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डीटीसी कर्मचारियों ने श्रम संहिता के विरुद्ध व किसानों के समर्थन में किया डीटीसी मुख्यालय पर प्रदर्शन

आज़ाद देश में बनाया जा रहा है हमें गुलाम–निजीकरण और श्रम कानूनों के खात्मे से मजदूरों की हालत और खराब हो जाएगी

नई दिल्ली, 25 सितम्बर 2020।: ऐक्टू से सम्बद्ध ‘डीटीसी वर्कर्स यूनिटी सेंटर’ ने आज इन्द्रप्रस्थ स्थित डीटीसी मुख्यालय पर विरोध प्रदर्शन किया. दिल्ली समेत देश के अनेक हिस्सों में मोदी सरकार द्वारा लाए जा रहे श्रमिक-विरोधी कानूनों का जमकर विरोध हो रहा है.
डीटीसी कर्मचारियों ने आज एक सुर में ये बात कही कि मोदी सरकार जिस प्रकार से निजीकरण की नीति को बढ़ावा दे रही है उससे ये साफ़ है कि शायद ही देश में कोई सरकारी उपक्रम निजीकरण की मार से बच पाएगा.

प्रदर्शन में लॉक-डाउन के दौरान डीटीसी कर्मचारियों के वेतन में कटौती, डीपो स्तर पर हो रही मनमानी, कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों की लम्बे समय से लंबित मांगें इत्यादि को लेकर भी बात उठाई गई.

डीटीसी कर्मचारियों ने जलाई श्रम संहिता विधेयकों की प्रतियाँ : केंद्र व दिल्ली की सरकारों को बताया मजदूर-विरोधी प्रदर्शन के दौरान डीटीसी कर्मचारियों ने संसद में पारित श्रम संहिता विधेयकों की प्रतियाँ जलाई. मोदी सरकार द्वारा लाए जा रहे किसान-मजदूर विरोधी कानूनों को लेकर कर्मचारियों ने अपना रोष व्यक्त किया और कहा कि आगे हमारे पास संघर्ष के अलावा और कोई उपाय नहीं. संघ-भाजपा की ये सरकार हमसे यूनियन बनाने और हड़ताल करने तक के अधिकार छीन रही है.

प्रदर्शन को संबोधित करते हुए डीटीसी वर्कर्स यूनिटी सेंटर के महासचिव राजेश ने कहा कि, “इन नए कानूनों के चलते परमानेंट व कॉन्ट्रैक्ट सभी कर्मचारियों को भारी क्षति पहुंचेगी. दिल्ली सरकार भी लगातार मजदूरों के मुद्दों पर चुप्पी साधे हुए है, दिल्ली के परिवहन मंत्री जो कि डीटीसी के चेयरमैन भी हैं, कर्मचारियों की एक भी मांग सुनने को तैयार नहीं. केजरीवाल सरकार द्वारा डीटीसी को खत्म कर दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन को निजी हाथों में दिया जा रहा है. पूरे देश में किसान सड़कों पर उतरे हुए हैं, संसद में बहस की कोई जगह नहीं बची – हमें यहाँ से अपने आन्दोलन को आगे बढ़ाने का रास्ता खोजना ही होगा.”

मजदूरों-किसानों का मजबूत मोर्चा ही सरकार से ले सकता है लोहा – एका बनाने के अलावे और कोई चारा नहीं।

डीटीसी वर्कर्स यूनिटी सेंटर के अध्यक्ष संतोष राय ने अपने संबोधन में कहा कि देश के मजदूरों को जात-सम्प्रदाय के नाम पर बांटकर लगातार निजीकरण और गुलामी का राज लाने की कोशिश की जा रही है. आज के समय में यही हमारे सामने सबसे बड़ी मुश्किल है. हमें हर प्रकार से मजदूरों के बीच जाति, धर्म-सम्प्रदाय के नाम पर किए जा रहे विभाजन का मुकाबला करना पड़ेगा वरना न तो सरकारी नौकरियां बचेंगी और न ही श्रम-अधिकार.

उन्होंने आगे अपनी बात रखते हुए पूरे देश में चल रहे किसान आन्दोलन का समर्थन किया और कहा कि डीटीसी के कई कर्मचारी कृषक परिवारों से आते हैं, ऐसे में सरकार द्वारा संसद के माध्यम से लाए जा रहे फरमान उनके घरों से लेकर कार्यस्थलों तक को बुरी तरीके से प्रभावित करेंगे.
(एक्कटू के प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित)

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