आलेख

नेपाल ; एक नए राष्ट्र निर्माण का संकट

– रोशन जनकपुरी; अनुवाद-पवन पटेल

 

हम लोगों की जानकारी में नेपाल का इतिहास अधिकतम 500 बरस पुराना है. हमारा इतिहासबोध प्राचीन राष्ट्र की परिभाषा की तुलना में जनपद, देश व राज्य के अर्थ में ज्यादा भावनात्मक और वैश्विक भाव अपने भीतर समाये हुए है. सोलहवीं-सत्रवहीं शताब्दी के आसपास यूरोप में पहली बार उदित नए राष्ट्रों में जातीय वीरता व गौरव और पारम्परिकता के मूल्यों से लैस राष्ट्रीय झंडे, राष्ट्रगीत व राष्ट्रीय प्रतीक राष्ट्र-राज्य (नेशन स्टेट) के परिचय के रूप में खड़े किये गए.

संघीय नेपाल का राजनितिक नक्सा

प्रारम्भ में इस नए नेशन स्टेट ने न्याय, अस्मिता, मानवीय गरिमा व सुरक्षा के आश्वासन के बदले अपने नागरिकों से देशभक्ति की अपेक्षा रखी. लेकिन राष्ट्र के भीतर के वर्गीय विभेद तथा नए आर्थिक मूल्यों के उभरने अर्थात श्रम, पूँजी व बाजार की आपस में प्रतिस्पर्धा और राष्ट्रों की असमान स्थिति ने विविध प्रकार के संघर्ष उत्पन्न कर दिए. इस प्रकार बाजार का आधिपत्य कायम करने के लिए राष्ट्रीय गौरव के आड़ में शक्तिशाली राष्ट्रों ने पडोसी मुल्कों से ले सुदूर इलाकों में स्थित राष्ट्रों के हितों की उपेक्षा करते हुए उनका शोषण करना आरम्भ कर दिया.

स्पेन, पुर्तगाल, इंग्लैंड व फ़्रांस जैसे शक्तिशाली देशों ने पिछड़ी चेतना से ग्रस्त एशिया, अफ्रीका व लैटिन अमेरिकी राष्ट्रों व द्वीपोँ पर कब्ज़ा ज़माकर वहां के श्रम-संसाधनों को लूटना शुरू कर दिया. इसी के परिणामस्वरुप साम्राज्यवाद का जन्म हुआ जो वर्तमान विश्व के लिए भयंकर अभिशाप सिद्ध हुआ है.

शक्तिशाली राष्ट्रों ने चमड़ी के रंग, विकसित तकनीक व मजबूत सैन्य बल के आधार पर अपने को श्रेष्ठ सिद्ध किया और उन पर अपने शासन करने की योग्यता के अधिकार को स्थापित किया. इसके परिणामस्वरुप गरीब और कमजोर राष्ट्रों के भीतर अपने आस्तित्व की रक्षा करने की चेतना विकसित हुई.

राष्ट्र के भीतर की वर्गीय चेतना से लैस होकर वे ‘फूट डालो, राज करो’ के उद्देश्य से गठित शासक वर्ग के विरुद्ध सीधे टकराने की जगह परंपरा, संस्कृति, धर्म व अमूर्त प्रतीकों की रक्षा के लिए भावनात्मक संघर्ष चलाने को प्रेरित हुए. दूसरी तरफ इन राष्ट्रों के शासक वर्गों को शक्तिशाली राष्ट्रों के सम्मुख घुटने टेकते देख इनका श्रमजीवी समुदाय संसार भर के श्रमजीवी वर्ग के साथ एकजुट होकर संघर्ष चलाने को तैयार होने लगा.

नेपाल में परंपरागत राष्ट्रवाद का विकास 1816 की सुगौली संधि के काल से ले राजा महेंद्र द्वारा 1960 के दशक में स्थापित पंचायत व्यवस्था की अवधि में हुआ था. नेपाल के संकीर्ण राष्ट्रवादियों ने राजा पृथ्वी नारायण शाह को राष्ट्र निर्माता के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि वे आक्रमणकारी, धूर्त व गोर्खाली अहंकार से ग्रस्त एक शासक के अलावा और कुछ नहीं थे.

राष्ट्रवाद एक जीवनशैली, परंपरा व इतिहास सभी को आत्मसात कर लेने की क्षमता रखने वाली चिंतन धारा होती है. हिटलर कहा करता था, जहाँ-जहाँ जर्मन लोग बसे हैं, वहीँ जर्मनी हुआ. लेकिन पृथ्वी नारायण शाह तो गोरखाली खस जाति के अलावा दूसरे खस जातियों और समुदायों के आस्तित्व को ही इन्कार करता था. इसीलिए तो देश की रक्षा के लिए अपने भाई-बंधुओं व सरदारों को मरते वक्त दिए गए अपने “दिव्य उपदेश” में वह कहता है- “पूरब व पश्चिम के खस ब्राह्मणों को दरबार में कभी मत रखो, क्यूंकि ये बाहरी लोग दरबार में आकर अशांति और अव्यवस्था कायम कर देंगे”.

गोरखा राज्य के ब्राह्मण, खस, गुरुंग व मगर परिवारों से आये कुछ चुनिन्दा लोग ही पृथ्वी नारायण शाह के सबसे वफ़ादार सरदारों में गिने जाते थे. खुकुरी के बल पर किया गया उनका राज्य विस्तार वस्तुतः उनके अपने बाहुबल का ही परिणाम था. पृथ्वी नारायण शाह से ले गीर्वाण युद्धविक्रम शाह तक की शासक पीढ़ी तक नेपाल में राष्ट्रवाद नाम का कोई केन्द्रीय तत्व व समर्पण कदापि नहीं पाया जाता था. जो था, वह केवल शाहवंशीय गोरखाली शासक परंपरा का दंभ मात्र था.

उन्नीसवीं शताब्दी के शासकीय आदेशों में “गोरखा अधिराज्य” व “मुकाम काठमांडू” का उल्लेख पाया जाता है. अपनी राजधानी गोरखा से काठमांडू स्थान्तरित करने के बावजूद भी उनके द्वारा स्थापित मुल्क गोरखा अधिराज्य ही था. इसीलिए तो शाहवंशीय राजा शुरू में “नेपालाधीश” (नेपाल के राजा) नहीं बल्कि “गोरखाधीश” (गोरखा के राजा) कहलाते थे. यही कारण था कि कालांतर में ब्रिटिश इंडियन एम्पायर के अधीन भारतीय सेना के मातहत गठित की गयी गोरखा रेजीमेंट में गोरखा अधिराज्य की सीमा में रहने वाले विभिन्न जातियों, नस्लों व समुदायों के लोग शामिल किये जाते रहे. नेपाल के मायने उस समय काठमांडू, ललितपुर व भक्तपुर के बीचोबीच बसी घाटी में निवास कर रहे नेवार समुदाय से लगाए जाते थे.

नेपाल में हिन्दू जातीय शासकीय बोध व भाषाई चेतना से संगठित राष्ट्रवाद का जन्म राणा शासकों के 1854 में सत्ता कब्ज़ा करने के पश्चात हुआ. दक्षिण में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों के समक्ष राणा शासक वर्ग के घुटने टेक देने की प्रक्रिया ने इस राष्ट्रवाद को खाद पानी दिया. बकौल मार्क्सवादी समझदारी के यह कहना उपयुक्त होगा कि नेपाल का परंपरागत राष्ट्रवाद नेपाल के सामंत वर्ग व पूँजीवाद के गठजोड़ से बाज़ार की सेवा के निमित्त ही विकसित हुआ है.

उन्नीसवीं शताब्दी के अंत व बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दू जातीय शासकीय राष्ट्रवाद ने राजा महेंद्र द्वारा स्थापित पंचायती शासन प्रणाली के तहत पूर्णता प्राप्त की. राज्य के मनमाने हस्तक्षेप ने जनसमुदायों व भू-सम्बन्धों के बीच तनाव को जन्म दिया और अपनी ही जमीन पर बेदखल कर अपरिचित करार कर दिए लोगों तथा समुदायों की यह कथा राष्ट्रवाद की इस ऐतहासिक प्रक्रिया का अनिवार्य वृतांत (नैरेशन) बन गयी. मकवानपुर के राजा ने तराई में कई पीढ़ियों से रह रहे किसानों को खेती बाड़ी करने के लिए उन्हें बसाया था, परन्तु गोरखाली शाह राजाओं ने तराई में खेती करने के लिए ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य की सीमा क्षेत्र में रहने वाले किसानों को प्रोत्साहित किया.

बकौल इतिहासकार महेशचन्द्र रेग्मी, उन्नीसवीं शताब्दी में नेपाल के राजा ने स्वयं एक अंग्रेज को एक तयशुदा राशि की एवज में तराई में लकड़ी का ठेका दिया था. जंगबहादुर के सत्ता हथियाने के बाद राज परिवार के सदस्यों, पहाड़ी ब्राह्मणों व क्षेत्री समुदाय के लोगों को तराई में जमींदारी प्रदान की गयी. इस तरह तराई की खेती योग्य जमीन पर पहाड़ी लोगों का कब्ज़ा होता चला गया और पीढ़ियों से रहते हुए यहाँ के स्थानीय किसान “अन्य” हो गए.

सन 1920 से राणा प्रधानमन्त्री चन्द्रशमशेर ने ब्रिटिश भारत के पूँजीपतियों को तराई में जमींदारी प्रदान करते हुए उन्हें जमीन की खरीद फरोख्त का अधिकार भी प्रदान करना शुरू कर दिया. भारत से इन पूँजीपतियों के साथ जंगल काटकर खेती योग्य जमीन तैयार करने का हुनर जानने वाले मजदूर भी साथ में आये. इस के साथ ही राणा शासकों ने “नेपाली शासन के अधीन जनता बनाम बाहरी शासन की जनता का सवाल” खड़ा करना शुरू कर दिया. फलतः यहाँ से नेपाल में पहली बार नागरिकता का सवाल खड़ा होना शुरू हो गया. भू-व्यवस्थापन में दो महत्वपूर्ण परिवर्तन किये गए. सैन्यबलों, राजकीय व सरकारी कर्मचारियों को नगद वेतन देने की व्यवस्था कर उन्हें अभी तक वृत्ति के रूप में दी जा रही “नन्कर” व “जागीर” देने की प्रथा राणा प्रधानमंत्री चन्द्रशमशेर ने 1923 में समाप्त कर दी तथा इस जमीन को रैकार (जो जमीन राज्य के मातहत हो) में परिणति कर स्वयं राजस्व उठाना शुरू कर दिया.

पूर्वी तराई में राजा के पूर्ण स्वामित्व में पड़ने वाली रैकार जमीन पर खेती करने वाले किसानों को प्रोत्साहन स्वरुप राजस्व जमा करते जाने तक उस जमीन पर उनके पुश्तैनी अधिकार को सुरक्षित माना गया. राजस्व के दायरे से बाहर बिर्ता जमीन (टैक्स फ्री लैंड) पर जहाँ किसानों की स्थिति खेत मजदूर से ज्यादा भिन्न नहीं थी, वहां बंटाईदार के अधिकार को कायम रखा गया. इस प्रकार राणा शासन ने देश की सम्पूर्ण खेती योग्य जमीन में यह व्यवस्था लागू कर एकरूपता कायम की. सन 1952 में जागीर वाली जमीन की व्यवस्था को पूर्णरूप से ख़त्म कर दिया गया. सन 1959 में बिर्ता जमीन को ख़ारिज करने के बाद कुशे बिर्ता (राजा द्वारा ब्राह्मणों को दान में दी गयी टैक्स फ्री लैंड को कुशे बिर्ता कहते हैं) लागू किया गया तथा धार्मिक संस्था के अंतर्गत पड़ने वाली गुठी जमीन (गुठी मंदिर-मठ को दी गयी जागीर होती है) के बाहर देश की 98 % जमीन रैकार अर्थात राज्य के मातहत मानी गयी.

भूमि व किसानों के बारे में शासकीय सम्बन्धों में हुए इस परिवर्तन ने जहाँ एक ओर पहाड़ में रहने वाले लोगों को सामंती अहंकार से लबालब भर दिया, वहीँ दूसरी ओर नेपाली शासक वर्ग ब्रिटिश साम्राज्य के सामने पहले से ही घुटने टेक कर बैठा हुआ था. इस ऐतहासिक प्रक्रिया में ब्राह्मण-छेत्री एक जगह इक्कट्ठे होकर शासक वर्ग में परिणत हो गए और दूसरी तरफ सदियों से पूरब से लेकर नेपाल की तराई में पीढ़ी दर पीढ़ी रहते आये स्थानीय किसान व मजदूरों के विभिन्न पक्षों का निर्माण हुआ.

राणा शासन के वर्ष 1951 में पतन के बाद गठित नेपाल की अंतरिम सरकार देश का प्रजातान्त्रिक संविधान बनाने के लिए एक भारतीय सलाहकार की सलाह पर नेपाली नागरिकता देने के लिए एक संविधानिक दस्तावेज़ लायी, जिसके अनुसार “नेपाल में जन्मे व कम से कम माता-पिता की एक पीढ़ी के नेपाल में रहने का प्रमाण तथा 5 वर्ष से नेपाल में रह रहे लोगों को नागरिकता प्रदान करने के लिए श्री 5 की सरकार (श्री 5 की सरकार का मतलब राजा की सरकार होती है. नेपाल में राजा को 5 बार सलाम करने का चलन है. वहीँ राणा प्रधानमंत्री को 3 बार. इसलिए राणा शासन को श्री 3 की सरकार भी कहा जाता है. व्यंग के रूप में गणतंत्र नेपाल के प्रधानमंत्री को भी श्री 3 की सरकार कहने का चलन है) से बाकायदा आग्रह करने का प्रस्ताव किया गया था.”

सन 1960 में राजा महेंद्र ने निर्वाचित संसद भंग कर दी और 1962 में दलविहीन पंचायती प्रजातंत्र का मुखौटा पहनकर निरंकुश राजतंत्र का शासन आरम्भ कर दिया. पंचायती प्रजातन्त्र नामक इस राजतंत्रात्मक व्यवस्था के अंतर्गत मात्र नेपाली बोलने व लिख पाने वालों व नेपाल में कोई व्यवसाय करने के लिए अपने पुराने देश की नागरिकता छोड़ कर आये हुए लोगों तथा “नेपाली मूल” के नागरिकों को कम से कम 2 बरस और अन्य दूसरों को कम से कम 12 वर्ष तक नेपाल में रहने का प्रमाण प्रस्तुत करने वालों को नेपाली नागरिकता प्रदान करने वाला क़ानूनी प्रावधान लाया गया. किन्तु संविधान में वर्णित “नेपाली मूल” का अर्थ अपरिभाषित ही रखा गया. इसीलिए राजनीतिक पटल में नेपाल का मतलब “गोरखा अधिराज्य” माना गया तथा नेपाली भाषा का मतलब शाहवंशीय राजाओं द्वारा बोली जाने वाली खस भाषा समझी गयी. इसीलिए नेपाली जनता का मतलब नस्लीय रूप में राज परिवार से सम्बन्धित लोगों से लगाया गया. जिसके अंतर्गत बाहुन, छेत्री व ठकुरी समुदाय आते थे.

राणा शासन के अवसान के बाद पूरे अधिराज्य में शैक्षिक भाषा के रूप में घोषित राष्ट्रभाषा “नेपाली” सन 1962 में लागू नागरिकता कानून के लिए अनिवार्य बना दी गयी. तत्पश्चात “नेपाली होने” का मतलब नेपाली भाषी व राजपरिवार की नस्लीय पहचान में जन्मे आस्तित्व का “होना” रह गया. इस तरह नेपाल का एक “राष्ट्रीय राज्य” में पदार्पण हुआ. यह नेपाल के आधुनिक इतिहास में घटित हुई सबसे विशिष्ट प्रकार की परिघटना थी.

गोरखाली शाह राजाओं के साम्राज्य विस्तार के पहले “सदियों” से इस भूमि पर निवास करने वाले समुदायों तथा मैथिली, भोजपुरी व अवधी आदि अन्य गैर नेपाली भाषा बोलने वाले लोगों के लिए अब एक विचित्र असमंजस की स्थिति पैदा हो गयी. मायने कि वे न घर के रहे और न घाट के ! चूँकि उनकी मातृभाषा “नेपाली” नहीं थी, इसीलिए पहाड़ में रहने वाले नेपाली भाषी लोगों द्वारा उनकी नागरिकता पर खुलेआम प्रश्नचिन्ह लगाया जाना शुरू कर दिया गया. शहर से ले गाँव के चुनाव तक या जमीन की खरीद-फरोख्त, नौकरी, व्यवसाय, शिक्षण तक सभी सरकारी पेशों में प्रायः सभी जगह नागरिकता का प्रमाणपत्र लगाना अनिवार्य कर दिया गया. जिनके पास नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं था, वे लोग आर्थिक व राजनीतिक रूप में सार्वजनिक जीवन (पब्लिक स्पेस) से अलगाव की स्थिति में चले गए. गैरनेपाली अथवा नेपाली नागरिक होने का प्रमाणपत्र जिला प्रशासक की संस्तुति पर निर्भर करता था, जो प्रायः नेपाली भाषी ही हुआ करते थे.

सन 1975 से नागरिकता के प्रमाणपत्र की फोटो में ढाका टोपी लगी होने की अनिवार्यता ने नेपाली रूप का कैनवास भी निर्मित कर दिया. इस प्रक्रिया की अभिव्यक्ति नेपाल में एक देश, भाषा व वेशभूषा से निर्मित नस्लवादी संकीर्ण राष्ट्रीयता की एकरूपता के रूप में हुई और केवल इस आधार पर ही राज्य की नजर में नागरिकता प्राप्त करने वाले सभी लोग समान थे. यह ‘नेपाली रूप’ उन्नीसवीं शताब्दी में राणा शासकों द्वारा भू-राजस्व में बढोत्तरी के उद्देश्य से नेपाल के आंतरिक निवासी (भीतरिया) या बाहरी निवासी (बाहरिया) कहकर जनता की पहचान पर प्रश्नचिन्ह लगाने से शुरू होकर संकीर्ण राष्ट्रीय एकरूपता अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची. जिसके मूलमर्म में शासक जाति की विजयी गाथा, धर्म, परंपरा, वेशभूषा व भाषा थी.

माओवादी जनयुद्ध ने इसी परिघटना को “हिन्दू उच्चजातीय खस अहंकारवाद” के रूप में परिभाषित किया था. भले ही हमारे वर्तमान संविधान ने नेपाली जनता को “राष्ट्र” कहा हो और संकीर्ण राष्ट्रीयता और उसके “नेपाली रूप” को अस्वीकार किया हो. परन्तु जरा गौर से नेपाल के संविधान की अंतर्वस्तु देखने पर समझ में आता है कि सामंतवादी कार्य प्रणाली से विकसित राष्ट्रीय प्रवत्ति व प्रतीकों के प्रति आकर्षण अभी तक ज्यूँ का त्यूं बरक़रार है.

चाहे जातिगत, क्षेत्रीय व पिछड़े समुदायों के आरक्षण का मसला हो या धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सनातन हिन्दू धर्म के संरक्षण का मामला हो अथवा राज्यसत्ता में जातिगत, भाषाई व क्षेत्रीय समुदायों की पहुँच व उनके लिए अवसर उपलब्ध कराने का सवाल हो और सैन्यबलों में एकल जातीय (मोनोलिथिक) धार्मिक पहुँच, व्यवहार, प्रवत्ति का प्रश्न, सब जगह पारंपरिक रूप से कायम शासकीय जातीय वर्चस्व स्पष्ट रूप से नजर आता है.

नयी राज्यसत्ता को कम से कम इस संविधान के अनुकूल गणतान्त्रिक राष्ट्र निर्माण के प्रतीकों व बिम्बों (मेटाफ़र) का सृजन करते हुए जनता में यह बड़े पैमाने पर प्रचारित करना चाहिए था. लेकिन प्रधानमंत्री केपी ओली द्वारा स्वयं “हिमत्वखण्ड” जैसे आयोजन में सहभागिता दिखाकर प्रतिक्रियावादी मूल्यबोध से लैस निरंकुश राजाओं, कवियों व समाज के पुरातन नायकों को ही देश के बहादुर पूर्वजों के रूप में महिमामंडित करने के बाद कहने को कुछ बचा नहीं रह जाता. साथ ही नेपाली सेना द्वारा राजतंत्र के समय से विकसित एकात्मक जातीय व धार्मिक प्रतीक व उत्सवों को संस्थागत (इंस्टीट्यूशनल) रूप में मनाने के उपक्रम ने नेपाली राज्य के प्रतिक्रियावादी चरित्र को स्पष्ट कर दिया है.

इन सब कारनामों से अब आस्तित्व में आई तथाकथित नयी राज्यसत्ता ने समग्रता में नेपाली राष्ट्र की तर्कशीलता, उदात्तता, आशा और आश्वासन सबको धूल धुसरित कर दिया है. जहाँ एक ओर पारंपरिक शासक जातीय समूह अपने स्वर्णिम गौरवशाली अतीत और निरंतर खत्म होते जाते सदियों पुराने वर्चस्व को बचाने के लिए उत्साह से कमर कसे खड़े हैं, वहीँ दूसरी ओर ऐतहासिक भेदभाव से मुक्ति पाने के लिए लगातार संघर्षरत उत्पीडित जातीय समूह अपने आस्तित्व को बचाने के लिए अतिवादी विचारधारा (रेडिकल आइडियोलॉजी) की तरफ आकर्षित होते दिखते हैं. बिलकुल इसी समय पर विखंडनवादी विचारधारा इस अवसर का लाभ उठाकर अपने औचित्य को साबित करने का प्रयास करती है.

सन 1929 के इर्दगिर्द जर्मनी में वाईमर गणतंत्र के बारे में अमेरिकी पत्रकार ई. मारर का यह उद्धरण नेपाल के समकालीन सन्दर्भ के लिए बिलकुल उचित जान पड़ता है. “ऐसे गणतंत्र के बारे में क्या कहना जो अपने कानून की व्याख्या करने का आदेश राजतन्त्रवादी न्यायाधीश को दे तथा अपने राज्य को चलाने का आदेश पुरानी राज्यसत्ता के प्रति वफ़ादार पुराने जमाने के नौकरशाहों को सौंप दे. यह गणतंत्र उदासीन व निष्क्रिय होकर मूकदर्शक बना देख रहा है और वो भी टालमटोल के भाव से. जबकि प्रतिक्रियावादी स्कूल के मास्टर अपनी शिक्षण पद्दति के माध्यम से हमारी भावी संतानों को वर्तमान के प्रति घृणा करना और गौरवशाली सामंती अतीत के प्रति प्रेम करना सिखाते हैं. उन लोक तंत्रवादियों (डेमोक्रेटस) को क्या कहें, जो वर्तमान राज्य पर हमला करने वाले पूर्व राजा-महाराजाओं को धन दौलत देकर मदद करते हैं और गद्दी से बेदखल कर दिए गए भूतपूर्व सम्राट को अभी भी यह मानकर चलते हों कि जैसे उसका राष्ट्र की संपत्ति पर अधिकार यथावत कायम हो. साथ ही यह गणतंत्र हजारों भूतपूर्व सरकारी नौकरशाहों को उदारतापूर्वक पेंशन बाँटता है, जिन्होंने इस गणतंत्र को जड़ से उखाड़ फेंकने के अपने प्रयासों में कभी कोताही नहीं बरती.”

इतिहास पढ़ने वालों को पता है कि उसी वाईमर गणतंत्र की लोकतान्त्रिक पद्दति के जरिये फासीवाद के प्रवर्तकों में से एक सबसे कुख्यात जर्मन तानाशाह रुडोल्फ हिटलर का अवतरण हुआ था. हमारा संघीय लोकतान्त्रिक गणतंत्र भी करीब-करीब उन्ही स्थितियों से गुजर रहा है. और तो और यहाँ तो सत्ता के उच्च शिखर पर बैठे सत्ताधारी अपने आपको सड़ी गली प्रतिक्रियावादी मनःस्थिति के व्यामोह से मुक्त करना जरुरी नहीं समझते. देश में नए राष्ट्र निर्माण व न्यूनतम स्तर पर समाजवाद उन्मुख नई राजनैतिक व्यवस्था के स्थायित्व के लिए पुराने राष्ट्रीयता बोध (राष्ट्रवाद) के साथ सम्बन्ध विच्छेद करना अति आवश्यक है. क्यूंकि तभी तो मेहनतकश जनता के अथक परिश्रम व संघर्ष से उपजे वर्तमान के निर्माण को केंद्र में रखा हुआ नया विचार व इसकी राजनीति प्रैक्टिस के स्तर पर कार्यान्वित हो सकेगी. परन्तु वर्तमान में नेपाली राज्य की गतिविधियों को देखकर कहा जा सकता है कि यहाँ एक नेपाली हिटलर की खौफनाक प्रतीक्षा के अलावा और दूसरा कुछ भी संभव नहीं है.
——
(रोशन जनकपुरी नेपाल के प्रतिष्ठित मैथिली कवि और एक प्रखर राजनैतिक विश्लेषक हैं. यह लेख 7 अक्टूबर, 2018 को नेपाली दैनिक अखबार “नयाँ पत्रिका” में “नयाँ राष्ट्र निर्माणको संकट” शीर्षक से प्रकाशित हुआ था. अनुवादक- पवन पटेल कवि व नेपाली समाज के एक भारतीय छात्र हैं.)

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