साहित्य जगत

‘आज के कवि’ श्रृंखला : ख़ालिद खान – सभ्यता की पहली ईंट उन्होंने ही रखी थी …

आज के कवि
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इस कठिन दौर में खालिद उम्मीद के कवि हैं। खालिद संवेदनशीलता से अपनी बात रखते हैं। कहीं-कहीं आपको निराशा का भाव महसूस हो सकता है इनकी कविताओं से गुजरते हुए, किंतु ठीक उसी वक्त वे उम्मीद भी जगाते हैं। दर्द के बीच उम्मीद पैदा करना आसान काम नहीं है।

मजदूरों के जीवन पर कविता लिखकर न तो पुरस्कार मिल सकता है न ही कोई इनाम किन्तु ईमानदारी को बचाया जा सकता है, यह बात खालिद जानते हैं। सभ्यता के निर्माताओं में राजा की भूमिका नहीं, मजदूरों की भूमिका को चिन्हित करते हैं यह कवि। उपेक्षा, भूख, लांछन सहकर भी मजदूर इस संसार को सजाने के कार्य में लगा रहता है फिर भी उसे नहीं मिलती एक सम्मानजनक पहचान। चीन की दीवार हो या हो हावड़ा पुल, ताज महल हो या अम्बानी का महल सब को बनाया मजदूरों ने ही। कवि खालिद जानते हैं मजदूर की पीड़ा।

“सभ्यता की पहली ईंट उन्होंने ही रखी थी
उनके सख्त हाथों ने उकेरे थे दुनिया के रास्ते
उनके आने भर से शहरों के शहर आबाद हुए
समंदरों में उतारे गए जहाज
गाड़ियों में चढ़ा पहिया
मकानों में मजबूती थी उनके ही दम से”

सागर पर पुल बनाने वाले आखिर वानर क्यों कहलाते हैं? क्या इस सवाल पर हम सोच पाते हैं? राजा का स्वभाव सामंती होता है। वह मजदूरों को सम्मान देना तो दूर उल्टा उनके हाथ तक कटवाने का आदेश दे सकता हैं।

भावुकता कमजोरी नहीं, इन्सान की खूबसूरती है। कवि खालिद यह बात भी जानते हैं कि भावुक होने के कई नुकसान भी है किन्तु वह यह भी जानते हैं इस संसार को खूबसूरत बनाये रखने के लिए संवेदनाएं ज़रूरी हैं। माली कठोर मन का होगा तो बाग उजड़ जाएगा। किन्तु भावुक होना कायरता नहीं है।

“तुम्हारी बंदूक से निकली गोली को
मेरे तने सीने को भेदने के बीच
इतना समय तो है
कि मैं लगा संकू कोई बुलंद नारा
या गा सकूँ कोई इंकलाबी गीत!”

क्यों गाना चाहता है कवि इंकलाबी गीत? क्योंकि कवि को पता है अपना पक्ष। वह जानता है उसे किसके पक्ष और किसके विरोध में खड़ा होना है। बर्फ पर पड़े खून और फ़ौजी बूटों के निशान मिटाने के बाद खालिद का कवि हमें डर के खिलाफ़ चेताते हैं:-

“करना होगा इस डर से सामना
नहीं तो यह डर निगल लेगा
एक पूरा का पूरा देश !!”

हिंदी साहित्य समाज की वाहवाही की होड़ से दूर मजदूरों के बीच जाकर खालिद कविता में उकेरते हैं उनका दर्द, उनकी कहानी।
हमें सब कुछ सुंदर चाहिए किन्तु सुंदर बनाने वाले नहीं! नागार्जुन की कविता – ‘घिन तो नहीं आती है?” याद है न ?

खालिद कवि के साथ-साथ अच्छे छायाकार और डिजाइनर हैं। वह कविता पोस्टर बनाते हैं और जुलूसों में शामिल होते हैं। आप शायद खालिद के कवि पक्ष से परिचित नहीं हैं।

‘आज के कवि’ श्रृंखला में पढ़िए खालिद खान की कविताएं, जानिए इस कवि को।

– नित्यानंद गायेन
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खालिद खान की कविताएं

1. वे मजदूर थे

सभ्यता की पहली ईंट उन्होंने ही रखी थी
उनके सख्त हाथों ने उकेरे थे दुनिया के रास्ते
उनके आने भर से शहरों के शहर आबाद हुए
समंदरों में उतारे गए जहाज
गाड़ियों में चढ़ा पहिया
मकानों में मजबूती थी उनके ही दम से

वो राजा नहीं थे पर राजा थे उनके दम से
वो व्यापारी नहीं थे पर व्यापारी थे उनके दम से
वे देश नहीं थे पर देश टिका था उनके ही दम से

वे मजदूर थे
हां, वो मजदूर थे

शहरों में कोई जगह उनके लिए नहीं थी
राजा का कोई आदेश उनके लिए नहीं था
यहां तक कि उनके लिए कोई देश भी नहीं था

झुण्ड के झुण्ड चींटियों की तरह
निकल आए थे सड़कों पर
कि शहरों ने पहली बार उनके होने की जाना था
उनके इस तरह निकल पड़ने पर
पैरों के नीचे से खिसक गई थी कालीनें
थर्रा उठे थे राजपथ
हिल उठे थे बादशाहों के मुकुट

पर वे जा रहे थे शहरों से दूर
हजारों हजार मील का सफर करके
अपने घरों को सर पर उठाए
भूखे बेहाल अपमान से भरे
पुलिस की लाठियां को सहते
भाग रहे थे इधर से उधर

इधर राजा के आदेश पर जश्न के उन्माद में डूबा था शहर
मोमबत्ती पटाखों की रोशनी में दिख रहा था
इस सभ्यता का सबसे क्रूर और करूप चेहरा

2. इतना समय तो है

तुम्हारी बंदूक से निकली गोली को
मेरे तने सीने को भेदने के बीच
इतना समय तो है
कि मैं लगा संकू कोई बुलंद नारा
या गा सकूँ कोई इंकलाबी गीत
या तबियत से उछाल दूं
कोई पत्थर तुम्हारी तरफ
ताकि दर्ज हो सके मेरा विरोध
मेरा आक्रोश!

हां बस
इतना ही समय बचा है
तुम्हारी सत्ता को दफ़न होने को
इस ज़मीन में

जितना समय बचा है
तुम्हारी बंदूक से निकली गोली को
मेरे सीने तक पहुचने में

3. मैं एक मजदूर हूँ

मैं नहीं जनता था
कि मैं एक मज़दूर हूँ
जैसे मेरी माँ नहीं जानती
वो मज़दूर है, मेरे पिता की
मार खाती, दिन भर खटती
सिर्फ दो जून की रोटी
और एक छत के लिए

मेरा पिता ही था
जो जनता था
कि वो मज़दूर है
और कहां से लाता आता है
इतनी हिंसा घर पर

अक्सर मैंने रातों में देखा है
अपनी माँ को
पिता की ज़ख्मी पीठ पर
गर्म तेल मलते हुए
जब मैं नहीं जानता था
कि मैं एक मजदूर हूँ !

4. आज़ादी की बात

खूँ में लिपटी पाज़ेब को
मैंने झेलम के पानी से धोया
चिनारों के ज़ख्मों दिया बोसा

गंधक से महकते
बदहवास परिंदो को डाल दाना
जली हुई गुड़ियों को
बहुत देर तक सीने से लगाया

भगदड़ में छूट गई चप्पलों को
एक जगह इक्ट्ठा किया
मैंने बच्चों के खेल के मैदानों से
गोलियों के खोखे चुने

बर्फ पर निशान छोड़ते सरकारी
बूटों को वहाँ से मिटाया
कब्रिस्तान की सबसे छोटी कब्र पर
बैठ कर घंटों तक की बातें

एक पूरी रात
जमीन से लिपट कर रोया
नहीं, मैंने नहीं की
कोई आज़ादी की बात!

5. हाँ मैं डरने लगा हूँ

हाँ, मैं डरने लगा हूँ
मेरे अपने हाथ
खुद ही कहीं
मेरा गला न घोट दें

मेरे अपने हाथ
मेरे खिलाफ़ होते जा रहे हैं
हर रोज धीरे-धीरे

हाँ, मैं डरने लगा हूँ
अपने दिमाग से
कहीं वह कर न रहा हो
मेरे ही खिलाफ़ कोई साज़िश

हाँ, मैं डरने लगा हूँ
अपने सबसे प्यारे दोस्त के साथ
चलते हुए भी
जाने वो कौन सा पल हो
जब उसके अंदर एक भीड़
कर ले कब्ज़ा

हाँ मैं डरने लगा हूँ
स्कूल जाते बच्चे से
नौकरी जाते आदमी से
मज़दूरी के इंतजार में खड़े मज़दूर से
सुबह कूड़ा लेने वाले लड़के से
सब्ज़ी बेचने वाले से
उस बुढ़िया से भी जो हर रोज
सुबह देखकर सिर्फ मुस्कुराती है

हाँ मैं डरने लगा हूँ
उस गाय से जो
बस अभी मेरे पास से गुज़री है
जैसे कि वो कोई नरभक्षी हो

हाँ मैं डरने लगा हूँ
किसी से भी आंख मिलाने से
जैसे कि हर आंख में
एक आततायी की भीड़
हो हमलावर

हाँ मैं डरने लगा हूँ
सपने देखने से
क्योंकि मैं देखता हूँ
टहनी पर झूलते हुए
अपने ही माँस के लोथड़े को

क्योंकि मैं देखता हूँ
सड़कों पर जमे अपने ही लहू को
क्योंकि मैं देखता हूँ
एक भीड़ जो लगातार पीटे जा रही है मुझे

क्योंकि मैं देखता हूँ
एक स्त्री की अधजली लाश को
जिसका चेहरा
अब पहचाना नहीं जाता मुझसे

क्योंकि मैं देखता हूँ
अपने घर के जले हुए दरवाजे पर खड़ी
तमाशबीन भीड़ को
जो कुछ शर्मिंदा-सी
कुछ बर्बर-सी है

हाँ,
मैं डरने लगा हूँ
ट्रेन, सड़क, बस से
कहीं राह चलते कोई पूछ न बैठे
मेरा नाम
मेरा धर्म
मेरी जाति
मैं कुछ भी पूछे जाने से डरता हूँ

आज हर आदमी
एक दूसरे को
उसके डर से पहचानता है

यही डर है हमारा
जो आदमी को बदल देता है
एक हिंसक आदमखोर भीड़ में
जिसका
न कोई चेहरा है
न कोई नाम है
न कोई धर्म है
न कोई ईमान है

एक डर है
जो खड़ा है
दूसरे डर के खिलाफ़
भीड़तंत्र में बदलने को आतुर

यही डर है
जो डराता है एक को दूसरे से

यह डर है
जिसे हम जानते नहीं
जिसे हम पहचानते नहीं

यही डर है
जिसे सत्ता नियंत्रित कर रही है
अपने पालतू सूचनातंत्र से
हर पल हर दिन

क्योंकि हम नहीं जानते
इस डरी हुई सत्ता के डर को

हमें इस डर की शिनाख्त करनी होगी
हमें अपने अपने डर से
गढ़ने होंगे हथियार
सत्ता के खिलाफ
मानवता के पक्ष में

आज आँखों में आँखे डाल कर
करना होगा इस डर से सामना
नहीं तो यह डर निगल लेगा
एक पूरा का पूरा देश !!

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