साहित्य जगत

‘आज के कवि’ श्रृंखला : चन्द्र मोहन- एक श्रमिक को क्यों देखना चाहते हो ऐसे…

आज के कवि
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चन्द्र मोहन की कविताओं में देसी मिट्टी की सौंधी महक और जीवन का संघर्ष है। चन्द्र मोहन असम के एक खेत मजदूर हैं और कविताएँ लिखते हैं। इनकी कविताओं में ब्रह्मपुत्र की तरह ही दर्द और संघर्ष का विस्तार है। चन्द्र की कविताएँ लोक भाषा में अपनी कथा बयान करती हैं। चन्द्र की कविताओं में शिल्प अपने अनोखे रूप में मौजूद हैं। यह कवि जानता है दर्द की भाषा में संगीत कैसे मिलाया जाये।

“पत्थर पर छलक-छलक कर बहते हुए पानी
हमारी श्रमिक आत्माओं में
जीने के लिए संगीतमय गीत
गाते हैं किसी पुरातन लोक धुन पर कल-कल”

कवि चन्द्र मोहन जानता है पूंजीवादी साजिशों के बारे में। वह मालिक से मजदूर के हिस्से का सवाल करते हैं। देश-दुनिया के लोग चाय की चुस्की लेते वक्त कब सोचते हैं चाय बागान के मजदूरों के बारे में ? कवि भी कभी सोचता है क्या ?
चन्द्र सवाल करते हैं –

“श्रमिकों को कैसे देखते हो तुम एक श्रमिक को क्यों देखना चाहते हो ऐसे-

एकदम गुलाम, फटे हाल और सब से फेंके हुए और सबसे छोड़े हुए और सबसे अनचिन्हे चीजों की तरह
किसी वीरान खेत-खरिहानी या चाय-बगानी में
पानी बिना मरे-मरे की तरह क्यों ऐसे क्यों देखना चाहते हो तुम एक श्रमिक को !”

पूर्वोत्तर के बारे में शेष भारत भी कब सोचता है चाय और प्राकृतिक सौन्दर्य के परे? चन्द्र मोहन की कविताओं में चेरापूंजी का बारिश नहीं, मजदूरों के आँसू हैं।

मजदूर का अंगूठा भी कट जाए तो भी उसे भोजन के लिए खटना पड़ेगा, ईलाज तो दूर की बात है। एक मजदूर यह बात जानता है। चन्द्र की कविताओं में खेत मजदूर का जीवन संघर्ष एक चलचित्र की तरह मौजूद है।

“दोस्तो ! मेरे मज़दूर दोस्तो !
मैं सोचता हूँ कि
फिर कल खटने जाऊँगा

फिर कल से खेतों में कुदाल चलाऊँगा
फिर कल कहीं देह का अंग कटेगा
लाज़मी है कि खून बहेगा ही“

ऐसी कविता वही लिख सकता है जिसने उस संघर्ष को जिया हो, दर्द को भोगा हो। चन्द्र की कविताएँ हमें उस जीवन में ले जाते हैं जिससे हम अक्सर अनजान रहते हैं जबकि वह सब कुछ हर दिन, हर पल हमारे आसपास घटता है। ये कविताएँ मानवीय संवेदनाओं को कुरेदती हैं। लम्बी आहें भरने को विवश करती हैं।

दर्द का भी अपना सौन्दर्य होता है। यूँ ही कहा जा सकता है कि दर्द का सौन्दर्य ही सबसे सुंदर शिल्प है, क्योंकि यही वो शिल्प है जो कठोर मन को भी रुला सकता है।

चन्द्र मोहन की कविताओं से गुजरना मतलब दर्द से गुजरना है, संघर्ष की अनुभूति को महसूस करना है। इनकी इन कविताओं में सभ्य समाज का भद्दा चेहरा दीखता है। चन्द्र मोहन संघर्ष के कवि हैं। लोक जीवन का चित्रण इनकी कविता की पहचान है। ‘आज के कवि’ श्रृंखला में पढ़ें चन्द्र मोहन की कविताएं।

-नित्यानंद गायेन
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चन्द्र मोहन की कविताएँ
———–

1.बाँस झाड़ियाँ जब पुकारती हैं

बाँस झाड़ियाँ जब पुकारती हैं
हम चले आते हैं
नदी की तरफ
हवा
सपने
वनफूल
और जीवों की दुनिया की तरफ
चले आते हैं फटी एड़ियों के बल।

पत्थर पर छलक-छलक कर बहते हुए पानी
हमारी श्रमिक आत्माओं में
जीने के लिए संगीतमय गीत
गाते हैं किसी पुरातन लोक धुन पर कल-कल।

सामने तो रोपे हुए बहुत वृक्ष, वन-जंगल हैं अभी भी
यह हमें स्मृतियों और आदिवासियों के प्राचीन
लोक कथाओं में ले जाते हैं
जहाँ हम गाय बैलों को चराते थे
जंगली हाथियों से दोस्ती करते थे बेशक
हिरनों की आँखों में अपनी आदिम आँखें
झलका कर देखते थे
और संध्या के सूरज को हाँकते थे इस तरह हरहकने पैने से
कि सूरज पहाड़ों के सबसे निचले हिस्से में गुम हो जाता था
कवि हँसी हँसते हुए

स्त्रियाँ खूड़ी बिनती थीं चुपचाप
और अपने आँचल से आँचल में झड़े हुए पत्तों को
तिनकों को
बटोर लाती थीं
रसोई के चूल्हों के लिए

जहाँ हमारी कविताएँ सबसे पहले जवान हुईं बाँस झाड़ियों ‌की तरह
वही आज
खेतों से थक-हार कर आने के बाद छाती को छूती हैं
चुमकारती हैं पृथ्वी और नदी के रस भरे मुखों से

जहाँ यादें ओस की तरह चूतीं हैं रात भर
और मज़दूर के माटी का मन भींगता है कण-कण

बाबा तो कहते ही थे, बाबू!
धरती पर सबसे अपना बाँस ही है
जिसे नदी के तट पर या कहीं खेतों या घरों के आसपास
लगाना होता है।

2. कैसे देखते हो तुम एक श्रमिक को
(1)

श्रमिकों को कैसे देखते हो तुम एक श्रमिक को क्यों देखना चाहते हो ऐसे-
एकदम गुलाम, फटे हाल और सब से फेंके हुए और सबसे छोड़े हुए और सबसे अनचिन्हे चीजों की तरह
किसी वीरान खेत-खरिहानी या चाय-बगानी में
पानी बिना मरे-मरे की तरह क्यों ऐसे क्यों देखना चाहते हो तुम एक श्रमिक को!

तुम्हारे माने हम श्रमिक क्या हैं
एक खिलौने की तरह आटे की लोई
एक सफाई कर्मचारी की तरह कामचोर झाड़ू
या आपके मुँह में कैद हुई तंबाकू की तरह थूक
या आपके गाड़ियों के इंजनों में परिवर्तन हुए
डिगबोई का कच्चा तेल
या मेघालयों में बन गए सैकड़ों काले आदमियों की मुट्ठी भर कोयले की राख
या प्लास्टिक,कूड़ा-करकट
या सबसे गंदी और भद्दी गाली
दुनिया के साहबों कैसे देखते हो तुम एक श्रमिक को
क्यों देखना चाहते हो ऐसे

बताओ
तुम्हारे माने हम सब क्या हैं
जब कह रहे होते हैं कि नहीं
यह सही है ऐसा करना चाहिए
जब धूप और सर्दियों और बारह महीनों का चादर ओढ़े
मामूली पगार पर काम करते हुए
अपने हाड़ और माँस में से खेतों में खून चुआते हुए
घर में जन्मे हुए पहले-पहल बेटा-बेटी को भेजते हैं जब स्कूल
तुम्हारी छातियों में क्या कोफ्त होता है साहबों!

क्या होता है आप सबके पूँजीपति और ज़मीनदारी दिलों में
कि हम आपके ही खेतों में मज़दूरी करते हैं
श्रमिक गीत गाते हैं तो आप कहते हैं गाओ मत, सिर्फ करो
साहब, हमारे गीतों में देश का संगीत
श्रमिकों से निर्मित हुई दुनिया का सबसे सुंदर रास्ता
शिल्पकार की कला
और बीड़ी के छल्ला
और पूँजी के गल्ला
और पथारों के हल्ला लगते हैं
और आप कहते हैं कि
बंद करो अपनी बिना हड्डी की जुबान!

जैसे हम खेतों के करनीहार हैं बनिहार हैं
तो कभी किसी दुआरी या टाटी के दुलारी धिया नहीं हो सकते
जबकि हकीकत है कि खेतों के जितने भी
बीज-बहार होते हैं सब महलों के शोभा बन जाते हैं
सब गोदाम के टाटा लग जाते हैं
और हमारी हथेलियों में काँटा लग जाते हैं

तो पता नहीं तय करो साहब तुम कैसे देखते हो
एक श्रमिक को क्यों देखना चाहते हो ऐसे
उसके श्रम को क्यों देखते रहना चाहते हो ऐसे

ऐसे तो? तुम्हारे माने हम श्रमिक हैं ही क्या
जैसे तुम सोच लो जैसे तुम चाह लो
तुम्हारी यह आजादी है
हमारी आजादी मुबारक कब होंगी जब हम
तुम्हारी आँखों के सामने अपनी आँखें डालकर सवाल कर सकें
और कुछ नहीं तो बस एक कामगार की तरह रह सकें
व्यथा कथा कहानी अपनी किसी एक दूजे से कह सकें
कि एक आजाद ख्याल की ज़िन्दगी निबह सके
और बर्दाश्त के बाहर तो कुछ भी ठीक नहीं
संतोष और सहनशीलता की भी एक सीमा होनी चाहिए
इसलिए कि कुछ भी जैसे सह सकें

यह कहना चाहिए कि आजादी कहने और देखने की होनी चाहिए
जैसे कि मृत्यु चुनने का अधिकार सबको है
जैसे कि पेशाब और शौच करने का अधिकार सबको है!
जैसे चमन में खिले हुए फूलों को देखने का अधिकार सबको है
जैसे सही-सही सर्दी और धूप और बरखा के प्रेम में
विरह सहने और रोने के अधिकार सबको है।

(2)

कैसे देखते हो तुम एक श्रमिक को क्यों देखना चाहते हो ऐसे
बताओ तो दिल पर हाथ रख के
एकदम टूटे हुए?
मिट्टी के घड़े की तरह एकदम फूटे हुए?
एकदम लिजलिजा-पिलपिला गोबर में केचुआ की तरह
या बेजान
बाँस की सबसे पतली ठठरी की तरह सूखे हुए
क्यों ऐसा क्यों देखना चाहते हो तुम एक श्रमिक को!

तुम्हारी यह देखने की आदत पर बखान कर दें
तो भाषा की ग्रामर गाँव हो जाएगी
तो पूरी गोल पृथ्वी कम पड़ जाएगी
पूरी गोल पृथ्वी की तरह अमरूद और अनार बोना
छूट सकते हैं पृथ्वी पर–!

लेकिन नहीं और सावधान!
किसान तो अभी काम पर हैं
खेत मजदूर तो अभी किसी मेड़ पर बैठ तंबाकू बना रहे हैं
बनिहारिन स्त्रियाँ अभी भी
खुरपी से सोह रही हैं घास

और जवान लड़कियाँ तो इस पढ़ने लिखने की उमर में
झूठ मूठ की गाली सुन रही हैं और काम कर रही हैं
काम इस देश के लिए कर रही हैं
इन सब के कामों में देश का गिटार गूँज रहा है
और आप इन सब समयों के बीच गाली दे रहे हैं
बेकार के ईश्वर की तरह टाइम पास कर रहे हैं ।

अरे! काम कोई भी हो
काम तो काम होता है
वह कोई सरकारी काम नहीं होता
वह कोई प्राइवेट काम नहीं होता
लेकिन ए काम बहुत गलत होता है
उनके हाथ पैर और समूची देह रहते हुए भी
कमा नहीं पाते हैं
भीख माँगते हैं
गुरु दक्षिणा माँगते हैं
तो हम काम करने वाले बहुत दयालु होते हैं
बहुत दानी होते हैं
और दे देते हैं
जैसे कि लोग माँगते हैं कविताएँ तो
मैं दे देता हूँ
जैसे कि द्रोणाचार्य के माँगने पर
एकलव्य ने काट कर अपना अँगूठा ही दे दिया
गुरु दक्षिणा के रूप में

तो हम इन्हें भीख में कुछ नहीं देते हैं तो
गाली की सीख देते हैं
और कहते हैं कि आप
गृहस्थ और श्रमिकों की चली आ रही
महाभारत कालीन परम्परा और धर्म को नष्ट कर रहे हैं।

3. मज़दूरी

एक कृषक के खेत में
एक दिन मज़दूरी कर रहा था
कुदाल चला रहा था

लगभग शाम हो चली थी
सूरज वन-जंगलों पर्वत-अँचलों के बीच कहीं गुम हो रहा था
आहिस्ते-आहिस्ते
पँछी सारे अपने-अपने घोंसलों की ओर लौट रहे थे

मेरा भी अब लौटने का समय हो रहा था घर
और मैं कुदाल चला रहा था
रात भी हो रही थी धीरे-धीरे
पूरब से सिक्के की तरह गोल शीतल चन्द्रमा भी
मेरे मज़ूर मन को ललचा रहा था

और मैं कुदाल चला रहा था गन्ने के सुदूर खेतों में
कि अचानक मेरे पाँव का अँगूठा कट गया
वहाँ का माँस छिल गया दोस्त
लाज़मी है कि खून बहेगा ही

सो, मैं कटे अँगूठे पर
अपना गर्म हाथ धरा ही था कि
मेरा हाथ लाल-लाल हो गया
वहाँ की पथरीली ज़मीन लाल हो गई थी
सोचा कि अपने पसीनेदार मस्तक से
सफेद पगड़ी उतार कर
इसे दो टूक चीरकर बाँध लूँ
रक्त और मिट्टी से सने अँगूठे को
फिर सोचा कि वन-तुलसी के पल्लव कहाँ ढूँढू
कि हथेलियों पर मल मल के
इसके औषधीमय रस गारकर कटे हुए पर चूआँ सकूँ
और छाप सकूँ
इसके पात को
कि बन्द हो जाए
बहते हुए जीवन के खून

मैं अपने खून को बचाने में लगा था
तब तक देखा निज भूखी आँखों से
कि मालिक दो सौ की पगार
मेरे हाथों में थमाने आया अचानक
जाने कहाँ से

वह कुदाल से कटे हुए
अँगूठे पर देखा खून
देखा वह
वहाँ की पृथ्वी पिचकारी की तरह
लाल रंग से रंगी हुई
महसुसा भी वह मेरी कृशकाय आत्मा से निकलती हुई
उफ की कातर स्वर

पर उसके हृदय में मर्म-सनेह और सहानुभूति के स्रोत नहीं थे दोस्त!
सो ,मैं खून सने हाथों से अपनी दो सौ की मज़दूरी लिया

आह तो भीतरी आत्मा में थी दोस्त
लेकिन रक्त सने हाथों से जब 200 की मज़दूरी लिया
कुछ दुख हल्का हुआ
कि चलो ₹200 में नून तेल और पिसान
खरीद लूँगा, महँगाई भी तो है-
झोला नहीं खरीदूँगा
गमछा में बाँध लूँगा चुटकी भर नून
कुछ ग्राम तेल और अँजुरी भर पिसान का संसार

दुकान से रास्ता मापते हुए चला आऊँगा घर
उसी पाँवों से
मेरे मासूम बच्चे बच्चियाँ और
मेरी धनिया मेरे इंतजार में अँगार भरे रस्ते पर आँख बिछाए तड़पते होंगे
यह सोचते चला आऊँगा घर

आते ही थमा दूँगा
अपनी महबूब को यह दिव्य-पोटली
और बच्चे जब रोने लगेंगे यह चित्कारते हुए कि पापा
चॉकलेट चाहें बिस्कुट काहें नहीं लाए पापा

मैं पिता होने के नाते क्या जवाब दूँगा बच्चों को
मेरी महबूब तो समझती है
सब कुछ भूल कर वह बिचारी
आटा सानती है
आँच लगाती है
छूटकी चुल्ही पर तावा बीठाती है
रोटी पका ही देती है
सिलवट पर धनिया की चटनी पिस ही देती है
गोल, गर्म और सुन्दर रोटी पर तनिक-तनिक से नमक, तेल, प्याज, आम का अचार और चटनी परोस ही देती है

घर में एक बिलार भी है
थाली के सामने बैठ जाती है
उसे भी एक रोटी दे देते हैं
खाने में बच्चों को कम हो जाए
उन्हें भी एक रोटी दे ही देते हैं

अन्ततः हम सब मिल बाँट कर खा ही लेते हैं
प्रेम, स्नेह और मर्म से
रुखा-सुखा देर रात को

फिर फूलों के पँखुड़ियों की तरह गलबहिया करते हुए सो जाते हैं चुपचाप!

दोस्तो! मेरे मज़दूर दोस्तो!
मैं सोचता हूँ कि
फिर कल खटने जाऊँगा

फिर कल से खेतों में कुदाल चलाऊँगा
फिर कल कहीं देह का अंग कटेगा
लाज़मी है कि खून बहेगा ही

फिर सोचता हूँ
दो रोटी और कुछ चटकदार चीज खाने पर
और अँजुरी भर कपिली-नदी का जल पीने पर
ज़िगर में
खून तो आ जाता ही होगा ना भाई
मामूली मज़दूरी में बहाने के लिए!


4. एक खेत मज़दूर जब काम पर होता है

एक खेत मज़दूर जब काम पर होता है
उसका काम बोलता है
बैलों के गले में घंटियों की तरह

वह आपकी तरह नहीं चाहता कि
बैठे बैठे हंसते रहें
किसी काम करते हुए को देखकर

उसके दिलों में एक अजीब बेचैनी रहती है
जो आप कभी नहीं समझ पाएँगे!

उसके माथे पर सूरज ऐसे आता है
जैसे सत्तर हजार सालों से
कोई रोजगार का रिश्ता हो उससे

उसके माथे पर पंडूक बैठ जाते हैं
जब वह
देश और पृथ्वी के हक में हरियाली दान कर रहा होता है
उसे पृथ्वी अपनी बाहों में ऐसे कस लेती है
जैसे
चार दिन से भुलाए हुए
कोई जंगली चिड़िया की माँ अपने मासूम बच्चे को
अपने अंतहीन आँचल में कस के पकड़ लेतीं हैं

एक खेत मज़दूर जब दूर खेत में काम पर होता है
खेतों का सोलह सिंगार कर रहा होता है
उसके काम में देश का संगीत गूंजता है
और आप नागरिकता की गिटार की बात कहते हैं
जिसके हम तार तोड़ चुके हैं

जो आपके कहने से कभी नहीं बज़ सकेगा!

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