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सरकार कोई भी हो किसानों का संघर्ष जीवन-मरण का है

सरकार कोई भी हो किसानों का संघर्ष जीवन-मरण का है !!
– मोहन सिंह
(गांधीवादी लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता)

भारत सरकार ने हाल में कृषि सुधारों से संबंधित जो तीन विधेयक पास किये हैं उसके विरोध में देश के कुछ हिस्से में किसान सड़क पर हैं। क्या है इसकी असली वजह?

असली सवाल है जो इस बिल के विरोध को लेकर पैदा हो रहे हैं। वह यह कि कहीं इस बहाने सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य और कृषि उपज बाजार समिति जैसे किसानों के सुरक्षा कवच के उपाय खत्म तो नहीं कर देगी? विपक्ष द्वारा और खासकर पंजाब और छत्तीसगढ़ की सरकारों ने यह सवाल उठाया है कि यह विधेयक एमएसपी अधिनियम यानी ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ को प्रस्थापित करेगा और एपीएमसी मंडियों यानी ‘कृषि उपज बाजार समिति’ के कामकाज को भी प्रभावित करेगा।

इन राज्य सरकारों को इस बात पर भी ऐतराज है कि यह विधेयक राज्यों की विधान बनाने की शक्तियों का सरासर उल्लंघन करता है। आशंका इस बात को लेकर भी है कि बिना किसी विनियमन के व्यापारी किसानों का शोषण कर सकते हैं। इसके प्रत्युत्तर में सरकार की ओर से कहा गया है कि यह विधेयक किसानों के मौजूदा न्यूनतम समर्थन मूल्य के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं करता। इसके उलट किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए अतिरिक्त विपणन का चैनल प्रदान करने का काम यह विधेयक करेगा। यह भी कि विपणन के अतिरिक्त चैनल की व्यवस्था होने से किसानों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की सेवा में और संचालन में दक्षता की गुंजाइश की संभावना भी रहेगी।

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की तरफ से कहा गया है कि ढूंढ न्यूनतम समर्थन मूल्य एक प्रशासनिक व्यवस्था है न कि संवैधानिक बाध्यता। न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार की प्राथमिकताओं में हमेशा शामिल रहेगा इसके तहत सरकार कृषि उपज की खरीद राज्य एजेंसियों के माध्यम से करती है। राज्य सरकार कृषि उपज बाजार समिति को खरीद केंद्रों के रूप में घोषित कर सकती है और इस नीति में कोई परिवर्तन नहीं किया गया हैं।

एक और आशंका व्यक्त की जा रही है कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत किसानों के लिए पर्याप्त सुरक्षा के उपाय नहीं किए गए हैं। ऐसी स्थिति में बहुत संभव है कि व्यापारी जरूरतमंद किसानों का निर्बाध तौर से शोषण करें। सरकार की ओर से यह भी दावा किया गया है कि चूंकि कृषि समवर्ती सूची की प्रविष्टि 33 के तहत दर्ज हैं इसलिए केंद्र सरकार उक्त प्रावधान के तहत कानून बनाने के लिए सक्षम और सशक्त है।

गौरतलब है कि इस नियम का हवाला देकर पंजाब सरकार उक्त कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के बारे में भी सोच रही है। पंजाब और हरियाणा के किसान इस कानूनों का घोर विरोध कर रहे हैं। तो इसकी एक वजह यह भी है कि इस कानून के बनने से सबसे ज्यादा नुकसान होने की आशंका भी इन दोनों राज्यों के किसानों को हैं। एक अनुमान के अनुसार पंजाब के सोलह हजार गांवों में लगभग बारह गांवों तक कृषि उपज बाजार समितियों की पहुंच हैं। इन गावों तक सड़क मार्ग से जुड़ाव मंडी समिति से प्राप्त आय से ही संभव हुआ है। पंजाब कृषि उपज बाजार समिति का लगभग 8.5% मंडी समिति वसूल करती हैं। पंजाब और हरियाणा मंडी समितियों के जरिए पूरे देश में गेहूं और धान की उपज का बड़े हिस्से की खरीद करते हैं।

पूरे देश में विकास शुल्क आढ़तियां कमीशन और मंडी शुल्क के नाम पर केंद्र सरकार को हर साल धान और गेहूं की खरीद पर 6% अतिरिक्त टैक्स अदा करना है। अपने देश 8600 करोड़ रुपये इस खरीदारी के मद में खर्च होते हैं। जीएसटी लागू होने के पहले फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 13% टैक्स के अलावा और कई तरह की लेवी देनी पड़ती थी। जो पूरे देश में किसानों को भुगतान किया जाता था। जुलाई 2017 में जीएसटी लागू होने के पहले एफसीआई को 2015-16 में 10,336 करोड़ रूपये पंजाब-हरियाणा, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और उड़ीसा को मंडी शुल्क और विकास के नाम पर भुगतान करना पड़ा था।

इन विधयकों के पास होने से केंद्र सरकार को जो विभिन्न टैक्स देने पड़ते हैं उससे छुटकारा तो मिलेगा ही, खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर होने वाले खर्च से भी काफी हद तक राहत मिलने की संभावना है। इससे सार्वजनिक वितरण प्रणाली, जो कोरोना काल में गरीबों, शहरों से गांव लौटें कामगारों के लिए लाईफ लाईन साबित हुई हैं, को कारगर बनाने में मदद मिलेगी। इससे अंततः उपभोक्ताओं को ही फायदा होने की उम्मीद है। बता दें कि गांव में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत महीने में दो बार और काफी दिनों तक मुफ्त में गेहूं और चावल का वितरण होता था, उसकी प्रति किलो सरकारी लागत गेहूं की ₹28 और चावल की ₹32 उपभोक्ताओं तक पहुंच कर पड़ती है। अपात्रों को इस योजना से अलग करना और सीधे उपभोक्ताओं के खाते में सब्सिडी पहुंचाने की योजना पर सरकार काम कर रही है। इन तमाम फायदों और स्पष्ट दृष्टिकोण के बावजूद किसानों को इस बात लेकर आशंका हैं कि आखिर विधेयकों में लिखित रुप में इसका प्रावधान क्यों नहीं किया गया की मंडी के बाहर जो भी व्यापारी कांट्रैक्ट फार्मिंग के तहत या अनाज की खरीदारी करेगा वह न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम मूल्य अदा करने पर कानूनी तौर पर दंडित किया जाएगा।

पी साईंनाथ जैसे कृषि विशेषज्ञ इसके लिए एक चौथा विधेयक पेश करने का सुझाव सरकार देते हैं। इसके आलावा कि कृषक और व्यापारी के बीच होने वाले कांटेक्ट में अगर कोई एक पक्ष वादे के मुताबिक समझौते का पालन नहीं करता तो इसकी सुनवाई एसडीएम के बजाय अलग से स्थापित स्वतंत्र न्यायिक प्राधिकरण के तहत हो और समझौते के तहत 15% बैंक में जमानत राशि के रूप में जमा करने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। ताकि व्यापारी जरूरतमंद किसानों का अनावश्यक शोषण ना कर सकें। यहां यह जानना भी रोचक है कि जिस न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर किसान आज पूरी तरह से नाराज होकर आजकल सड़क पर नजर आ रहे हैं, उसके तहत पूरे देश में महज 6% से 8% तक किसानों के उत्पादों की खरीदारी ही न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर हो पाती है। जिस कृषि उपज बाजार समिति के तहत कृषि उपजों के खरीद की बात की जा रही है वहां यह देखने में आया है कि 90% मंडी समितियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर किसानों के उत्पादों की खरीदारी नहीं होती है।

इससे आढ़तियों और बिचौलियों के मकड़जाल पता तो चलता ही हैं, इस तबके की छटपटाहट की वजह भी समझ आती हैं कि किसान रुपी मछली बचकर जाए कहां जब जल ही हो गया जाल। अच्छे मकसद से लाए गए किसी बिल का क्या हस्र होता है, इसे पंजाब के उदाहरण से ही समझा जा सकता है। संस्थागत रूप से कृषि में सुधार की शुरुआत पंजाब में राजस्व मंत्री रहे सर छोटूराम के प्रयास से शुरू हो जाती है।पंजाब ऋणदाता कानून 1936 और पंजाब कृषि उपज बाजार कानून 1939 जिसे मंडी कानून के नाम से भी जाना जाता हैं। ऋणदाता कानून का मकसद था उस समय सूदखोरों के अनैतिक आचरण पर रोक लगाना। और मंडी कानून का मकसद था जो अधिकृत लाइसेंस धारक व्यापारी होंगे वही मंडी कानून के तहत किसानों से कृषि उपज खरीद सकते हैं। एक नेक इरादे से लाया गया कृषि उपज मंडी कानून तब से पंजाब में लागू है। बाद में पंजाब के मुख्यमंत्री रहे प्रताप सिंह कैरों के नेतृत्व में पंजाब कृषि उपज बाजार कानून 1961 प्रस्तुत हुआ। कृषि उपज बाजार समिति को राज्य सरकार के अधीन कर दिया गया। इस कानून की खामियां अब यह समझ में आ रही हैं कि किसान अपनी पैदवार बेचने के लिए मंडियों, आढ़तियों और बिचौलियों पर आश्रित हो गए। यहीं नहीं केंद्र सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए एफसीआई के जरिए जो खाद्यान्न खरीदने पड़ते हैं, उस पर भारी भरकम टैक्स की अदायगी भी करना पड़ता हैं।

बदले कृषि कानूनों के तहत सरकार अब दावा कर रही है कि कृषि उत्पादक, उपभोक्ता और खरीदार तीनों को फायदा होने की उम्मीदें हैं। किसानों को अपनी उपज का लाभकारी मूल्य कैसे मिलें, इसका एक उल्लेखनीय काम सर छोटूराम ब्रिटिश हुकूमत के दौरान कर गए हैं। वाकया यह है कि चालीस के दशक बंगाल में भयंकर अकाल पड़ा था। ब्रिटिश हुकूमत इस बात पर अड़ी थी कि पांच रुपये प्रति मन के हिसाब से गेहूं की खरीद की जाएगी। इस बाबत राज्यों के कृषि मंत्रियों की बैठक बुलाई गयीं। उस वक्त ब्रिटिश हुकूमत के फरमान के आगे किसी भी मंत्री की जुबान खोलने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी। सर छोटू राम ने ऐलान किया कि नौ रुपये प्रति मन से कम भाव पर एक छटांक गेहूं पंजाब से बाहर नहीं जा पाएगा। तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत को सर छोटूराम की यह बात माननी पड़ी़ं। कचल मिलाकर कोई भी कानून चाहे जितने भी नेक इरादे से लाया गया हों, किसान अपने उत्पाद के सुरक्षा कवच प्राप्त करने के लिए ही संघर्षरत हैं और आजकल सड़क पर उतरे हैं। खेती किसानी भले ही देश की बड़ी आबादी के जीविका का आधार हो और किसान अन्नदाता के रूप में सब का भरण पोषण करते हैं। पर सरकार को कोई कानून बनाने के पहले उन 86.2% छोटे और सीमांत किसानों के हितों का ध्यान रखना होगा जिनके हिस्से 0.86 हेक्टेयर जमीन हैं। जो बटाईदार किसान हैं। सरकार यह दावा कर रही है कि यह कानून इन किसानों के हितों की रक्षा करने में सक्षम है। सरकार का इन कानूनों के सुधार एक मकसद शायद यह भी है कि कृषि क्षेत्र को निजी पूंजी निवेश के लिए आकर्षक बनाये जाएं।

फिलवक्त कृषि निजी निवेश के लिहाज से कतई आकर्षक क्षेत्र नहीं रह गया है। एक सर्वे के मुताबिक अगर किसानों को खेती के अलावा कोई दूसरा विकल्प मौजूद हो तो 42% लोग खेती छोड़ने के लिए तैयार हैं। खेती पर जनसंख्या का दबाव भी बहुत है। खेती का क्षेत्रफल लगातार घट रहा है, जबकि खेती में काम करनेवाला की जनसंख्या इस दौरान खासा इजाफा हुआ हैं। एक अनुमान के मुताबिक सन 1970/71 और सन 2015/16 में खेती में लगे लोगों की संख्या 71 मिलियन से बढ़कर 145 मिलीयन यानी लगभग दुगनी हो गई हैं। जाहिर है कि इतनी बड़ी आबादी के लिए खेती भले ही उनके भरण-पोषण और जीविकोपार्जन का जरिया बनी रहें, लेकिन एक लाभदायी व्यवसाय के रुप में अब कृषि इतनी सक्षम नहीं रह गई है।

एक तरह से यह कानून खेती व्यवसायीकरण की दिशा में अगला कदम हैं। एक आरोप यह भी लग रहा है कि आवश्यक वस्तु संशोधन के जरिये जमाखोरों को बढ़ावा मिलेगा। इसका विरोधाभासी रुप सामने आता हैं। मसलन आलू और क्या सब आवश्यक वस्तु अधिनियम से मुक्त है।जब इनकी पैदावार अधिक होती हैं और भाव औने-पौने मिलता है, किसान अपने भाग्य को कोसता है। जब भाव थोड़ा ऊपर चढ़ता है और इन किसानों के कुछ फायदे की उम्मीदें जगती हैं तो सरकार अपना बफर स्टाक जारी कर और निर्यात पर पाबंदी लगाकर किसानों की कमाई पर रोक लगा देती है। फिलहाल प्याज पैदा करने वाला किसान इस दुविधा से दो-चार हो रहा हैं।

अब कर्नाटक के किसान सरकार से मांग कर रहे हैं कि निर्यात पर लगी पाबंदी हटाई जाए और रोज किस्म के प्याज के प्रतिदिन 10000 टन निर्यात की अनुमति दी जाए। इसका यह मतलब नहीं है कि भारत में प्याज का निर्यात अधिक होता है। एक अनुमान के मुताबिक कुल प्याज उत्पादन का महज 10% ही निर्यात हो पाता है। नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी के अर्थशास्त्री इला पटनायक और राधिका पांडे का एक हालिया रिसर्च बताता है कि सन 2014 से 2019 के बीच सरकार ने प्याज के निर्यात नियमों में 17 बार तब्दीली की है। कीमतों के बेतहाशा उतार-चढ़ाव और सरकारी नीतियों में आए परिवर्तन की वजह से सब्जियों के दाम हमेशा अस्थिरता की चपेट में रहते हैं।इसकी एक वजह यह भी है कि सरकार सब्जियों और बागवानी उत्पादों का कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित नहीं करती है। कई बार न्यूनतम समर्थन घोषित होने के बावजूद उस कीमत पर सरकार खरीदारी नहीं करती हैं। बिहार इसका सबसे बेहतर उदाहरण है बिहार में सन 2006 में कृषि उपज बाजार समिति को भंग कर दिया गया था। सरकार ने मक्का का समर्थन मूल्य ₹1850 प्रति क्विंटल घोषित किया है। आज बिहार के किसानों को अपने मक्का उत्पादकों को आधा दाम भी नसीब नहीं हो रहा है। मक्का उत्पादक किसानों की इस बदहाली के लिए सरकार को ही दोषी माना जा रहा है।

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर बताते हैं कि बिहार सरकार ने इस बाबत कोई प्रस्ताव सरकार के पास नहीं भेजा है। जाहिर है कि अगले महीने होने वाले चुनाव में किसानों की यह बदहाली एक चुनावी मुद्दा भी हो सकता है। मक्के के न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित होने के बावजूद उस कीमत पर मक्के का खरीद न होना सचमुच सरकार की मंशा पर सवालिया निशान खड़ा करता है।

कांट्रैक्ट फार्मिंग को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं, कहा जा रहा है कि इससे कारपोरेट घरानों को फायदा होगा। यहां यह बताना जरूरी है कि कांट्रैक्ट फार्मिंग को पास करने वाला तमिलनाडु पहला राज्य है।तमिलनाडु में पिछले साल से ही यह कानून लागू है। आईटीसी ई चौपाल के जरिये कृषि उपज की खरीद कर रही है। किसान इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से देश और विदेश के बाजारों में भाव जान कर और पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद ही अपने उत्पाद बेचते हैं। आईटीसी का दायरा 10 राज्यों में 35,000 गांवों तक फैला हैं। इस दायरे के तहत किसान गेहूं धान, सोयाबीन, काफी और दलहनी फसलों की पैदावार कर अच्छी कमायी कर रहे हैं। इन बहु फसली योजनाओं से लगभग 4 मिलियन किसान लाभान्वित हो रहे हैं।

गौरतलब है कि जिन फसलों के समर्थन मूल्य सरकार घोषित करती है उसका दायरा लगातार बढ़ रहा है जबकि उसकी लागत भी कम नहीं हैं। एक अनुमान के मुताबिक एक किलो गन्ना पैदा करने में 28 से 32 लीटर और 1 किलो धान पैदा करने में 42 से 45 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। जाहिर है कि जितनी ज्यादा इन फसलों की पैदावार बढ़ेगी उतनी ही तेजी से भूजल का क्षरण होगा। जल खेती और दूसरे जरुरी काम के लिए आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जाएगा। इस वजह से पंजाब और हरियाणा को धान की और महाराष्ट्र को गन्ने के उत्पादन का दायरा कम करने के लिए सलाह दिए जा रहे हैं। इसकी तुलना में मोटे अनाजों के पैदावार का दायरा लगातार कम हो रहा है। हरित क्रांति के पहले मोटे अनाजों का दायरा 3.7 करोड़ हेक्टेयर था, जो अब घटकर महज 1.47 करोड़ हेक्टेयर रह गया है। इससे इन अनाजों से प्राकृतिक रूप से मिलने वाला आयरन, विटामिन ए, आयोडीन जैसे पोषक तत्व गरीब आदमी की थाली से गायब हो रहे हैं।

ये अनाज आम तौर पर पर्वतीय तथा कम सिंचित आदिवासी क्षेत्रों में बोये जाते हैं। इन फसलों का उत्पादन लागत भी कम आता हैं। ऐसे में जब सन 2023 को पौष्टिक, अनाज दिवस के रूप में मनाए जाने की तैयारी की जा रही है, इन फसलों के उपज का दायरा बढ़कर किसानों के लाभ कमाने की अच्छी गुंजाइश है।

कृषि मूल्य और लागत आयोग ने हाल में सरकार को सुझाव दिया है कि किसानों को खाद पर मिलने वाली सब्सिडी ₹5000 प्रति एकड़ के हिसाब से दो किस्तों में किसानों के खाते में सीधे ट्रांसफर किए जाए।ऐसी योजनाएं तेलंगाना में रयथू बंधु के नाम से लागू है। इस योजना के तहत किसानों को प्रति एकड़ ₹10000 की सब्सिडी दी जाती है। ऐसी एक योजना कालिया के तहत उड़ीसा सरकार ₹10000 प्रति एकड़ की सब्सिडी का लाभ केवल भू मालिकों को ही नहीं, बल्कि बटाईदार किसानों के लिए भी उपलब्ध कराती हैं। इसी तरह भूमिहीन किसानों को मुर्गी पालन के लिए ₹12500, मत्स्य पालन और बकरी पालन के लिए ₹25000 तक सहयोग 5साल तक उपलब्ध कराती है, ताकि छोटे और सीमांत किसान अपना कारोबार शुरू कर सकें और दूसरे लाभदायी योजनाओं का लाभ उठा सकें।

सरकारों के इन उपायों से ऐसा लगता है कि सरकार की मंशा यह है कि खाद्यान्नों की कीमत लगातार बढ़ाने के बजाय सीधे कैश ट्रांसफर करने की योजना किसानों के लिए ज्यादा मुफीद हैं। फिर भी खेती किसानी से संबंधित कोई कानून बनाते समय, जिसका दूरगामी असर पड़ता हो, सरकार का रुख लचीला होना चाहिए, ताकि सुझाव, सहमति और समझौते की गुंजाइश हमेशा बनी रहे। इस बीच एक अच्छी खबर यह है कि केंद्र सरकार ने पंजाब और हरियाणा को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान की खरीदारी 26 सितंबर से ही शुरू करने का आदेश जारी किया है। आमतौर पर 1 अक्टूबर से धान की खरीद शुरू होती है। अकेले पंजाब और हरियाणा से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 31% धान की खरीद होती है। इस साल पंजाब से 113 लाख टन और हरियाणा से 44 लाख टन धान खरीद का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।जबकि पूरे देश से 495.17 लाख टन धान खरीद का लक्ष्य रखा गया हैं।

इस साल समय से अच्छी बरसात होने से धान की बंपर पैदावार होने की उम्मीद है। इस समय जब पंजाब और हरियाणा के किसान अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं, जीवन मरण का संघर्ष कर रहे हैं, उन्हें अपने पुरखे यशस्वी किसान नेता सर छोटूराम की इन दो बातों पर जरूर गौर करना चाहिए कि “ऐ भोले किसान मेरी दो बात मान ले, एक अपने लिए बोलना सीख और दूसरा अपने दुश्मन को पहचान ले”

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