आलेख

पलामू को समाजवाद की प्रयोगशाला मानते थे डॉ राम मनोहर लोहिया : अभिषेक रंजन

– अभिषेक रंजन सिंह(वरिष्ठ पत्रकार)

केरल में त्रावणकोर-कोचीन गोलीकांड पर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी दो खेमों में बंट गई। डॉ. लोहिया ने प्रसोपा को तीन माह का समय दिया कि वे सिद्धांत और अमल में एकरूपता लावें अन्यथा प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के कब्र पर नई सोशलिस्ट पार्टी खड़ी होगी।

पूरे देश में घूम-घूम कर वे जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं में इस बात की घोषणा करते रहे। उसी क्रम में डॉ. लोहिया पहली बार 3 अक्टूबर,1955 को पलामू आए। प्रथम जनसभा हुसैनाबाद में हुई जिसकी अध्यक्षता पूरनचंद जी ने की।

उसके बाद डॉ. लोहिया 1962 में पलामू आए पूरनचंद जी को चुनाव लड़ने को विवश किया। सभा में लोहिया जी ने कहा- पूरनचंद गरीबों का चौकीदार है। अगर वे जीतते हैं आम लोगों की आवाज़ बनेंगे। पलामू ज़िला जो हर दृष्टि से पिछड़ा है, कुछ आगे बढ़ेगा। हिंदुस्तान के नक़्शे पर इसे लोग जानने लगेंगे।

आखिरी बार सितंबर 1967 में डॉ. लोहिया अपने राँची, चाईबासा, हज़ारीबाग और गिरिडीह दौरे के बाद पलामू आए। शिवाजी मैदान की सभा में उन्होंने अलग राज्य के लिए तीव्र आंदोलन,दाम बांधो,अंग्रेजी हटाओ, करखनिया माल का दाम लागत खर्च से डेढ़ गुना से अधिक न हो। साथ ही आमदनी और खर्च पर सीमा लगाई जाए।

दूसरे दिन पलामू सर्किट हाउस में डॉ. लोहिया ने एक प्रेस वार्ता को भी संबोधित किया। एक पत्रकार महोदय ने पूछा, आपकी नजर में भारत का प्रधानमंत्री कौन हो, जिससे बाहरी और भीतरी दृष्टि से देश सुरक्षित रह सकता है?
डॉ. लोहिया ने हंसते हुए कहा- मैं आप लोगों की बात को समझता हूं। आपका इशारा कहाँ है। इस पर एक जोरो की हंसी हुई। डॉ. लोहिया ने कहा- अगर राजनारायण प्रधानमंत्री होंगे तो देश में बुनियादी परिवर्तन और अंदरूनी तथा बाह्य सुरक्षा संभव है। वैसे तो हमारे पूरनचंद जी प्रधानमंत्री हों तो नेहरू से अच्छे प्रधानमंत्री होंगे। क्योंकि इन्हें तो पार्टी की नीतियां अमल में लाना होगा। जैसे दाम बांधने, अंग्रेजी हटाने,जाति तोड़ने,पीने का पानी देने,बंद साफ पाखाने निर्माण करने गांव में बिजली और यातायात, ग्रामीण इलाकों में कुटीर उद्योग चलाने और छोटी सिंचाई योजनाओं के जाल बिछाने का।
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