विचार कॉलम

आज का नागरिक प्रशासन और भारत का नागरिक स्वाधीनता का संघर्ष :

नागरिक अधिकारों के प्रबल हिमायती थे डॉ. लोहिया, 12 अक्टूबर डॉ राम मनोहर लोहिया के पुण्य स्मृति को याद करते हुए।

– मोहन सिंह (गांधीवादी लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता)

उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक दलित लड़की के साथ हुए सामुहिक बलात्कार और हत्या के बाद नागरिक प्रशासन की लापरवाही तथा अपने किये धतकरमों पर सजा भुगतने और माफी मांगने के बजाय उसे छुपाने के लिए लगातार एक पर एक झूठ बोलते जाने की वजह से एकबार ब्रिटिश हुकूमत और आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों के कुचलने की घटनाओं की याद ताजा कर दी है।

याद आ रहें हैं डॉ राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जिन्होंने आपातकाल में इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ नागरिक अधिकारों की बहाली के लिए संघर्ष किया और बताया कि शासन जब निरंकुश और तानाशाही की ओर बढ़ने लगे और नागरिक प्रशासन और पुलिस बेशर्मी के साथ आम लोगों के नागरिक अधिकारों को कुचलने पर आमादा हों तब नागरिक स्वाधीनता की लड़ाई कितनी जरूरी हो जाती है।

आम आदमी को अपने नागरिक अधिकारों के बाबत सचेत करने के लिए सन 1936 में कांग्रेस के विदेश विभाग के सचिव रहते हुए डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने एक छोटी सी पुस्तिका ‘स्ट्रगल फॉर सिविल लिबर्टीज’ अंग्रेजी में लिखी और छपवाई। उस पुस्तिका के एक उद्वरण से अपनी बात शुरु करते है।

डॉ राम मनोहर लोहिया बताते हैं कि नागरिक स्वाधीनता का मोर्चा एक खास मोर्चा है, जो जनता को जगाए रखता है और उसकी कमर सीधी रखता है, उसे झुकने नहीं देता। इससे जनता में अन्याय का मुकाबला करने की भावना बनी रहती है। आदमी को इस बात से बल और उत्साह मिलेगा कि पुलिस और प्रशासन के अत्याचार का अगर उसने विरोध किया तो दूसरों की दिलचस्पी जगेगी और उनका साथ मिलेगा। इस तरह की चेतना जनता में अपने नागरिक स्वाधीनता के हनन के खिलाफ अभूतपूर्व जागृति पैदा करती है। सारा राष्ट्र हिल जाया करता है, लोग सतर्क रहना सीखते हैं और इस तरह अपनी प्रगति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

आज से 84 साल पहले कही गई इन बातों में जैसे आज के घटनाओं की प्रतिध्वनि सुनाई दे रही है। हाथरस में हुई दलित लड़की की हत्या और अमेरिककी अश्वेत नागरिक जार्ज फ्लाइड की बेरहम पिटाई के बाद हुई मौत ने एक बार फिर नागरिक अधिकारों की बहाली की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है।

हाथरस में हुई घटना के बाद पुलिस प्रशासन लगातार एक से बढ़ कर एक गलतियां किये जा रहा है और इन गलतियों पर पर्दा डालने की कोशिश भी कर रहा हैं। यहां तक कि उस परिवार को लड़की का अंतिम संस्कार करने से भी एक तरह से मना कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना को भयानक करार दिया।

पुलिस प्रशासन का दावा कि ऐसा सार्वजनिक हित में सुरक्षा के मद्देनजर जरूरी था। याद आ रहा है उस पुलिसकर्मी का बेशर्म चेहरा जो इस भयानक हादसे के बाद भी मुस्कुराने की हिमाकत कर रहा था। उस क्रूर मुस्कुराहट के पीछे क्या वजह हो सकती है ? उस मनोविज्ञान को समझना जरूरी हैं। जाहिर है कि इसकी वजह पुलिस प्रशासन को अपनी ताकत का भरोसा और सत्ता का पीठ पर हाथ होने के एहसास है।

यहीं नहीं उसके विरोध में हो रहे आंदोलन और हर उस आवाज को दबोचने की कोशिश किसी भी स्वतंत्र चेता व्यक्ति को झकझोर रही है और गुस्से को लगातार सुलगा रही है। दुनिया की अनेक ताकतवर सत्ता इस गुस्से की वजह से जमीनदोज हुई है और सत्ता से बेदखल भी।

इसको भोजपुरी के एक मुहावरे के हवाले से कहें कि “जबरा मारे रोवहुं ना दे”। ऐसी आवाजों को जाहिर तौर हर सत्ता अपने विरुद्ध मानने के लिए अभिशप्त है। उसे अभिव्यक्ति की आजादी से भी सख्त परहेज है। एक कविता के मार्फत से कहें तो कुछ ऐसा कि-
आपके पास अगर ताकत है,
तो अभिव्यक्ति को दबोच सकते है
और फिर मुस्कुरा सकते हैं,
अभिव्यक्ति दबोची हुई निरीहता पर
ताकतवर की मुस्कान है,
ताकि आपको लगता रहे
कि मार रहा शख्स
कितना मेहरबान है।

सरकार और पुलिस प्रशासन की बेरहमी और लगातार की जा रही लापरवाही से भी इसकी पुष्टि होती है। जाहिर है कि सत्ता प्रशासन ऐसे दी जाने वाली हर चुनौती में निरंकुश हो रही है और इसे सत्ता के विरुद्ध अवज्ञा ही माना रही है।

गांधी के सत्याग्रह दर्शन में ऐसी हर अवज्ञा की इजाजत है और डॉक्टर राम मनोहर लोहिया भी हमें ऐसी अवज्ञा के प्रति आगाह करते हैं। वे बताते हैं कि सत्ता के दुरुपयोग और उसकी बुराइयों से लड़ने का मतलब ही अवज्ञा हो जाता है जिसे राज्य कभी बर्दाश्त नहीं करना चाहता। इतिहास इस बात का गवाह है कि राज्य और उसके कानूनों ने किसी लोकतांत्रिक समाज में नाना प्रकार की विकृतियों और सत्ता के दुरुपयोग को जन्म दिया है और उसकी कोख से ही नागरिक स्वाधीनता की उत्पत्ति हुई।

सन 1893 में जब महात्मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका में मारिट्स वर्ग रेलवे स्टेशन पर प्रथम श्रेणी के टिकट होने के बावजूद अश्वेत होने की वजह से कड़कड़ाती ठंड में सामान समेत उठा कर फेंक दिया गया। उसके गर्भ से ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध नागरिक स्वाधीनता आंदोलन के एक सशक्त आवाज के रूप मे रेखांकित किया जा सकता है। इस दौरान ही कई सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों की बुनियाद पड़ी।

गांधी जी को एक केस के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे अभी एक ही हफ्ते हुए थे। किन्तु जिस हुकूमत ने अपने गांधी जी और उनका सामान नस्ल और रंगभेद की भेदभाव पूर्ण नीति की वजह से बाहर फेंक दिया। गांधीजी की राजनीतिक सूझबूझ और नेतृत्व के करिश्ममें का कमाल देखिए कि उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत को हमेशा के लिए अपने देश की सत्ता से बेदखल कर दिया और बाहर फेंक दिया।

नागरिक स्वाधीनता के संदर्भ में डॉ राममनोहर लोहिया का यह सुझाव भी गौरतलब हैं कि अमरीकी और फ्रांसीसी संविधान तथा इंग्लैंड के अधिकार घोषणा पत्र बिल ऑफ राइट्स 1689 को भी याद रखना जरूरी हैं कि किस प्रकार इनका जन्म हुआ। राजसत्ता जब ज्यादा ताकतवर होती है तो उसे बनाए और बचाये रखने और अपने किये धतकरमों को छिपाने के लिए ऐसा हर तिकड़म करती हैं, जहां तक उसकी पहुंच और समझ हैं। ताकि जनता उससे डरे और तत्कालीन परिस्थिति को स्वीकार करे। परन्तु गांधी को याद करते हुए उनके इस अवदान को भी अवश्य जेहन में रखना चाहिए कि आम जनता जब निर्भय हो जाती है तो जेल जाने, लाठी खाने और सत्ता से टकराने में तनिक भी हिचकती नहीं है। क्या आज की मौजूदा परिस्थितियां और सत्ता का लगातार चल रहा दमन जनता को कुछ ऐसा करने और सोचने के लिए विवश नहीं कर रहा है ?

इस संदर्भ में डॉ राम मनोहर लोहिया फ्रांस में 14वीं सदी में बनें राजनीतिक तथा अन्य बंदियों को रखने के लिए किलानुमा बनाए गए बास्तेल जेल की चर्चा करते हैं। बताते हैं कि 14 जुलाई 1789 की फ्रांसीसी जनता ने हमला कर इस जेल को नष्ट कर दिया। वास्त्तेल का पतन ही दरअसल फ्रांसीसी राजतंत्र की समाप्ति और फ्रांसीसी क्रांति की शुरुआत की बुनियाद मानी जाती है। उसके बाद ही समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे शब्द आधुनिक लोकतंत्र के मानक के रूप में लोक विमर्श के केंद्र में आए।

किसी लोकतांत्रिक समाज में, दलितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं की स्थिति कैसी हैं ? ये लोकतांत्रिक अधिकारों के आकलन का मानदंड बनें। इस परिप्रेक्ष्य में क्या उत्तर प्रदेश समेत अन्य प्रदेशों और पूरे देश में भी लोकतंत्र के सुनहरे भविष्य की कोई तस्वीर की जेहन में उभरती हैं?

गांधी की सीख है कि डरा-धमका कर और भय से हासिल सत्ता अथवा अधिकार को न तो देर तक कायम रखा जा सकता है और ना ही उसमें आम आदमी की जिंदगी में किसी बदलाव अथवा प्रगति की कोई गुंजाइश होती है। आमजन जब ऐसी व्यवस्था में घुटन महसूस करने लगते हैं तब सिविल नाफरमानी आंदोलन की शुरुआत होती है। लोहिया फरमाते हैं कि सिविल नाफरमानी आंदोलन ऐसा इंसान पैदा करती है जो जालिम के आगे घुटने नहीं टेकती। भारत में ब्रिटिश हुकूमत के दौरान ही इस चेतना के बीज भारतीय जनमानस में पड़ चुके थे।

डॉ राम मनोहर लोहिया बताते हैं कि 1880 के दशक में आधुनिक भारत में नागरिक स्वाधीनता की लड़ाई पहले पहल इस सवाल पर शुरू हुई कि कानून की नजर में भारतीय और अंग्रेज समान हों। इस बाबत एक बिल पेश किया जिसे इल्बर्ट बिल के नाम से जाना जाता है और जो लॉर्ड रिपन की प्रेरणा से पेश हुआ था। अंग्रेज अफसर व्यापारी काफी हद तक इस बिल से नाराज हो गए और उन्होंने इस बिल के खिलाफ जबर्दस्त अभियान छेड़ा। भारतीय जनता ने भी इसके विरोध में जबरदस्त आंदोलन चलाया। यह आंदोलन दरअसल भारत में राजनीतिक चेतना के जागरण की शुरुआत की बुनियाद है। इस बिल में भारतीय न्यायाधीशों को भी अपने समकक्ष यूरोपीय जजों की तरह यूरोपीय के मामले सुनने और फैसला देने का अधिकार दिया गया था।

डॉ राम मनोहर लोहिया बताते हैं कि तब निलहे साहबों ने वायसराय को अपहरण करने तक की धमकी दी थी। इसके बाद यह व्यवस्था की गई कि यूरोपीय मामलों की सुनवाई के वक्त जूरी के आधे सदस्य यूरोपीय ही होंगे।

दूसरा अवसर जिसे रौलट एक्ट के नाम से जाना जाता है। इसे काला कानून की संज्ञा दी गई। इसे सर सिडनी रौलट की अध्यक्षता वाली सेडिशन समिति की सिफारिशों के आधार पर बनाया गया था, जिसे “एनारिकिकल एंड रिवोल्यूशनरी क्राइम एक्ट 1919” के नाम से जाना जाता है। इसका मकसद बंगाल और पंजाब में बढ़ रही क्रांतिकारी कार्यकलापों पर रोक लगाना था। इस एक्ट के तहत ब्रिटिश हुकूमत को यह अधिकार प्राप्त हो गया कि वह किसी भी भारतीय पर बिना मुकदमा चलाए जेल में बंद कर सकती है। संक्षेप में यह कानून बिना किसी वकील बिना किसी अपील और बिना किसी दलील के ब्रिटिश हुकूमत के हाथों एक ऐसा ताकतवर हथियार प्रदान करता है कि वह कहीं भी किसी को पाबंद करने का अधिकार रखती थी। किसी सरकार की बैध आलोचना और राजद्रोह फैलाने वाले विचारों की अभिव्यक्ति के फर्क का फैसला मजिस्ट्रेट के विवेक पर छोड़ दिया गया है। जिनकी नजर में, डॉक्टर लोहिया बताते हैं कि मजिस्टर लोग इस सिद्धांत को मानते हैं कि सरकार की किसी खास नीति या कदम की आलोचना या विरोध तो हो सकता है, लेकिन पूरी सरकार को दोषी ठहराना राजद्रोह कानून के तहत आता है। तब प्रशासन और मजिस्ट्री के आगे नागरिक लाचार हैं, क्योंकि अपने विचार स्वातंत्र के अधिकार की हिफाजत की कोई वैधानिक या कानूनी गारंटी उसे नहीं है।

रौलट एक्ट के अखिल भारतीय विरोध का नतीजा यह हुआ कि पूरे देश में एक राजनैतिक चेतना की जागृति हुई। लाखों लोग 24 फरवरी 1919 को समुद्र में स्नान कर गांधी की सत्याग्रह सभा में शामिल हुए। हिंद स्वराज की प्रतियां, जिसे बंबई सरकार ने प्रतिबंध लगा रखा था, उसकी हजारों प्रतियां लोगों के बीच बांटी गई और लोगों ने खुलकर उसकी खरीदारी की और उसके एवज में अपनी थैलियां खाली कर दी।

इस सभा में मोहम्मद अली जिन्ना और सरोजिनी नायडू ने भाषण दिया। इसके विरोध में मोहम्मद अली जिन्ना और महामना मदन मोहन मालवीय ने केंद्रीय परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। पंजाब में इस एक्ट का हिंसक विरोध शुरू हुआ। हिंसक भीड़ ने थाने-थाने में घुसकर अंग्रेज पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी। पंजाब के लोकप्रिय नेता डॉक्टर सतपाल और सैफुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर लिया गया। पंजाब की जनता ने इस गिरफ्तारी के विरोध में बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को जलियावाला बाग में एक सभा बुलाई। तीन तरफ़ से घिरे मैदान मे निहत्थे लोगों पर जनरल ओ डायर ने गोलियां चालने का आदेश दिया। इसमें सैकड़ों लोगों की जानें गई।

इतिहासकारों का मानना है कि जलियांवाला बाग कांड की घटना के बाद ब्रिटिश हुकूमत ने भारत पर शासन करने का नैतिक अधिकार खो दिया। यही नहीं पूर्वी यूरोपीय देशों में भी जब सोवियत रुस मार्का साम्यवाद हंगरी, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया औऱ पोलैंड जैसे देशों में स्वीकार नहीं रहा, तो सबसे पहले प्रतिरोध के स्वर 50 के दशक हंगरी से शुरू हुई। हंगरी के प्रधानमंत्री इमरे नागी, जो बहुदलीय व्यवस्था के समर्थक थे, स्टालिन युगीन नीतियों का विरोध शुरू किया।

अपनी पुस्तक हिंद स्वराज और नव सभ्यता विमर्श में श्री वीरेंद्र कुमार वरनवाल ने विस्तार से बताया है कि श्री नागी ने किस तरह अपनी सूझबूझ से सोवियत फ़ौजों को बुडापेस्ट से हटने के लिए राजी कर लिया था। फिर पूर्वी यूरोप के साम्यवादी देशों के सैन्य सुरक्षा समझौते वर्सा पैक्ट से नाता तोड़ने और हंगरी को एक तटस्थ देश घोषित करने का ऐतिहासिक निर्णय किया। ऐसा स्वतंत्र निर्णय सोवियत सत्ता के लिए एक चुनौती भी थी और चेतावनी भी। निरंकुश सताएं ऐसे स्वतंत्र निर्णय को कभी स्वीकार नहीं करती हैं। नतीजतन सोवियत सत्ता ने कई इल्जाम लगाकर और झूठे मुकदमे चलाकर श्री नागी को फांसी की सजा सुना दी। 16 जून 1958 को अंततः उन्हें फांसी दी गई और एक उपेक्षित से कब्रगाह में उन्हें दफना दिया गया। अपने बचाव में श्री नागी ने कोई भी तर्क प्रस्तुत नहीं किया और इस एक सच्चे सत्याग्रही की तरह बलिदान देने को उन्मुख हुए।

उनका और उनके साथियों का यह बलिदान व्यर्थ नहीं गया। सन 1989 में जब हंगरी में लोकतंत्र की बहाली हुई तब कृतज्ञ राष्ट्र ने 16 जून को पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित किया।

इस प्रकार पूर्वी योरोप में अहिंसक क्रान्ति के जनक चेकोस्लोवाकिया के प्रखर बुद्धिजीवी, रचनाकार वकलाव हैवेल औऱ पोलैंड के लेश वैलेसा को भी वैचारिक स्वतंत्रता की वजह से अनेक शारीरिक, मानसिक यातनायें झेलनी पड़ी और जेल जाना पड़ा।

सन 1972 में अपने भाषण द एंड ऑफ मॉडर्न एरा में हैवेल ने आधुनिक सभ्यता की समाधि की घोषणा कर दी थी। इसमें साम्यवाद के राजनीतिक प्रयोग के अंत को उन्होंने मानव सभ्यता के एक महत्वपूर्ण युग के अवसान के रूप में भी चिन्हित किया था। पोलैंड के मजदूर नेता लेस वालेसा ने सोवियत संघ से मुक्ति के लिए सॉलिडरीटी नामक संगठन के जरिये लड़ाई लड़ी। शुरू में संगठन को हथियारो से परहेज नही था। लेकिन बाद में उन्होंने बताया कि जब तक हम हथियारों से संघर्ष करते रहे सफलता हमसे दूर रही। किंतु जैसे ही हमने गांधी के अहिंसक मार्ग सत्याग्रह का सहारा लिया हम साम्यवादी तानाशाही के खिलाफ अपनी लड़ाई जीत गए।

उनके शांतिपूर्ण अहिंसक प्रतिरोध के लिए उन्हें वर्ष 1983 में शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया। अहिंसक प्रतिरोध की अवधारणा गांधी दर्शन और सिविल नाफरमानी जैसे आंदोलनो का प्राण है। करुणा, प्रेम और दूसरों को सहयोग करने की भावना का हावेल एक पत्र में जिक्र करते हैं कि ये हृदय की अतल गहराइयों से आती है न कि दमकती बौद्धिकता से। इन मूल्यों से प्रेरित होकर ही अमेरिकी देश में रंगभेद नीति के खिलाफ मानव अधिकारों की लड़ाई शुरू हुई है।

गांधी के अहिंसक आंदोलन खासकर सत्याग्रह से प्रेरित होकर ही डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग ने रंगभेद के खिलाफ अश्वेतों के नागरिक अधिकारों की लड़ाई की शुरुआत किया। 4 अप्रैल सन 1968 को जब मार्टिन लूथर किंग सफाई कर्मचारियों के एक हड़ताल का नेतृत्व कर रहे थे तब 39 साल की अवस्था में एक नस्लवादी श्वेत ने उन्हें गोलियों से भून दिया।

अमेरिका में रंग भेद के विरुद्ध आंदोलन की शुरुआत अल्बामा की राजधानी मांटगुमरी से हुई। पहलीं दिसंबर सन 1955 को रोजा पार्क्स नाम की अश्वेत महिला ने जब भीड़ भरी बस में स्वेतों के लिए आरक्षित सीट पर बैठ गई थी, तो श्वेत यात्रियों ने उसे सीट छोड़ने के लिए विवश किया। रोजा पार्क्स ने सीट छोड़ने से इनकार कर दिया। रोजा पार्क्स के इस एक क़दम से रंगभेद के विरुद्ध पूरे देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत हुई।

रोजा पार्क के इस अभियान के पीछे महात्मा गांधी की प्रेरणा थी। किंग के नेतृत्व में 381 दिनों तक बस बहिष्कार का आंदोलन चला। इस आंदोलन की वजह से ही संघीय न्यायालय को सन 1956 में रंग और नस्ल के आधार पर भेदभाव के अध्यादेश को रद्द करना पड़ा। आम आदमी की दिक्कत और जरूरत को एक जन आंदोलन में बदल देने की कला किंग ने अपने नेता गांधी से ही सीखी थी। इतिहासकार ठीक ही बस बहिष्कार आंदोलन की तुलना गांधी के नमक सत्याग्रह से करते हैं, क्योंकि नमक भी अमीर, गरीब और पशुओं की समान जरूरत की चीज है।

18 दिसंबर को मो बउजिजी ने आत्मदाह किया और इसकी लपटें मध्य पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीकी देशों तक पहुंच गई। सरकार समर्थक लड़ाकों और प्रदर्शनकारियों के बीच धरना विरोध प्रदर्शन, रैली के श्रृंखलाबद्ध आयोजन होने लगे। यह आयोजन अक्सर जुमे की नमाज के बाद शुक्रवार को आयोजित होते थे। यमन वासी तवाकोल करमान इस क्रांति की प्रमुख योद्धाओं में एक हैं। इस क्रांति ने तवाकोल की पहचान अन्याय, अत्याचार और तानाशाही के खिलाफ लड़ने वाले एक प्रमुख योद्धा के रूप में पूरी दुनिया में हो गई। दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम ने उन्हें पर्सन ऑफ द ईयर की खिताब से नवाजा। अरब क्रांति में प्रमुख योगदान के लिए सन 2011 का शांति नोबेल पुरस्कार भी उनके नाम दर्ज हैं। इस आंदोलन विकसित करने आगे बढ़ाने में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही। ऐसे आंदोलन किसी भी तरह के अन्याय, अत्याचार, तानाशाही और और न्यूनतम लोकतांत्रिक अधिकारों के कुचले जाने के प्रतिरोध में खड़े होते हैं।

जैसा डॉ राममनोहर लोहिया अमेरिकी सिविल लिबर्टी आंदोलन के अनुभव से बताते हैं कि इस आंदोलन के फलस्वरूप अमेरिकी समाज की कई आर्थिक और सामाजिक विकृतियों का भी परदाफाश हुआ।

भारत में नागरिक अधिकारों के बहाली प्रयास ब्रिटिश हुकूमत के दौरान चालीस के दशक में शुरू हो गया था। सन 1936 में जवाहरलाल नेहरू ने नागरिक अधिकारों के प्रति आम जनता को शिक्षित और सूचित करने के लिए राजनेताओं और बुद्धिजीवियों को पत्र लिखा। जिसमें एक ब्यापक जन आधारित अराजनीतिक संगठन बनाने का जिक्र किया गया था। तब कांग्रेस पार्टी के विदेश विभाग के सचिव डॉ राम मनोहर लोहिया ने स्ट्रगल फ़ॉर सिविल लिबर्टी नाम की एक पुस्तिका लिखी जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका हैं।

14 अगस्त 1936 को इंडियन सिविल लिबर्टीज यूनियन की स्थापना हुई। जिसके पहले मानद अध्यक्ष रविंद्र नाथ टैगोर और कार्यकारी अध्यक्षा सरोजिनी नायडू को बनाया गया। के वी मेनन पहले महासचिव नियुक्त हुए। डॉ राममनोहर लोहिया, एम वेंकटारागया, एस प्रताप रेड्डी ने सिविल लिबर्टी के बाबत पुस्तिका तैयार कर और लेख लिखकर महत्वपूर्ण योगदान दिया। जिन महान उद्देश्यों और उम्मीदों के साथ भारत में सिविल लिबर्टी आंदोलन की शुरुआत हुई।

स्वतंत्र भारत में कई राज्यों में बनी कांग्रेसी सरकारों ने उन पर ठीक से काम नहीं किया। फिर लगभग तीन दशक बाद सिविल लिबर्टी आंदोलन की शुरुआत पच्छिम बंगाल से सन् 1968 में एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स के गठन से हुई। इसके बाद सन 1974 में आंध्र प्रदेश सिविल लिबर्टीज कमेटी और सन 1977 में हैदराबाद में आर्गेनाईजेशन फॉर प्रोटक्शन आफ डेमोक्रेटिक राइट्स की स्थापना की गई।

भारत में सन 1975 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा आपातकाल की घोषणा के बाद नागरिक स्वतंत्रा आंदोलन के तीसरे चरण की शुरुआत होती है। राजनीतिक दलों के नेताओं को बिना सुनवाई के जेलों में बंद कर दिया गया, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई और सरकार की अनुमति के बिना कुछ भी छापने की इजाजत नहीं थीं। संविधान के 43 वे संशोधन के जरिए आम लोगों की स्वतंत्रता और अधिकारों को समाप्त कर दिया गया। न्यायपालिका के अधिकारों में भी बहुत हद तक कटौती कर दी गई और जैसा कि अक्सर होता हैं, राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में हैं, का हवाला देकर ही ऐसा किया जाता हैं।

सन 1909 में हिंद स्वराज की रचना करते वक़्त ही गांधीजी ने महसूस कर लिया था कि इस संसदीय लोकतंत्र से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। फिर भी एक यूटोपिया ही सही, राम राज्य की शासन व्यवस्था को उन्होंने उत्तम व्यवस्था माना, जिसमें लोक मर्यादा और लोक लाज को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। आजादी के बाद सर्वोदय संस्थाओं ने भी बहुत हद तक 70 के दशक के कुछ पहले तक सत्ता पर नैतिक अंकुश का काम किया। स्वतंत्र भारत के इतिहास में डॉ राम मनोहर लोहिया ने केरल में अपनी ही सरकार से जनता पर लाठीचार्ज के विरोध में ना सिर्फ थानु पिल्लई की सरकार से इस्तीफा मांगा बल्कि जेल में रहते हुए प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव पद से स्वयं ही इस्तीफा भी दे दिया। ऐसे ही नैतिक साहस, लोक लाज और लोक मर्यादा से लोकतंत्र के आत्मा की हिफाजत हो सकती है। लोकतंत्र की हिफाजत के लिए ही जयप्रकाश नारायण ने इस 13 अप्रैल सन 1974 को ‘सिटीजन फार डेमोक्रेसी’ नामक संस्था बनाई सिटीजन फॉर डेमोक्रेसी के अध्यक्ष संघ जयप्रकाश नारायण और उसके महासचिव बीएम तार कुंडे को बनाया गया।

सन 1976 में ‘पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज’ एंड ‘डेमोक्रेटिक राइट्स’ की स्थापना हुई जो एक पूरक संस्था के रूप में सिटीजन फार डेमोक्रेसी का ही अंग थी। इरा सेजीइन को इसका राष्ट्रीय संयोजक नियुक्त किया गया। दरअसल पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज एंड डेमोक्रेटिक राइट्स जे पी और बी एम तरकुंडे के साथ काम करने वाले लोगों का एक ढीला ढाला संगठन था।

17 अक्टूबर 1979 को दिल्ली में एक राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसका उद्घाटन श्री जे बी कृपलानी ने किया। श्री बीएम तारकुंडे को अध्यक्ष और कृष्णकांत को महासचिव बनाया गया।

इस दौरान आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, केरल, बिहार, उड़ीसा और पंजाब में पुलिस एनकाउंटर में नक्सलियों के नाम पर हत्या की अनेकों घटनाएं सामने आई। जयप्रकाश नारायण ने ‘आंध्र प्रदेश सिविल राइट्स कमिटी’ का गठन किया, जिसमें बीएम तारकुंडे, अरुण शौरी, नवा कृष्णा चौधरी, एमबी रामामूर्ति, कालोजी नारायण राव, बीजी वर्गी, बलवंत रेडी, के प्रताप रेड्डी और केजीकन्ना वीरेंन को भी शामिल किया गया। इस समिति ने मई और जून 1977 में दो हिस्सों में पूरे विस्तार के साथ रिपोर्ट प्रस्तुत किया जिसमें उन 16 नौजवानों की नक्सली बताकर हत्या कर दी गई थी। जैसा कि ऐसे मामलों में अक्सर होता है कमेटी ने अपने रिपोर्ट में बताया कि दरअसल इन लड़कों को पहले पुलिस कस्टडी में रखा गया और फिर गोली मार कर हत्या कर दी गई। ऐसे निर्दोष लोगों की हत्या के विरोध में गुस्से की भावना फैल गई।

आंध्र प्रदेश की सरकार ने जस्टिस भार्गव के नेतृत्व में एक कमीशन बनाया। केजी कन्ना वीरेन और एमडी रामामूर्ति को इस कमीशन के सामने समिति की रिपोर्ट को प्रस्तुत करना था जिनकी पुलिस एनकाउंटर में नक्सली बता कर हत्या कर दी गई थी। जांच के दौरान ही सरकार ने अचानक घोषणा कर दी कि कमीशन जांच की सुनवाई कैमरे के सामने करेगा। इसके विरोध में कन्ना वीरेन और रामामूर्ति ने कमीशन के सामने अपनी रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई। इस प्रकार कमीशन बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे ही बंद हो गया, जबकि कमीशन के सामने जो तथ्य प्रस्तुत किया गया था उसे झूठलाना मुश्किल था।

8 अक्टूबर 1979 को लंबी बीमारी के बाद जे पी की मृत्यु हो गई। इसके सिविल लिबर्टी एक्टिविस्ट और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की एक बैठक 23 नवंबर 1980 को हुई। इस बैठक में यह आम सहमति से एक अराजनैतिक संगठन ‘पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टी’ नाम से बना। श्री बीएम तरकुंडे को इसका अध्यक्ष और श्री अरुण शौरी महासचिव बनाए गए। बाद में वाई पी छिब्बर को कार्यकारी सचिव भी बनाया गया था। न्यायपालिका, पत्रकारिता और राजनीति के कई चिंतक इस संगठन से जुड़े। जिनमें जस्टिस राजेन्द्र सच्चर, रजनी कोठारी, केजी कन्ना वीरेन और दिलीप एस स्वामी जैसे नाम शामिल हैं।

इस संगठन से ही स्वर्गीय श्री चितरंजन सिंह का आजीवन जुड़ाव और सक्रियता थी। यह सवाल पूछना स्वाभाविक ही है कि हाथरस कांड के बाद अगर श्री चितरंजन भाई जीवित होते तो वह क्या करते? पहली बात तो यह कि लोकतंत्र का अंतिम क्षण है कह कर आप हंसे कि बात दोहरा कर वे चुपचाप बैठे नहीं रह सकते थे। अपना झोला और अपनी पूरी गृहस्थी अपने कंधे पर लादते और हाथरस के लिए कूच कर देते। एक तथ्य परक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करते, स्थानीय प्रशासन को वह रिपोर्ट सौंपते, मीडिया में लेख लिखकर पूरी दुनिया को हाथरस के सच से अवगत कराते। और बताते कि पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती, सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना। यह बताने की कोशिश करते कि एक दिन ये आम निहत्थे लोग जब पुलिस के डंडे और गोले बारूद से डरना छोड़ देंगे तो फिर इस लोकतंत्र को बचाए रखने में कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है?

एक मौजू सवाल यह भी कि स्वतंत्रता, लोकतंत्र और उदारवाद का बाना पहन कर जब इस दुनिया उदारीकरण की व्यवस्था लागू हुईं तब से दुनिया में तानाशाही की प्रवृतियां क्यों बढ़ रही हैं ? क्यों अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देश में रंगभेद की वजह से अश्वेत जार्ज फ्लाइट की हत्या सरेआम पुलिस के द्वारा हो रही है ? हर 15 मिनट में लोकतंत्र कहे जाने वाले भारत में एक महिला के साथ बलात्कार होता है? जाहिर हैं कि ऐसे में जब देश में नए भारत के शुरुआत का आह्वान किया जा रहा है और आजादी के 75 वी वर्षगांठ मनाने की तैयारी चल रही है, हमें ऐसे चंद सवालों से रूबरू होना पड़ेगा। किसी भी लोकतंत्र की मर्यादा को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी हैं कि हाशिये पर खड़े लोगों मसलन महिलाओं, दलितों और अल्पसंख्यक के जीवन स्तर को कसौटी बनाना होगा और उसके लिए निरंतर संघर्ष भी करना होगा।
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