साहित्य जगत

‘आज के कवि’ श्रृंखला : विक्रम – … ना लिख पाने से पहले मैं लिख रहा हूँ…

आज के कवि
———–

कवि विक्रम इन्कलाब लिखता है

विक्रम बहुत आम भाषा में लिखता है. विक्रम क्या लिखता है? यह एक सवाल हो सकता है मंझे हुए साहित्यिक गुरुओं के लिए. मुझे लगता है विक्रम जन की बात लिखता है, आवाम की बात लिखता है. कवि विक्रम इन्कलाब लिखता है-
नदियों से लिखता हूँ
जंगल पहाड़ों से लिखता हूँ
जब भी लिखता हूँ
इंक़लाब लिखता हूँ
मैं इंसान को लिखता हूँ
इंसानियत को लिखता हूँ

उसके बुने शब्दों से बादल बनते हैं, ऐसा इस युवा कवि को लगता है.
यह कवि अभी अपने सृजनकाल के पहले पायदान पर भी नहीं पहुंचा है, किन्तु जानता है ज़ुल्म के खिलाफ़ लिखने का अंज़ाम. फिर भी वह कहता है-
मेरे हाथ बूढ़े हो जाने से पहले
ना लिख पाने से पहले
मैं लिख रहा हूँ
आज के ज़ुल्मतों को
इस दौर को
भय का माहौल

ऐसे कितने युवा रचनाकार होते हैं जो इस तरह की ज़ोखिम उठाते हैं. बहुतों को देखा है हमने, जो कभी क्रांतिकारी होते से महसूस होते रहे और पुरुस्कार पाकर वे ख़ामोश हो गये या सत्ता के पक्षधर बन गये.
विक्रम अभी तरुण रचनाकार है, इसलिए जहाँ कहीं उम्मीद नज़र आती है, उधर ध्यान देना भी एक इंसानी स्वाभाव है.

विक्रम की इन कविताओं में एक आक्रोश स्वर महसूस किया जा सकता है. वह देश, जनता और राजनीतिक गतिविधियों पर गहरी नज़र रखने वाला युवा कवि है. इन कविताओं में आप यह आसानी से महसूस कर सकते हैं.

विक्रम न तो कवि होने का दावा करता है न ही कवि के रूप में उसे कोई जानता या पहचानता है. किन्तु विक्रम लिखता है आन्दोलन में गीत, अभिव्यक्ति की बातें और क्रांति गान. विक्रम छात्र राजनीति से जुड़े हैं, वाम छात्र राजनीति से. सीधी-सपाट नहीं कहूँगा, सरल अभिव्यक्ति है विक्रम की. दरअसल विक्रम वहां हैं आज जहाँ से हर कवि अपनी यात्रा का आरम्भ करता है.

इस कवि से भविष्य के लिए बहुत उम्मीदें हैं. वे इसी तरह लिखते रहें और आगे बढ़ते रहें जनांदोलनों में और आवाम की बात करते रहें अपनी कविताओं में.

‘आज के कवि’ श्रृंखला में पढ़ें आज के कवि विक्रम की कविताएं।

– नित्यानंद गायेन
—————–

विक्रम की कविताएँ

1.मेरे शब्द

मैंने कुछ शब्द बुने
जो बादल बन कर
आसमान में उड़ने लगे
कुछ लोगों ने उसे
मंडराते हुए देखा
कुछ ने उसे
सूरज को चाँद को
आसमान को ढकते हुए देखा
किसी ने उसे पशु, पक्षी
पहाड़, इंसान की आकृति बनते देखा
कभी पास आते देखा
कभी दूर जाते देखा
वो मेरे शब्द थे
लोगों ने ना जाने कैसे-कैसे देखा

2.मैं लिखता हूँ

मेरे हाथ बूढ़े हो जाने से पहले
ना लिख पाने से पहले
मैं लिख रहा हूँ
आज के ज़ुल्मतों को
इस दौर को
भय का माहौल

बंधन पाबंदी
हाथ में हथकड़ी
शरीर के आगे सलाखें हैं
एक कागज की टुकड़ी है
जिसमें मेरा जुर्म लिखा है
जुर्म, लिखने का
कागज कलम रखने का
पढ़ने का सोचने का
एक दूसरी टुकड़ी होगी, जिसमें
मेरी सजा लिखी होगी

सच और न्याय
शब्दकोश के महान शब्दों में होंगे
जिसे अनुवाद करके
लोग महान बनेंगे
एक किताब होगी
जिसे ना पढ़ा जाता है
और ना ही पढ़ाया जाता है
उसके अंदर के वाक्यों को बदला जाता है
तब तक बदला जाता है
जब तक वो चीखता नहीं है
उसकी हर चीख आखरी होती है
अदालत है
जहां न्याय से ज्यादा तारीखें मिलती है
न्यायाधीश है
जो जाति और धर्म देखता है
बराबरी कागज के पन्नों तक रह जाता है
मेरे देश को हर वक़्त आज़ाद होना था
इत्तेफ़ाक बस दो दिन ही आज़ाद होता है
मेरी कलम हर वक़्त आज़ाद होती है
मेरे कागज के पन्नों पर
आने वाली पीढ़ी भूल ना जाये
इसलिए, मैं लिखता हूँ
मेरे हाथ बूढ़े हो जाने से पहले
ना लिख पाने से पहले

3.सपना

एक रास्ता है जो
पहाड़ जंगल नदी से होकर गुजरती है
पहाड़ों में कई तरह के पेड़ पौधे
जंगल में कई तरह के पशु पक्षी
नदी में मछली घोंघे जैसे कई जीव
इन सब को पार करता हूँ
तो एक गांव दिखता है
उस गांव में कोई पुरुष या महिला नहीं है
ना ही कोई धर्म जाति के लोग दिखे
किसी के शरीर पर थोड़े कपड़े हैं
किसी के शरीर पर कोई कपड़े नहीं हैं
बच्चे गाय बकरियों के साथ खेल रहे हैं
सब अपने अपने काम में लगे हैं
बाहरी दुनियां से अपरिचित
बच्चे बड़े बुजुर्ग सब सम्मानित थे
चेहरे पर मुस्कान भाव शांत
मैं खड़ा था
देख रहा था
एक हवा का झोंका मेरे करीब से गुजरी
मैंने उसे रोका और पूछा
ये कौन सा गाँव है
हवा मुस्कुराते हुए बोली, सपना है!

4.देश के बारे में

हम खड़े हैं कतारों में
कोई राष्ट्रगान गाया जा रहा है क्या
सब चिल्ला रहे हैं आज़ादी–आज़ादी
15 अगस्त आया है क्या
जुलूस निकाले जा रहे हैं
कोई डफली तो कोई नगाड़े बजाए जा रहा है
संगीत के धुन ऐसे हैं, जैसे
कोई सोया है उसे जगाया जा रहा है क्या
किसी के हाथ में भगत सिंह की तस्वीर
तो किसी के हाथ में अम्बेडकर की तस्वीर
और भी तस्वीरें थी लहराते हुए हाथों में
किसी को भुलाया जा रहा है क्या
कोई क्रांतिकारी गीत गाया जा रहा है
तो कोई नारे लगाए जा रहा है
कान बंद कर बैठा है कोई
उसको सुनाया जा रहा है क्या
झंडे लिए आगे था कोई
तो मशालें भी थी हाथों में
सत्ता के गलियारे अंधेरे में है
इसलिए रौशनी दिखाया जा रहा है क्या
सड़कें भरी हुई है लोगों से
तख्त भरे हैं संदेशों से
बच्चे, युवा, बुजुर्ग, महिलाएं सब शामिल हैं
कोई कानून बनाया जा रहा है क्या
सारे घर गालियां सुनी
कुछ हुआ है क्या
सब चिल्ल्ला रहे हैं आज़ादी–आज़ादी
15 अगस्त आया है क्या ??

5.खूनी भेड़िया

हजारों लाश खाने के बाद
एक भेड़िये ने शोक जताया
उसने जताया
उसको दुख हुआ
उनको मार कर खाने के बाद
उसने पहले भी मार कर
कई लाशों को खाया है
उसके मुंह पर
खून के दाग देखे जा सकते हैं
भेड़िये का साथ
कई सियार दे रहा है
उन सब ने मिलकर
हड्डियों और खून के दाग को छुपाया
हजारों लाश खाने के बाद
एक भेड़िये ने शोक जताया!!

6. मैं इन्कलाब लिखता हूँ

नदियों से लिखता हूँ
जंगल पहाड़ों से लिखता हूँ
जब भी लिखता हूँ
इंक़लाब लिखता हूँ
मैं इंसान को लिखता हूँ
इंसानियत को लिखता हूँ
तुम्हारे किये जुल्मों का जवाब लिखता हूँ
जब भी लिखता हूँ
इंक़लाब लिखता हूँ
कुछ तिलिस्म लिखता है
कुछ अय्यार लिखता है
मैं सच को सच लिखता हूँ
जो भी लिखता हूँ
बेबाक लिखता हूँ
जब भी लिखता हूँ
इंक़लाब लिखता हूँ

असमानता से परे
एक ख्वाब लिखता हूँ
बीज बोते हुए किसान
ईंट उठाते हुए मजदूर
शोषित सारे अवाम को लिखता हूँ
दिन को दिन, रात को रात लिखता हूँ
दबा दी गई जिनकी आवाज को
उस आवाज को लिखता हूँ
कवि हूँ
कविता लिखता हूँ
जब भी लिखता हूँ
इंक़लाब लिखता हूँ
————
#vikram
#NityanandGayen

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