साहित्य जगत

‘आज के कवि’ श्रृंखला : संदीप प्रसाद – झूठ ने उसे दिखा-दिखा कर बजाया, लालच का झुनझुना …

आज के कवि
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संदीप प्रसाद हमारे समय के त्रासदी और विसंगतियों को रेखांकित करने वाले कवि हैं। वह छोटा सा फूल जिससे मिलकर प्रफुल्लित हुआ था कवि और अगली सुबह मिलने के वादे के साथ लिया था विदा … कहां गुम गया और कैसे ? फूलों का गायब होना आम घटना लग सकता है साधारण जन को, किन्तु पीड़ा कवि ही महसूस कर सकता है।

अवतार सिंह ‘पाश’ का घास हर जगह उग आने का दावा करता है, पर कुचले गये फूल हर बार नहीं उग सकते। फूल नाजुक होते हैं, कोलम होते हैं। दरअसल अब यदि फूल भी कैक्टस बनने लगे तो कैसी लगेगी यह दुनिया ? कवि संदीप का नन्हा फूल यूँ ही गायब नहीं हुआ, न ही उसने अपनी मर्जी से मिलने का वादा तोड़ा है। बैठक के नाम पर उसे कुचल दिया गया है।

कवि की दृष्टि पैनी होनी चाहिए, याददाश्त दुरुस्त। कवि जानता है स्मृतियों की कहानियां इतिहास की तरह होती हैं।

“मुर्दा है इंसान किस्से-कहानियों के बगैर
साँस, धूप, पानी और मिट्टी जितना जरूरी है
कहानियाँ उतनी ही जरूरी हैं।”

संदीप की कविताओं को समझने के लिए कहीं ठहरना नहीं पड़ता।इनकी कविताएँ जन की भाषा में कही गयी हैं। हालाँकि कई बार इतनी सरल भाषा देख कर साहित्यिक गुरू आलोचना भी कर सकते हैं। किन्तु जहां समझने के लिए रुकना पड़े वहीं कविता आम लोगों से दूरी बनाने लगती है।

कविता की उम्र आम पाठकों की स्मृति से बढ़ती हैं। इसका प्रमाण है बचपन में पढ़ाई जाने वाली कविताएं। हम बचपन में पढ़ी गयी कविताएं ताउम्र नहीं भूलते। क्यों ?  क्योंकि वह सरल भाषा में कही लिखी गयी कविता होती हैं। माँ, नानी, दादी की लोरी हम कभी नहीं भूलते यही कारण है।

संदीप प्रसाद कवि हैं और साहित्य के अध्यापक भी। शायद यही कारण है कि वे अपनी कविताओं में विरोध और विसंगतियों को भी संयमित और मर्यादित शब्दों को उपयोग में लेते हैं।

“हम लड़ना शुरू करते हैं
और चल पड़ती हैं इनकी दुकानें।
युद्धजीवी बदल देते हैं रंगों के मायने
और उनमें बुझा कर शब्दों के तीर
बरसा देतें हैं उस ओर
जहाँ बच्चे हैं,
स्कूल है
और है हमारा भविष्य।“

आक्रोश और प्रतिरोध के लिए उग्र भाषा की आवश्यकता नहीं होती हर समय। संदीप की कविताओं में इसे महसूस कर सकते हैं आप।

संदीप प्रसाद हमारे समय के प्रतिभावान और संभावनाशील कवि हैं। इनकी कविताएँ सामाजिक सरोकारों से भरी हैं। संदीप आम जन के कवि हैं।

आज के कवि श्रृंखला में पढ़िए संदीप प्रसाद की कुछ कवितायें :

– नित्यानंद गायेन

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संदीप प्रसाद की कवितायें

 

1. क्रांतिकारी

झूठ ने उसे दिखा-दिखा कर
बजाया, लालच का झुनझुना
मजबूरियाँ बाँह फैलाकर
रोकती रही इरादों की राह
दिल ने धीरे से कहा
जो सच को सच कह पाएगा
क्रांतिकारी कहलाएगा

उसने कहा
दर्द की आखिरी किश्त के साथ
आने लगती है
खुशियों की सूद–
मुआवजों की तरह,
फिर पक्के यकीन के साथ
वह दौड़ पड़ा हमसे दूर
हमसे थोड़ा और जुड़ जाने को।

वह नहीं आया लड़ने,
आया गढ़ने
थोड़ा बेहतर, थोड़ा और बढ़ने।

उसने सोचा
उसके हिस्से का सुख
सबके हिस्से में आए
लेकिन
एक बार नहीं, सौ बार नहीं, हर बार
उसपर हमने शक किया।

बरसों बाद
अब समझ में आया कि
वह किसी गोली, सजा या बदकिस्मती से नहीं
हमारे शक से मरा।

 

2. हरी घास पर घण्टे भर

सुबह मैदान में
हरी घास पर घण्टे भर
टहलते हुए मैं मिला
एक छुटकू प्यारे फूल से
उसने कहा- नमस्ते!
और झुककर छूना चाहा मेरे पैर
मैंने झट-से मिला लिया हाथ

उसकी मासूम सपनीली बातें
सुनी देर तक
उसके बगल में बैठ।

मैंने जाते हुए
हाथ हिलाकर उससे कहा था-
कल फिर मिलेंगे।
…कल वह नहीं मिला !

घासों से पूछा
तो बताया
कल यहाँ हुई थी कोई सभा
और मंच से बार-बार
सबसे जोरदार
सुनायी पड़े थे शब्द-
सपने, शुरुआत, विकास।

 

3. कहानियाँ

मुर्दा है इंसान किस्से-कहानियों के बगैर
साँस, धूप, पानी और मिट्टी जितना जरूरी है
कहानियाँ उतनी ही जरूरी हैं

ये छोटे-छोटे हिस्से हैं आदमी के
ईटों से जैसे बनते हैं मकान
वैसे ही बने होते हैं कहानियों से इंसान।

औरों और अपनी कहानियों में बिखरा आदमी
किसी नक्शे के कटे-फटे कतरनो-सा
जी रहा है
कुछ इसके हाथ, कुछ उसके हाथ
और वह
उतना ही बड़ा होता है
जितना औरों की कहानियों में
अपनों की तरह खड़ा होता है।

कहानियों से गायब होना
दफ्न हो जाना है
खुद के एक जिंदा देह में

यह देह जब निकल जाता है
हमारे हाथ से छूटकर कहीं दूर
लोगों के ज़ेहन में बिखरी हुई
छोटी-छोटी कहानियाँ ही
जिंदा रखती हैं तब हमें
जैसे हमारे पुरखे मौजूद हैं अब तक
हमारे हाथों में फँसे नक्शे के
किसी कतरन की तरह।

मुझे डर लगता है
इन दिनों हमारी याददाश्त
कम होती जा रही है कितनी
कि ठीक-ठाक दस पुरानी कहानियाँ
नहीं हैं हमारे पास
और बावजूद अपनी पूरी तरक्की
भेज दिए जा रहे हैं हमारे पुरखे
बूढ़े किताबों के वृद्धाश्रम में
साबुत के साबुत
हमारी यादों से बिल्कुल बेदख़ल।

 

4. युद्धजीवी

हम लड़ना शुरू करते हैं
और चल पड़ती हैं इनकी दुकानें।
युद्धजीवी बदल देते हैं रंगों के मायने
और उनमें बुझा कर शब्दों के तीर
बरसा देतें हैं उस ओर
जहाँ बच्चे हैं,
स्कूल है
और है हमारा भविष्य।

विचार जब हथियार उठाने को कहने लगे
तब हथियार ही बन जाते हैं विचार,
ऐसे में वह युद्धजीवी
दुहाई देता है
हमारे खेतों में लहलहाते सपनों की
और यकीन दिलाता है कि सपनों को कुतरने वाले
कीड़े-मकोड़ों की
अब खैर नहीं
क्योंकि उसने अपनी असंख्य भुजाओं में
थाम लिए है अस्त्र-शस्त्र असंख्य
और तब हमारे जागने पर लगाकर पहरा
हमें भेज दिया जाता है
जबरन
एक बेहोश नींद सोने को।

नींद के पाखण्ड में डालकर हमें
वह घुसता है इतिहास में
और निकाल लाता है अपने मतलब के सामान
और बदल देता है दर्शनों की व्याख्याएं।

युद्धजीवी जो कहता है
किसी न किसी दलील पर
उसे मानना ही पड़ेगा
क्योंकि
सवाल उठाना गुनाह है
सोचना खतरनाक है
जागना जुर्म है।

उसे गँवारा नहीं कि
हाथ लहराते हुए
सर उठाए कोई नापसंद विचार
और उससे फूटने लगे चिंगारियों की झड़ियां
वह, विचार के खिलाफ
बड़ी चालाकी से
कलम को उठाता है
सर कलम करने का फैसला सुनाता है
और फिर कलम तोड़ देता है

कोई मतलब नहीं इस बात का
कि वह युद्धजीवी कौन है?
वह छिपकर देख रहा है–
मेरे भेष में तुम्हें
तुम्हारे भेष में मुझे।

 

5. उल्लू का पाखंड

ऊँची डाल पर बैठा उल्लू
अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से करता है
सबको डराने की कोशिश।

जब सबको दिखता है सबकुछ
नहीं दिखता उसे- कुछ भी!
फिर भी बड़े रौब से
बैठा रहता है वह
ऊँची डालों पर
सबके पहुँच से बाहर,
सुरक्षित।

कौन समझाए
दिनौंधी के बीमार उस चिड़िया को
कि सबको मालूम है
तुम्हारा डराना
तिलिस्म है मात्र
क्योंकि
ज्यादा उड़ नहीं सकते तुम
और तुम्हारे पंख
छलावा हैं
जैसे ढोंगी कवि के लिए
शब्द पाखंड है।

 

6. अधूरी माँ

वह एक ऐसी कहानी
लिखते-लिखते रह गई
जिसे परिंदों के साथ उड़ना था
बहुत दूर तक।

उसके सपनों के गौरैया झुंड
करीब तक तो आए
पर बिना धप्पा दिए
मुड़ गए दूसरी ओर
जिसे सूने दरख्त की तरह खड़ी वह
बस निहारती रह गई।

उसके लिए
परमात्मा उस सूदखोर की तरह था
जिसके पास वह
अपने दर्द, नींद, परहेज, अरमान
किश्त की तरह भरती रही
पर जब मूल वापस पाने की बारी आई
तो वह मुकर गया-
बकाया हिसाब दिखाकर।

उसे लगता कि
छोटी-छोटी नन्हीं कोमल अंगुलियां
उसे छूने को आतुर
रुई-सी उसके आसपास ही उड़ रही हैं
पर अपनी भिंची हुई मुट्ठियों को खोल
वह उनको कभी थाम नहीं पायी।

उस नर्म जमीं ने सींचा तो था
कतरा-कतरा अपने रक्त से
अपने भीतर सोए नाजुक बीज को
जिसके अंकुर फूटने को तो थे
पर फूट न पाए…!!

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