्या होती है
जो अनचाहे जिस्मों को हंसके अपने जिस्म पे सहती है
बिकी हुई कलम की कोख बंजर होती है
बिकी हुई कलम अपनों ही की पीठ में घुसाया हुआ ख़ंजर होती है
बिकी हुई कलम से लिखा इतिहास
सिर्फ़ कालिख पुता कागज़-भर होता है
बिकी हुई कलम का कांधा
सिर्फ़ अपने शब्दों का जनाज़ा ढोता है
बिकी हुई कलम और जो चाहे बन जाती है
पर बिकी हुई कलम सिर्फ़ कलम ही नहीं रह पाती है
बिकी हुई कलम सिर्फ़ कलम नहीं रह पाती है …

 

 

6. मांग और पूर्ति

धूप बहुत तेज़ है
और मैं पसीने से तर ब तर,
गला सूखा हुआ है, चेहरा भीगा हुआ
दौड़ाती हूं कुछ पाने-तलाशने को नज़र इधर-उधर,
एक छोटा सा जामुनी रंगत वाला लड़का
बैठा बेच रहा है जामुन
इस तपती तारकोल वाली सड़क के किनारे
कुछ पानी की बोतलें नज़दीक रखे डिब्बे के ऊपर रखी हैं
कुछ टिश्यूज़ के बॉक्सेज़ से उसकी दुकान
प्रासंगिक और समसामयिक बन पड़ी है,

मैं मौसम के साथ उसकी दुकान के तालमेल पर
मन ही मन मुस्कुराती हूं,
इस वक्त की सारी ज़रूरी चीज़ें एकसाथ देख
राहत भी पाती हूं,
फिर ‘कई चीज़ें ले रही हूं’ कहकर
‘सही भाव’ लगवाती हूं और
सारी चीज़ों पर पांच रुपये कम करने के फैसले के साथ ही
मैं अघोषित विजेता हो जाती हूं।

ठंडा पानी, टिश्यू और जामुन थामकर
जैसे ही पैर आगे को बढ़ाती हूं
उस लड़के को अपने दिए पैसे सिर-माथे लगाकर
फिर जेब में रखते देख ठिठक जाती हूं,
पूछने पर कहता है,
‘दीदी, आप बहुत अच्छी हो,
पहली बोहनी ही आपसे की है
सारी चीज़ें शाम तक बिक जाएंगी
ये उम्मीद बड़ी है।’

पता नहीं मेरी चतुराई बड़ी थी
या उम्मीदों में छिपा उसका सवाल ही बड़ा है।
मेरे भीतर के पांच रुपये का विजेता ज़मीन पर पड़ा है,
ओ सूरज, तू कितने जलते हुए पेटों के लिए,
कितनी ही ऐसी नन्ही जलती ज़िम्मेदार पीठों के लिए
जुटती रोटियों का तवा भी है,
इन जामुनी चेहरों वालों का तू टिश्यू भी है,
तू ही इनका जख़्म और तू ही दवा भी है।

ओ सूरज, तेरी आग में कितनी ठंडक छिपी है,
जिनमें आज इन भूखे पेटों की राहत भरी है।

 

 

7. ग़द्दार कुत्ते

आवारा कुत्ते ख़तरनाक बहुत होते हैं
पालतू कुत्ते के दांत नहीं होते हैं
दुम होती है,
दुम भी टांगों के बीच दबी होती है
दरअसल पालतू कुत्ते की धुरी ही दुम होती है
वो आक़ा के सामने दुम हिलाते हैं
और उसी हिलती दुम की रोटी खाते हैं,

आवारा कुत्ते दुम हिलाना नहीं
सिर्फ़ गुर्राना जानते हैं,
जब उनमें भूख जागती है
वो भूख अपना हर हक़ मांगती है
उनकी भूख का निवाला सिर्फ़ रोटी नहीं होती है
वो निवाला घर होता है
खेत होता है, छप्पर होता है
उस भूख की तृप्ति कुचला नहीं
अपना उठा हुआ सर होता है,

इन हक़ों की आवाज़
उन्हें आवारा घोषित करवा देती है
और ये घोषणा उन्हें ये सबक सिखा देती है
कि मांग के हक़ नहीं, सिर्फ़ भीख मिला करती है
इसीलिए पालतू कुत्तों की दुम निरंतर हिला करती है,

उनका यही रूप व्यवस्था को भी भाता है
सो उन्हें हर वक़्त चुपड़ा निवाला
चांदी के वर्क में लपेट बिना नागा मिल जाता है,
बदले में व्यवस्था उनसे तलवे चटवाती है
और बीच-बीच में उन्हें भी सहलाती जाती है,

आवारा कुत्ते उन्हें डराते हैं
वो पट्टे भी नहीं बंधवाते हैं,
इसीलिए चल रही हैं कोशिशें तमाम
कि इन कुत्तों को गद्दार और आवारा घोषित कर दो
और इनके जिस्म में गोलियां भर दो,
अपनी सत्ता वो ऐसे ही बचा पाएंगे
चुपड़े निवालों के लालच में
हर उठती आवाज़ को पट्टा पहनाएंगे,

हक के लिए उठती हर आवाज का
घोंट देंगे गला
और पालतू कुत्तों की देके मिसाल
सबसे तलवे ही चटवाना चाहेंगे,
सिर्फ़ पालतू कुत्ते ही मिसाल होंगे वफ़ादारी की
आवारा कुत्ते सज़ा पाएंगे थोपी हुई ग़द्दारी की,
ज़माना इन्हें नहीं अपनाएगा
पर इनके नाम से ज़रूर थर्राएगा,

हो जाओ सावधान,
सत्ता और व्यवस्था के ठेकेदारो,
कि जब ये आवारा कुत्ते अपने जबड़ों से
लार नहीं लहू टपकाएंगे
तब ओ सत्ताधीशो वो तुम्हारी सत्ता की
नींव हिला जाएंगे
और इस नींव की हर ईंट चबा जाएंगे,
ये जीते-जी कभी नहीं बनेंगे पालतू तुम्हारे
और मरकर भी आवारा ही सही
मगर आज़ाद कहलाएंगे, आज़ाद कहलाएंगे।
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