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हजारीबाग सेंट्रल जेल में थे डा0 राम मनोहर लोहिया, स्मारक बने

हजारीबाग सेंट्रल जेल में डॉ. लोहिया का स्मारक बने
: अभिषेक रंजन सिंह

हजारीबाग, झारखंड, 1 अक्टूबर 2020। डॉ. राममनोहर लोहिया रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक रंजन सिंह ने गुरुवार को हजारीबाग स्थित सर्किट हाउस में आयोजित एक प्रेस वार्ता में समाजवादी चिंतक व राजनेता डॉ. राममनोहर लोहिया से जुड़ीं स्मृतियों एवं अभिलेखों के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।


प्रेस वार्ता करते हुए “डॉ0 राम मनोहर लोहिया रिसर्च फाउण्डेशन के अध्यक्ष सह वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक रंजन सिंह और साथ में वरिष्ठ अधिवक्ता सह समाजवादी चिंतक श्री स्वरूप जैन

अपने हजारीबाग आगमन के बारे में उन्होंने पत्रकारों को बताया कि 10 अगस्त 1965 से 20 अगस्त 1965 तक डॉ. लोहिया हजारीबाग केंद्रीय कारागार में रहे। दरअसल, 9 अगस्त 1965 की मध्य रात्रि को पटना सर्किट हाउस से डॉ. लोहिया को ज़िले के तत्कालीन ज़िलाधकारी जे. एन साहू के आदेश पर गिरफ्तार किया गया था। अगले दिन उन्हें पुलिस अभिरक्षा में हजारीबाग केंद्रीय कारागार भेज दिया गया।

10 अगस्त 1965 को जेल पहुंचते ही उन्होंने हिंदी भाषा में एक पत्र तत्कालीन उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा अध्यक्ष हुकुम सिंह को एक पत्र लिखा, कि किस तरह पटना ज़िला प्रशासन ने बिहार सरकार के इशारे पर उन्हें गिरफ्तार किया। अपने पत्र में डॉ. लोहिया ने इसे नागरिक स्वतंत्रता का हनन बताया।

13 अगस्त 1965 को हजारीबाग जेल से भेजा गया पत्र उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को मिला और उन्होंने डॉ. लोहिया के इस पत्र पर संज्ञान लिया और 23 अगस्त 1965 को इस मामले पर सुनवाई की तिथि तय की। लिहाज़ा 20 अगस्त 1965 को डॉ. लोहिया को हजारीबाग केंद्रीय कारागार से नई दिल्ली ले जाया गया।

उच्चतम न्यायालय में डॉ. लोहिया ने अपने मुक़दमे की पैरवी स्वयं करने की मांग की, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। डॉ. लोहिया ने हिंदी में ज़िरह करना शुरू किया तो, न्यायाधीश ने उनसे अंग्रेजी में अपनी दलील पेश करने को कहा। ज़ज़ के आग्रह को अस्वीकार करते हुए डॉ. लोहिया ने कहा कि, अंग्रेजी भाषा के प्रति आपके इस आग्रह के लिए कांग्रेस सरकार दोषी है, जो अंग्रेजों की दासता से मुक्ति के बाद भी देश को अंग्रेजी भाषा का गुलाम बनाये रखना चाहती है। डॉ. लोहिया ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी जिरह हिंदी में प्रस्तुत किया।

उच्चतम न्यायालय में डॉ. लोहिया का यह मुकदमा काफी चर्चित हुआ। शीर्ष अदालत ने न सिर्फ उनकी गिरफ्तारी को अनुचित बताया, बल्कि पटना के तत्कालीन ज़िलाधकारी जे. एन साहू को भी कड़ी फटकार लगाई।

डॉ. राममनोहर लोहिया रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष अभिषेक रंजन सिंह ने पत्रकारों को बताया कि इस बाबत वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण केंद्रीय कारागार, हजारीबाग के कारा अधीक्षक कुमार चंद्रशेखर से मिलकर उनसे डॉ. राममनोहर लोहिया से संबंधित कारा प्रमाण-पत्र और बंदी प्रवेश पंजी की छायाप्रति उपलब्ध कराने का आग्रह किया।

आगे अभिषेक रंजन सिंह ने बताया कि डॉ. लोहिया से संबंधित दुर्लभ दस्तावेजों व अभिलेखों के सार संभाल एवं उनकी तलाश के लिए पिछले एक दशक से कार्य कर रहे हैं। इस सिलसिले में देश के विभिन्न राज्यों के अलावा वे चार बार बांग्लादेश की यात्रा भी कर चुके हैं। बांग्लादेश स्थित नोआखाली, ढाका एवं चटगांव में डॉ. लोहिया से संबंधित कई महत्वपूर्ण जानकारियां एकत्र कीं।

गौरतलब है कि अभिषेक रंजन सिंह नई दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान( आईआईएमसी) से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। डॉ. लोहिया और समाजवादी आंदोलन के प्रति उनकी जिज्ञासा उनके दादा जी राश नारायण सिंह,जो डॉ. लोहिया के अनुयायी थे और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी और बाद में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में साथ रहे।

घर में डॉ लोहिया से जुड़े संस्मरण और दस्तावेजों ने इस दिशा में उनकी रूचि पैदा की। अभिषेक रंजन सिंह ने बताया कि आज उनके पास डॉ. लोहिया व उनसे संबंधित सैकड़ों अहम दुर्लभ दस्तावेज हैं, जिसे डॉ. राममनोहर लोहिया फाउंडेशन की तरफ से संकलित किया जा रहा है, ताकि राजनीति व समाज शास् त्र के छात्रों को शोध करने में मदद।मिलेगी।

डॉ. राममनोहर लोहिया के नाम पर सत्ता की राजनीति करने वालों को आड़े हाथ लेते हुए अभिषेक रंजन सिंह ने कहा कि, डॉ. लोहिया की मृत्यु के 53 साल हो गए, लेकिन राजनीतिक समाजवादियों ने डॉ. लोहिया के विचारों को संकलित करने में नाकाम रहे। ऐसे में आने वाली पीढ़ियों को डॉ. लोहिया के विचारों व उनके दर्शन के बारे में पता चल सके,इस दिशा में डॉ. राममनोहर लोहिया रिसर्च फाउंडेशन कार्य कर रहा है।

देश में पुराने अभिलेखों के संरक्षण के प्रति आम लोगों में रूचि पैदा हो इस बाबत भारत सरकार को चाहिए कि वह अभिलेख संरक्षण दिवस घोषित किया जाए। और, साथ ही झारखंड सरकार से मांग भी की कि हजारीबाग सेंट्रल जेल में डॉ. लोहिया का भी स्मारक बने। जिस तरह 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय जयप्रकाश नारायण, सूरज नारायण सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी, शालीग्राम सिंह के वार्ड को उनकी स्मृति में स्मारक बनाया गया है।

इस प्रेस वार्ता में ज़िले के वरिष्ठ अधिवक्ता व समाजवादी चिंतक स्वरूप जैन भी उपस्थित थे।

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