साहित्य जगत

‘आज के कवि’ श्रृंखला : इलिका प्रिय – जीवन हथियार से नहीं चलता …

आज के कवि
__________

इलिका की कविताओं में जोश है आक्रोश है. यही उनके कवि को बचाए भी रखते हैं. इलिका की कविताएँ पढ़ते हुए मुक्तिबोध का प्रश्न याद आता है – “पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?”

इलिका की कविताएँ पढ़ते हुए इस सवाल का जवाब मिलता है. वह प्रतिबद्ध हैं आम जन के संघर्ष के प्रति. वह शोषणकारी, दमनकारी सत्ता विरुद्ध खड़े होकर सवाल करने को प्रतिबद्ध है.

हालाँकि इलिका को अभी कविता की भाषा सीखनी है तो भी जो कविताएँ जन संघर्ष को समर्पित हैं उनमें शिल्प से अधिक ‘कथ्य’ महत्वपूर्ण है. भाषा तो आते-आते आती है.

कवयित्री जनता की बात लिखती हैं, जनता की भाषा में. यह इनकी कविता की पहचान है. जन कवि को जनता की भाषा में ही बात करनी चाहिए, अकादमिक भाषा में नहीं.

इलिका की इन कविताओं के शीर्षक और कथ्य पर ध्यान दें तो पता चलता है कि युवा मन का जज़्बा और आक्रोश भरपूर हैं इन कविताओं में. यह युवा मन कोमल भी होता है और उतना ही आक्रोशित भी.

इन पंक्तियों पर नज़र डालें-

जब-जब तुम
कैद करते हो
जनपक्षधर किसी
कवि को, लेखक को
शिक्षक को, एक्टिविस्ट को
वकील को, कलाकार को
तब-तब पता चलता है
तुम्हारे लिये
शोषण का रास्ता
कभी प्रतिरोधों से
खाली नहीं रहेगा।

उसी तरह अन्य कविताओं में इलिका अपने भीतर की आग को अभिव्यक्त करती हैं. आज़ादी की लड़ाई में महिलाओं की भूमिका को अकसर याद नहीं किया जाता. किन्तु उनकी भागीदारी और योगदान को भुलाकर आज़ादी की लड़ाई का इतिहास पूरा नहीं होता.

सरोजिनी नायडू, दुर्गा भाभी, मातुन्गिनी हाज़रा, रानी लक्ष्मीबाई जैसे कई नाम हैं, हजारों नाम ऐसे भी हैं जिन्हें इतिहास में जगह नहीं मिली है. किन्तु उनके योगदान और बलिदान के बिना आज़ादी की लड़ाई की कहानी अधूरी रह जाती है.

स्त्री जब कलम उठाती है और अपने दुःख दर्द को भुलाकर वह शोषित और दमित जनता के पक्ष में लिखने लगती हैं तो हमेशा प्रेरणादायक होता है. इलिका इसी धारा की कवयित्री हैं.

इस युवा कवयित्री ने 21वीं सदी में आज़ाद देश की सरकार के दमन को देखा और महसूस किया है कि सत्ता ने कैसे अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल कर जनता को और उनके अधिकारों का दमन किया है. उसी दमन और शोषण की बात लिखती हैं इलिका. सिर्फ बात ही नहीं उसके खिलाफ़ प्रतिरोध की आवाज़ भी उठाती हैं यह युवा कवयित्री. यह सब आप इलिका की इन कविताओं को पढ़कर महसूस कर पायेंगे.

इस कवयित्री को भविष्य की शुभकामनाएं.

– नित्यानंद गायेन
————————

 

 

आज के कवि श्रृंखला में आज पढ़िए इलिका प्रिय की कविताएँ

 

1. किस-किस को कैद करोगे?

जब-जब तुम
कैद करते हो
जनपक्षधर किसी
कवि को, लेखक को
शिक्षक को, एक्टिविस्ट को
वकील को, कलाकार को
तब-तब पता चलता है
तुम्हारे लिये
शोषण का रास्ता
कभी प्रतिरोधों से
खाली नहीं रहेगा।।

चुनौती बनकर
हर एक क्षण
खड़ा नजर आएगा
तेरे सामने
कोई न कोई जनप्रतिनिधि।।

तुम्हारे दमन के कीले के नीचे
पलते रहेंगे
स्वच्छ समाज निर्माण के सपने
तुम कैद करते रहना इन्हे तबतक
जब तक तेरा दिल न घबरा उठे
कि कैद खाने को तुमने
बना डाला है जनपक्षधरों का गढ़
जनचेतना का ठिकाना
कि तेरी स्वार्थ की दीवार
वहीं से चरमरा कर गीर पड़ेगी
तब किस किस को कैद करोगे?
क्योंकि इस शोषण के खिलाफ
प्रतिरोध में उठी आवाज को
कैद करने के लिए भी
नहीं बचेगा तुम्हारे पास
कोई ठिकाना ।।

 

2. योद्धा

जीवन हथियार से नहीं चलता
एक सुन्दर जीवन के लिए
जरूरी है शांति और प्यार
इतिहास गवाह है
विश्व का कोई हिस्सा
हिंसा के बल पर नहीं चलता
फिर भी हथियार के बल पर
चलाने की भरसक
होती रहती है कोशिशें

सत्ताधारी शासक
ई. की शुरुआत से ही
कभी लाठी-डंडा कभी जंजीर
कभी बंदूक कभी गोला-बारूद
इन सबके बल पर
चलाना चाहा है अपना कुशासन।
आज भी शांति चाहने वाली जनता पर
बरसते हैं लाठी, डंडे, गोलियां
(और मजबूर करने वाले अत्याचार
जिनकी कोई गिनती ही नहीं)

अफसोस!
कुछ बुद्धिजीवी प्राणी
इसे नहीं मानते
हथियार के बल पर शासन
वे कहते हैं हथियार के बल पर
दुनिया नहीं चलती तब
जब, जनता उठाती है
जवाब में, प्रतिरक्षा में हथियार
कभी यह सवाल पूछे बगैर
कि जनता ने,
क्यों उठाया हथियार
कभी यह आंकलन किये बगैर
कि हथियार उठाने वाली जनता से
शांति की अपील करने से पहले
हिंसक सत्ता से क्या किया अपील
कि उन परिस्थितियों को
पैदा करना बंद करे

जहाँ जनता
रोटी-रोटी को मुहताज हो जाती हो
और सर उठाने पर
उसे भी दबा दिया जाता हो
हथियार के बल पर
कि
बंद करे जनता के
इस हक को छिनना?
सच तो यही है
जनता जब उब जाती है
उस हिंसा से, उस शोषण से
तब शांति के लिए, प्यार के लिए
एक प्रेममयी दुनिया के लिए
उस हिंसा के खिलाफ
उठाती है हथियार।

जनता के ये योद्धा
हिंसक नहीं होते बल्कि
वे समझ जाते हैं
सुन्दर जीवन के लिए
जरूरी है
कि जीवन से उन्मूलन हो
शोषण और उत्पीड़न का ।

 

3. डर

क्या आप जानते है
डर किसे कहते हैं?
जब हमारे कवि ने
कविता लिखी
और कविता से ही
उखड़ने लगे सत्ता के पोल
तब हमने देखा
सत्ता में डर
और उन्होंने उन्हें पकड़ने का
कर दिया फरमान जारी।

जब हमारे कवि ने
जेल जाकर भी
मुस्कराना नहीं छोड़ा
तब वे डरे
इतना डरे
कि उन्हें
नहीं दिया बेल
वे इतना डरे
कि बेल के नाम से ही
थर्र-थर्र कांपने लगे।

जब जेल में रहकर भी
हमारे कवि
हमारे दिलों तक पहुंच गए
और बाहर के आवोहवा में
तैरने लगी उनकी कविता
जब उस कवि और कविता के लिए
उठने लगी आवाज
वे और डरे
बढ़ा दिया पहरा इतना
कि न बाहर की हवा
अंदर जा सके
न अंदर की बाहर
और संपर्कविहीन रहे
अंदर बाहर की दुनिया।।

वे आज भी डरे हुए है
बेहद डरे हुए
जहाँ कोरोना के नाम पर
पैरोल पर कैदियों को
छोड़ने की निकली नोटिस
विचाराधीन और जनकवि
और अस्सी साल के वृद्ध
होने के बावजूद
बढ़ाए गये उनके पहरे
कोराना के डर की संभावना की
अपील भी कर दी गयी रद्द
और एक दिन
उनके ही पहरे के अंदर
उनकी लापरवाही को
उजागर करती महामारी ने
जकड़ लिया उन्हें
तब बेहद खराब अवस्था में
पहुंचा दिया गया उनका स्वास्थ्य
एक बेशर्म व्यवस्था के तहत।

वे इतने डरे कि
तब भी नहीं करते
इलाज का उचित बंदोबस्त
उनके इसी तरह
मार डालने की
साजिश के साथ

उनके जिंदा रहने का खतरा
उन्हें वैसा ही हो रहा महसूस
जैसे चंद्रशेखर आज़ाद,
भगत सिंह…
की जिंदगी से
अंग्रेज को हुआ था

आज बेहद खराब हालत पर भी
वे उनके इलाज से
कन्नी काटना चाहते हैं
क्योंकि वे बेहद डरे हुए है
जब कवि लिखता है
मैंने बम नहीं बांटे
वे और भी डर जाते है
आज यदि हम कह दें उन्हें
नालायक अब क्या डरते हो
इस अवस्था में पहुंचाकर
कि उन्हें अपना सुध भी नहीं
तो हमारा यह कहना गलत होगा
सच याद तो रखनी है
कि वे एक जनकवि है
और उनके साथ
इस अवस्था में
पहुंचाने वाले से
जनता एक दिन
अपना हिसाब जरूर करेंगी

जब वे डरते है इस बात से
कि कवि ने बम नहीँ बांटे
तो उनका डर सच है
वे भी जानते है
बम को डिफ्यूज
किया जा सकता है
क्रांतिकारी विचार को
डिफ्यूज करना
कठिन ही नहीं
नामुमकिन है।

 

4. मैं मजदूर हूँ

मैं मजदूर हूँ
और मैं दावा करता हूँ
पर उससे पहले कहूँगा
मुझे नसीहते मत दो
मुझपर दया मत दिखाओ
न हमपर थिसीस लिखो
न आकलन करो हमारा।

हमें दान भी न दो
और मुआवजे में हमें मत तौलो
हमारी हालात पर
तुम खेद भी व्यक्त न करो
न ही घड़ियाली आंसू दिखाओ।

योजनाएं बनाने है तो बनाओ
पर हमारे नाम पर मत बनाओ
अपनी लूट का प्रोपोगेंडा
इस आड़ में मत छुपाओ।

तुम्हारे घिनौने चेहरे के कारण
हमें उनसे नफरत है

हाँ मैं मजदूर हूँ
और ललकारता हूँ तुम्हें
है हिम्मत
तो एक बार
हमारी जिंदगी जीकर देखो
मैं दावा करता हूँ
तुम भूख से नहीं मरोगे
गरीबी से नहीं मरोगे
प्रशासन के लाठी
गोली से नहीं मरोगे
रेल के चक्को में
पीस कर नहीं मरोगे
कर्ज और बेरोजगारी से नहीं मरोगे
बल्कि उससे पहले ही
काम के बोझ से ही
मर जाओगे
तो आक लो

कितने जुल्म करते हो हमपर
और यह भी आक लो
कि कितनी हिम्मत है हममें
इसलिए कहते है
चालबाजी न करो हमारे साथ
हमें तुम्हारी नियत से नफरत है।

अरे छोड़ो हम अपनी
फरयाद नहीं सुना रहे तुम्हें
बता रहे हैं
तुम क्या हो
और हम क्या है?
और कह देते है यह भी तुम्हें
जिस दिन
भड़क उठा हमारा गुस्सा
उस दिन
बिना कोई मौका दिये
पलट देंगे तुम्हारे ये तख्तो ताज।

 

5. क्या होता यदि

क्या होता यदि
आज तुम होते?
आज भी तुम्हारे आंखों के सामने
हाहाकार मचाते लोग होते
पढ़े-लिखे
बेरोजगारों की भीड़ दिखती,
सड़कों पर
आंदोलन करते किसान दिखते,
लाठी खाते छात्र दिखते,
अंधविश्वास की परछाई दिखती
जातिवाद का प्रकोप दिखता
गुहार लगाते शिक्षक दिखते
असुरक्षित महिलाएँ दिखती
कुपोषित बच्चे दिखते
जमीन की लूट दिखती
उजड़ते जंगल दिखते

पहाड़ों की छाती चीरकर
खनिज संपदा की लूट दिखती
ग्रामीणों का असंतोष दिखता
शोषित जनता का रोष दिखता
और उनके ऊपर
नक्सली होने का ठप्पा दिखता
गांव-गांव में खून का धब्बा दिखता
यह सब देखकर तुम क्या करते?

शायद वही
जो उस वक्त किये थे
और तुम्हारा ठिकाना क्या होता ?
वही जो उस वक्त था
और तब,
तुम्हारे सपनों को
आज चूर करने और
दिखावे के लिए
तुम्हारी मूर्ति पर
माला चढ़ाने वाले
तुम्हारे नाम का वारंट निकलवाते
तुम्हे जरूर हार्डकोर नक्सली बताते।

शहीद-ए-आज़म
यदि आज तुम होते
तो तस्वीर कुछ ऐसी ही होती
क्योंकि तुम्हारे सपने
अब भी है अधूरे
और तुम्हारे सपनों को
पूरा करने की
चाह रखने वाले
गुजर रहे हैं आज
इसी दौर से
पर वे दुखी नहीं है
इस शोषण के बावजूद
वे बढ़ रहे हैं
इसी उम्मीद के साथ
कि एक न एक दिन
पूरे कर सकेंगे तुम्हारे सपने।।

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