फिल्म समीक्षा

‘बलात्कार का प्रसाद’ नेपाली फिल्म की एक समीक्षा

बलात्कार का प्रसाद
-आहुति

आहुति

(नेपाली फीचर फिल्म प्रसाद की यह समीक्षा बलात्कार जैसे अति संवेदनशील विषय पर आधारित है। दिनेश राउत के निर्देशन और निर्माता सुभाष थापा की यह नेपाली फीचर फिल्म ‘प्रसाद’ दिसंबर, 2018 को रिलीज़ हुई थी। फिल्म के नायक बाबुराम परियार का किरदार निभाया है विपिन कार्की ने और नायिका नारायणी का किरदार निभाया नेपाली अभिनेत्री नमृता श्रेष्ठ ने और आहुति ने इस फिल्म की समीक्षा की है। नेपाली से अनुवाद- पवन पटेल)

सामान्यतया नेपाल में बनी और दिखायी जाने वाली फिल्मों के बारे में बुद्धिजीवियों का बड़ा हिस्सा शायद ही कभी कोई ख़ास दिलचस्पी दिखाता हो, अथवा इस बारे में ऐसी कोई बहस करता पाया जाता हो. सिनेमा सम्बन्धी विषय पर रूचि फिल्म निर्देशकों, कुछेक फिल्म समीक्षकों और इक्का-दुक्का शोधकर्ताओं की ही रही है.

नेपाल से लेकर बाहर विदेश में में बनी फिल्मे समाज को व्यापक स्तर पर स्वस्थ व अस्वस्थ विचारों में बुनी गयी संस्कृति द्वारा लगातार प्रशिक्षित करने का काम करती हैं. सिनेमा का क्षेत्र बिना किसी पाठ्यक्रम वाले मुक्त विश्वविद्यालय की तरह होता है, जहाँ फिल्म निर्देशक व पठकथा लेखक अपनी इच्छाओं के हिसाब से अपने मनोनुकूल निष्कर्ष दर्शकों को पढ़ा सकता है. इसके लिए वह मानव समाज में विकसित ललित कला की सभी विधाओं को एक साथ जोड़कर वांछित प्रयोग कर सकता है. जिस तरह विश्वविद्यालय एक विशिष्ट स्वभाव के विद्यार्थी पैदा करते हैं, उसी तरह से फ़िल्में समाज में विशिष्ट स्वभाव के मानव निर्मित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. और इस बात से कोई बिरला ही इनकार करेगा.

आज की दुनिया में ललित कला की बिभिन्न विधाओं में गीत संगीत के बाद फिल्मों के प्रति आम लोगों का झुकाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. इसका सीधा अभिप्राय यह है कि मानव के विचार और संस्कृति निर्माण में यह क्षेत्र उतने ही व्यापक स्तर पर अपना प्रभाव डाल रहा है. फिल्मों के माध्यम से व्यापक जन समुदाय के बीच जीवन के सभी आयामों से सम्बन्धित धारणाओं का प्रचार प्रसार किया जा सकता है.

जो बुद्धिजीवी जीवन के सभी आयामों से जुड़ा होगा, वह फिल्मों पर भी रूचि दिखाते हुए उन्हें अपने अध्ययन का विषय बना सकेगा.

बौद्धिक बहस छेड़ने के लिए उत्साह दिखाना पड़ता है और मेहनत करनी पड़ती है. इस सन्दर्भ में नेपाली शोधकर्ता अनुभव अजीत का यह कथन शत प्रतिशत ठीक है. कुछ साल पहले उन्होंने नेपाली सिनेमा पर दिए गए अपने लेक्चर में कहा था कि नेपाली बुद्धिजीवियों का यह निष्कर्ष कि नेपाली फ़िल्में अच्छी नहीं है, ठीक वैसा ही है जैसे कि बच्चों को एक ख़राब शिक्षक के हवाले कर चैन से मीठी नींद सोना.

कुछ हफ़्तों से नेपाली सिनेमागृहों में खस नेपाली भाषा में बनी फिल्म ‘प्रसाद’ चल रही है. इसकी कहानी कुछ यूँ है. बाग्लुंग जिला निवासी दलित युवक बाबुराम परियार और क्षेत्री युवती नारायण कार्की गाँव से भागकर काठमांडू में प्रेम विवाह करते हैं. दोनों ने अभी 25 की वय भी पार नहीं की है. इनमें से बाबुराम सिलाई का काम करना जानता है, पर स्कूली शिक्षा कम ही अर्जित की है.

नारायणी अपनी स्कूली पढाई पूरी कर चुकी है. बाबूराम एक कपड़े की दुकान में टेलर मास्टर का काम करता है और नारायणी एक मान्टेसरी स्कूल में लगे क्रेच में बच्चों की देखभाल करती है. वे अपने वैवाहिक जीवन के दो वर्ष पूरे कर चुके हैं. नारायणी अभी तक माँ न बन पाने के कारण हताश निराश है. बाबूराम को डॉक्टर से पता चलता है कि वो कभी पिता नहीं बन सकता. लेकिन उसे किसी और के वीर्य से टेस्ट ट्यूब बिधि द्वारा संतान प्राप्ति हो सकती है.

इसी बीच बाबूराम नारायणी से इस विषय पर कोई चर्चा किये बिना टेस्ट ट्यूब बेबी के लिए यथासंभव धन जुटाने गाँव जाता है. इस मौके का फायदा उठाते हुए गाँव के दिनों का उसका दोस्त रमेश, जो लम्पट चरित्र का है, नारायणी के साथ बलात्कार करता है.

बाबूराम इसी बीच पैसे का इंतजाम कर काठमांडू वापस आता है. नारायणी अपने ऊपर हुए बलात्कार की घटना का जिक्र पति से नहीं करती.

इस दरम्यान नारायणी गर्भवती हो जाती है. चूँकि नारायणी इस तथ्य से वाकिफ़ नहीं है कि पति से उसे संतान नहीं हो सकती, इसीलिए वह अपने गर्भ का कारण अपने पति को मान बैठती है. वह यह समाचार बाबूराम को सुनाती है, तब बाबूराम उसे इस तथ्य से अवगत कराता है कि वह पिता नहीं बन सकता. वह नारायणी से इस बारे में सवाल जवाब करता है. स्वाभाविक रूप से इस जटिल परिस्थिति से पैदा तनाव के बीच वह समझौते के रूप में नारायणी से बच्चा गिरा देने को करता है. बावजूद इसके कि उसके गर्भ का कारण रमेश द्वारा किया गया बलात्कार है, नारायणी बच्चा गिराने से इनकार कर देती है और बच्चे को जन्म देने का निर्णय लेती है.

बिलकुल उसी समय जब बलात्कारी रमेश को यह जानकारी मिलती है कि नारायणी के गर्भवती होने का कारण वह है तो, वह नारायणी से बच्चा गिरा देने का दबाव डालता है. पर नारायणी इससे इनकार करती है.

अंततः बाबूराम नारायणी को बच्चा गिरा देने की अपनी मांग से पीछे हट जाता है. और, इस प्रकार वे फिर से अपने प्रेमपूर्ण दाम्पत्य जीवन में वापस लौट जाते हैं.

बलात्कारी रमेश को नारायणी का गर्भ उसके आस्तित्व के लिए खतरा लगता है, अतयव एक दिन मोटरबाइक से नारायणी को कुचल कर मार देने के फ़िराक में रमेश ट्रक की चपेट में आकर दम तोड़ देता है. नारायणी बच्चे को जन्म देती है, तो बाबूराम कहता है कि बच्चा भगवान द्वारा दिया गया प्रसाद है, पर यह कहाँ से आया, इस बारे में हमें नहीं सोचना चाहिए.

इस फिल्म निर्माण से सम्बन्धित सभी विषयों पर चर्चा करना यहाँ संभव नहीं है, तथापि कुछ बिन्दुओं पर चर्चा की जा सकती है. पहली बात तो यह जो परम्परागत फार्मूला आमतौर से फिल्मों में पाया जाता है -मसलन बिना एक खरोंच दिए बगैर एक पुरुष एक स्वस्थ महिला का बलात्कार कैसे कर सकता है? या फिर यह हिंदी सिनेमा की तरह जल्दबाजी में फिल्माई गयी फिल्म है, जिसमें ‘गणपति बप्पा’ की भीड़ सड़क में हो, अथवा सड़क भीड़ के अन्दर इत्यादि. मतलब पटकथा में द्वन्द और सम्बन्ध निर्माण की विश्वसनीयता का नितान्त अभाव.

उसकी प्रकार एक छेत्री युवती एक दलित युवक के प्रेम में कैसे पड़ी? न तो वो साथ पढ़ी है, न तो पुरुष की कुछ विशेष पर्सनालिटी है और न ही परस्पर आकर्षण का कोई संयोग है. बलात्कारी रमेश जो अब तक कुँवारी लड़कियों को ही अपना शिकार बनाता रहा है, उसे विवाहित नारायणी का बलात्कार करने की धुन एकाएक क्यूँ सवार हो जाती है आदि इत्यादि.

दूसरा फ़िल्मी पात्रों के मन के भाव व्यक्त करने के लिए अनावश्यक रूप से पार्श्वगीतों का सहारा लेना.

तीसरा नायक व नायिका का रूप और मेकअप सदा एक ही जैसा दिखाना. बाबूराम क्या कभी दाढ़ी नहीं बनाता होगा? दोनों के बीच सम्बन्ध विच्छेद की नौबत आ जाने और व्यापक तनाव के बीच घर में रहते हुए भी नारायणी क्यूँ लिपस्टिक व श्रंगार के बिना नजर नहीं आती. इस किस्म के फार्मूले फिल्म को कमजोर करते हैं.

बहरहाल, फिल्म के बहुत सारे सकारात्मक पक्ष भी हैं. समाज के सबसे निचले समुदाय के श्रमिक परिवार पर आधारित फिल्म बुनने का प्रयास, संवादों में लोकभाषा का प्रभावी उपयोग, फिल्म में बेमतलब के गीत न रखने का प्रयत्न, जबरदस्ती फिल्म को लम्बा खींचने के चक्कर में बे सिर पैर के अनावश्यक दृश्य न रखना, नायिका के अंग प्रदर्शन करने वाले दृष्यों से परहेज और मात्र कथा आधारित फार्मूला फिल्म बनाने से परहेज जैसे कुछेक अच्छे पक्ष फिल्म प्रसाद के गिनाये जा सकते हैं.

इधर कुछ वर्षों से नेपाल में कई फिल्म निर्देशक व पटकथाकार अपनी फिल्मों के माध्यम से ऐसे नए-नए प्रयोग कर रहे हैं. यह प्रवत्ति निश्चित ही स्वागतयोग्य है और यह फिल्म प्रसाद में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है.

कुछेक वर्षों से समाज के सबसे निचले पायदान पर रखे गए दलित व जनजाति समुदाय के पात्रों को कहानी में मुख्य नायक आधारित फिल्म बनाने की प्रवत्ति शुरू हुई है. फिल्म ‘प्रसाद’ मात्र इस सिलसिले को ही आगे नहीं बढाती वरन वह नेपाली समाज में विद्यमान जातिगत दमन के कटु यथार्थ को भी उकेरने का प्रयास करती है, जो निश्चित ही प्रशंसनीय है.

कुछ युवा दर्शकों की यह सोच सकते हैं कि सिनेमा दलित पात्रों और दलित समुदाय के प्रति कभी अपमानजनक रवैया नहीं रखता. प्रसाद को एक दलित बिरोधी फिल्म घोषित नहीं किया जाना चाहिए. इस फिल्म में काठमांडू में दलितों को किराये पर घर नहीं देने से ले बलात्कारी खलनायक का यह संवाद ‘टट्टी की बदबू जाति का पता देती है’, जैसे दृश्य स्वाभाविक लगते हैं.

क्रान्तिकारी कही जाने वाली एक कम्युनिस्ट पार्टी की जिला कमेटी मीटिंग में एक दलित कामरेड को ‘डोम तू न बोल’ कह डांट डपटकर चप्पल फ़ेंक कर मारे जाने पर, फिर भी पार्टी द्वारा कोई भी अनुशासनात्मक कार्यवाही न किये जाने वाले इस समय में इस फिल्म के बलात्कारी पात्र का यह संवाद कहना एक बड़ी सामान्य बात मानी जायेगी.

इसी तरह पारिवारिक कलह के बीच कुछ दिनों से शराब पीना शुरू किये दलित पात्र बाबूराम का नशे में बड़बड़ाना अस्वाभाविक कैसे माना जाय? किसी भी संवाद में पात्र को उसके द्वारा भोगी गयी स्थिति से अलग करके देखना तो कला में यथार्थ के प्रतिबिंबन को असंभव कर देना है.

यद्यपि नेपाली सिनेमा के चरित्र को देखते हुए ऐसा लग सकता है कि दलित पात्र के प्रति न्याय करने की लालसा में फिल्म में दलित समुदाय की श्रमिक संस्कृति से कहीं-कहीं छेड़छाड़ की गयी है. अपनी पत्नी द्वारा हमेशा उसका जूता साफ़ करने को एक दलित युवक कैसे सहज रूप में ले सकता है? यह तो उसकी संस्कृति नहीं है. दलित समुदाय के भीतर वो भी जाति से दमाई, जहाँ महिलाओं को अपेक्षाकृत ज्यादा स्वतंत्रता है, ऐसे परिवार में पला बढ़ा बाबूराम अपनी छेत्री पत्नी के उसके जूते साफ़ करने को कैसे सहज रूप में ले सकता है?

यह संस्कृति पटकथाकार द्वारा बलात लादी गयी दिखती है. ऐसे अनेक विषयों पर चर्चा चलायी जा सकती है. लेकिन फिल्म ‘प्रसाद’ के बारे में बहस छेड़ने का मूल बिंदु कुछ और ही है. वो है बलात्कार का सवाल और स्त्री का अपने शरीर पर अधिकार.

फिल्म की नायिका नारायण कार्की अपने ऊपर हुए बलात्कार के खिलाफ कोई सवाल नहीं खड़े करती. वैसे भी समाज में बलात्कार से पीड़ित अनेक महिलाएं सामाजिक बदनामी से बचने और पति से सम्बन्ध टूट जाने के डर से अपना मुंह नहीं खोलती. लेकिन यह प्रवत्ति समकालीन नेपाली समाज का प्रगतिशील पक्ष नहीं वरन पतनशील, पुरानी सामंती नारी चेतना है.

एक आधुनिक महिला जो अपने अंतरजातीय विवाह पर गर्व अनुभव करती है और जिसका पति उससे बहुत प्यार करता हो, वही महिला अपने ऊपर हुए बलात्कार का उल्लेख पति से न करे और बलात्कारी को सज़ा दिलाने की न सोचे, यह बात कल्पना ने परे लगती है.

बेशक फिल्म के अन्य सहायक पात्र ऐसे किस्म के हो सकते हैं, लेकिन मुख्य किरदार द्वारा बलात्कारी को खुली छूट देने का चरित्र निर्माण स्त्री अधिकार के प्रगतिशील अभियान से गद्दारी करना है.

आज के समय में जबकि नेपाली समाज में ढेर सारी महिलायें अपने ऊपर खतरा मोल लेते हुए साहस के साथ बलात्कार के बिरुद्ध खड़ी हो रही हैं, वैसे समय सन्दर्भ में इस फिल्म द्वारा कला के साथ किये गए इस बलात्कार को आप क्या कहेंगे? और क्या इससे कोई इनकार कर सकता है? और न आज की नारी चेतना और न ही चरित्रों की बुनावट, कहीं से भी फिल्म का यह सन्दर्भ बलात्कार को सहज ही पचाने की अनुमति नहीं देता है.

संतान प्राप्ति के लोभ के कारण यह होने दिया गया, यह तर्क भी कहीं नहीं ठहरता है क्यूंकि बलात्कार के प्रति नारी पात्र नारायणी में रंचमात्र भी गुस्सा नहीं है और एक अप्रतिरोध किस्म का भाव है जबकि उसे सारी वस्तुस्थिति का पता है कि उसके पेट में पल रहे बच्चे का जिम्मेदार बलात्कारी रमेश है.

फिल्म का यह सन्दर्भ एक ऐसी खिड़की खोलता है, जहाँ से नेपाली सिनेमा के एक बड़े हिस्से के स्त्री चिंतन को जांचा परखा जा सकता है, जो कि बहुत ही घातक है.

इस फिल्म ने तमाम सारे गंभीर मुद्दे उठाये हैं, लेकिन इस सम्बन्ध में उसने तो हद ही पार कर दी है. जब फिल्म की नायिका को पता चलता है कि उसके गर्भवती होने का कारण बलात्कार है और पति से उसे कभी गर्भ नहीं हो सकता, तो उस समय वह अपने गर्भ को जन्म देने के लिए कमर कस के बैठ जाती है. यहाँ तक कि उसे बेहद चाहने वाले अपने पति को नाराज करने की शर्त पर भी. बेशक कई महिलाओं को बाध्यतावश बलात्कार से हुए गर्भ को जन्म देना पड़ता है, पर इस फिल्म की हेरोइन तो उसे उत्सव मनाने जैसा कुछ मान बैठती है. आखिर क्यूँ?

पहली बात तो यह कि पचीस साल भी न पार किये इस दंपत्ति युगल का काठमांडू में टिक पाना कन्फ्यूजन खड़ा करता है. और तो और शादी के दो वर्ष बाद बच्चे के बारे में सोचने की उन्हें फुर्सत नहीं होती. संतान की चिंता तो मोटे तौर पर ३५ साल पार निसंतान दम्पत्तियों में पायी जाती है. सामान्यतया निचले वर्ग की महिलायें अपने प्रेमपूर्ण वैवाहिक सम्बन्ध को नुकसान पहुंचाकर बच्चा पाने का खतरा कभी मोल नहीं लेतीं.

बच्चा पाने के निमित्त किया गया जतन नारायणी के चरित्र में कहीं से भी नहीं दिखता. वैसे भी वंश को बढ़ाने की चिंता पुरुषों की होती है, महिलाओं की नहीं. दूसरी बात, पचीस भी न पार इस जोड़ी के पास बच्चा पाने के और भी तो तरीके थे. टेस्ट ट्यूब बेबी विधि उनमें से एक है.

यदि वह भी सफल नहीं होता तो बच्चा गोद लेने का परम्परागत विकल्प तो खुला था. ये सब विकल्प मौजूद होते हुए भी बलात्कार से उत्पन्न गर्भ को सहज लेने वाले चरित्रों का निर्माण बलात्कार के सवाल पर सही चिंतन के न होने का परिणाम है.

बलात्कार मात्र शारीरिक हिंसा ही नहीं बल्कि स्त्री के आस्तित्व के खिलाफ पुरुषत्व का हमला है, जो स्त्री के ह्रदय में उस पुरुष के प्रति कभी न मिटने वाली घृणा को जन्म देता है. बलात्कार की प्रक्रिया से जुड़े सभी प्रसंग स्त्री की भावना को ही चोट पहुँचाते हैं. और तो और इस विषय को संतान प्राप्ति की उत्कंठा से जोड़कर दिखाना महिला के सम्पूर्ण आस्तित्व के ऊपर परम्परागत पितृसत्तात्मक सोच द्वारा अपने नियंत्रण में लाने के लिए कुछ भी ऊंट पटांग लादने जैसा है.

तीसरी बात फिल्म में, स्त्री के शरीर पर स्त्री के अधिकार को स्थापित करने के लिए कहानी में का प्रयोग जरुरी नहीं था. वैवाहिक जीवन व बलात्कार प्रसंग के बिना उत्तेजना, मदहोशी, लोभ या किसी दुर्घटनावश परिस्थिति में बने यौन सम्बन्ध से जुड़े पहलू को लेकर भी इस फिल्म को बनाना संभव था.

सामाजिक संबंधों के ताने बाने में ऐसे ढेर सारे सन्दर्भ होते हैं, जिसकी वजह से किसी को अनचाहा गर्भ रह सकता है. लेकिन ऐसा सम्बन्ध न तो बलात्कार होता है और न व्यभिचार. इसलिए स्त्री को अपने शरीर पर अधिकार देने की आड़ में बनी इस फिल्म की पैरवी करना कतई जायज नहीं है. जो स्त्री संतान प्राप्ति के लिए कभी बाबाओं/ तांत्रिकों या देवी माँ के चक्कर लगाती हो, दिन में अपने पति के जूते पालिश करती हो, उस स्त्री को अपने शरीर पर अधिकार को लेकर उग्र रूप से सचेत नहीं माना जा सकता.

चौथी बात, अपनी पत्नी के ऊपर हुए बलात्कार से रह गए गर्भ से उत्पन्न बच्चे को स्वीकार करने के सवाल पर फिल्म का नायक बाबूराम क्यूँ बाध्य किया जाता है? वह उसे भगवान द्वारा प्राप्त प्रसाद की संज्ञा क्यूँ देता है? बम्बईया सिनेमा का घिसा-पिटा फार्मूला प्रयोग करके बलात्कारी का अंत दिखाया गया है. पटकथाकार यदि बलात्कारी को नहीं मारता, तब भी क्या बाबूराम उसे जिंदगी भर भगवान् का प्रसाद ही समझता?

क्या आज के परिवेश में बाबूराम परियार जैसा कोई साधारण पुरुष ऐसी कल्पना कर सकता है? नेपाली फिल्मों में तथ्यों को तोड़ने मरोड़ने व छुपाने के लिए दुर्घटना या प्राकृतिक विपत्ति का सहारा लेने के यथेष्ट उदहारण पाए जाते हैं लेकिन ऐसी प्रवत्ति होने पर पटकथाकार की अयोग्यता कम, पर धूर्तता ज्यादा नजर आती है.

पांचवी बात, बलात्कार से बाद यदि बाध्यात्मक परिस्थिति में बच्चे जन्म लेते हैं, तो वे सम्मानजनक जीवन के अधिकारी हैं. लेकिन क्या उस बच्चे को कभी यह बताना उचित होगा और वह यह सच्चाई जानकार कभी अच्छा महसूस करेगा कि उसका जन्म उसकी माँ के ऊपर हुए बलात्कार का नतीजा है. इस तरह से मनुष्य का निर्माण करने को ठीक कहना कभी भी कला का प्रगतिशील दायित्व नहीं हो सकता.

इस किस्म का सिनेमा मिर्च मसाला लगाते हुए गंभीर सामाजिक मुद्दों को चरम विकृति के साथ दर्शकों के सामने पेश करता हैं. तथापि कभी कभी ही सकारात्मक सोच के साथ सामाजिक कुरीतियों पर पर्दा उठाने की नीयत से कोई अच्छी फिल्म भी बन जाती है. बहरहाल आम दर्शक बहुत बड़े भ्रम से गुजरते हुए यह सब देखता सुनता है. कौन सी फिल्म अच्छी है और क्यूँ अच्छी है, कौन सी नहीं?, बहरहाल, इस प्रश्न का उत्तर कौन देगा?

जीवन के समग्र पहलुओं की वकालत करने वाले बौद्धिक क्यूँ हाथ पे हाथ धरे बैठे हैं? या तो वे कहीं और ही प्रोजेक्ट में व्यस्त हैं? या चुपचाप मौन रहने को अभ्यस्त हो चुके हैं कि जैसे कुछ हुआ ही न हो. निद्रा सभी को लगती है लेकिन नेपाली फिल्मों की वैचारिकता पर बुद्धिजीवियों द्वारा की जा रही उपेक्षा और घोड़े बेंचकर सोने की नीति एक गंभीर सामाजिक दुर्घटना को निमन्त्रित करने का खतरनाक संकेत करती नजर आती है.
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आहुति नेपाल के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार व राजनैतिक विश्लेषक हैं. उनका यह लेख नेपाली अख़बार कान्तिपुर दैनिक में 31 दिसंबर, 2018 को प्रकाशित हुआ था. अनुवादक- पवन पटेल कवि व नेपाली समाज के एक भारतीय विद्यार्थी हैं.

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