साहित्य जगत

‘आज के कवि’ श्रृंखला : रेखा चमोली – संविधान! कितना शानदार शब्द हो तुम

आज के कवि
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रेखा चमोली की कविताओं में शिद्दत से महसूस कर सकते हैं स्त्री का दर्द, मजदूर की पीड़ा और पहाड़ का दुःख. हिमालय की यह कवयित्री संबोधित करती हैं संविधान को. पत्थर इकठ्ठा करते अपने बचपन की स्मृतियों को याद करती हैं. मैदानी भूमि पर बिछी रेल पथ और सड़कों पर चलते हुए जो मजदूर नहीं पहुँच पाए अपने घरों तक, रेखा उनकी कहानी दर्ज करती हैं अपनी कविता में.

यह इसलिए भी कि कवयित्री ने उत्तरकाशी में सैलाब का तांडव देखा है. देखा है बादल फटने के बाद बर्बादी का दुःख और देखा है पूरा-पूरा गाँव उजड़ते.
रेखा चमोली अपनी कविता ‘संविधान’ में संविधान से सम्वाद करते हुए कहती हैं –
संविधान! कितना शानदार शब्द हो तुम/कितना खास और वजनदार

कवयित्री जानती हैं कि संविधान ही नागरिकों का रक्षा कवच है. तभी वह उसे ‘शानदार’ और ‘वजनदार’ कहती हैं. किन्तु उन्हें पता है आज सत्ता और फ़ासीवादी ताकतें मिलकर आम जन को इस संविधान से अलग और वंचित रखने की साजिश कर रहे हैं-
तुम मेरे पास उतनी ही देर रहते हो जितनी देर तक
मेरे आसपास के तानाशाह अपनी तानाशाही से बेख़बर रहते हैं
जितनी देर तक मेरे जीने की अदम्य इच्छाशक्ति
मुझे खत्म करने के तमाम मंसूबों पर भारी पड़ती है

कवि को मालूम है कि अब संविधान को बचाने के लिए इन तानाशाही ताकतों के विरुद्ध खड़ा होना होगा. लड़ना होगा अदम्य इच्छाशक्ति के साथ.

आज जब चारों ओर त्रासदी और हाहाकार है, इंसानी सभ्यता ख़तरे में है, ऐसे में कवयित्री एक माँ की तरह हौसला देती हैं. वह कहती हैं –
बुरा समय भी बीत जायेगा. दरअसल यह हौसला उन्हें उस पहाड़ी जीवन से मिला है, जहाँ प्रकृति समय-समय पर इम्तेहान लेता है. पहाड़ और वादियाँ बेशक मनोरम और आकर्षित हैं, किन्तु वहां जीवन उतना सरल नहीं.

कभी जवाहरलाल नेहरु ने अंग्रेज़ी शासन के जेल से अपनी बेटी इंदु (इंदिरा गाँधी) को पत्र लिख कर एक पत्थर की कहानी बताया था. रेखा अपनी कविता ‘पत्थर दिल’ में लिखती हैं –
बचपन में खूब सारे पत्थर इकठ्ठे किए थे मैंने
अलग-अलग रंग आकार और भार के
चट्टानों से नदी किनारो से सड़कों से खेतों से
तरह तरह की कहानियां सुनाते पत्थर अपने बनने बिगड़ने की
इन कहानियों का ढूंढना पड़ता था
कवयित्री रेखा यहाँ अपने पिता की कही हुई बातों को भी शिद्दत से याद करती हैं.
पिता अब भी मेरे पास आते हैं
मेरे गमलों के पास पड़े पत्थरों को देख मुसकाते हैं
वे यह नहीं जान पाते
जिन पत्थरों को वे सड़क किनारे छोड़ आए थे
वे उनकी बेटी का पीछा करते रहे
और अन्ततः उसे पत्थर दिल बना के रहे।

रेखा चमोली का कवि मन ऊपर से शांत और भीतर से चंचल और आहत है. ठीक उसी तरह जैसे हिमालय के भीतर की हलचलें जो दिखाई नहीं देती. तभी उनका मन व्यथित है और कहता है –
आग उगलती सड़क के किनारे
एक पुराने छाते के सहारे बैठी है वह
उसके सामने छोटे-बड़े पत्थरों का ढेर है

‘भारत माता’ शीर्षक से लिखी उनकी इस कविता को पढ़कर आप महसूस कर सकते हैं कि इस कवि का मन भावुक और बहुत संवेदनशील है.
‘पहाड़’ कविता खुद कवयित्री रेखा चमोली की कहानी, कथा-व्यथा है.

-नित्यानंद गायेन
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‘आज के कवि’ श्रृंखला में आज पढ़िए रेखा चमोली की कविताएँ

रेखा चमोली की कविताएं

1. संविधान

संविधान! कितना शानदार शब्द हो तुम
कितना खास और वजनदार
तुम्हें स्कूल की किताब में पढ़ा था सबसे पहले
पढ़कर बहुत अपने और सच्चे लग थे तुम
तुम्हारे होने को मैंने खुद का होना समझा था
अभी भी कभी-कभार पढ़ने-सुनने में आ जाता है तुम्हारा नाम
अब भी तुम्हें पढ़ना- सुनना अच्छा लगता है
अब भी मुझे सबसे ज्यादा भरोसा तुम्हीं पर है

वैसे तुमसे मेरा नाता न के बराबर ही रहा है
तुम मेरे हिस्से में जो-जैसे-जितने हो
सिर्फ मेरी ज़िद और जोर जबरदस्ती की वजह से हो

अक्सर तुम्हें,
मेरी खुशी और भलाई के वास्ते मुझसे दूर रखा गया
मुझे बताया गया
कि तुम किताबों और वक्तव्यों में ही अच्छे लगते हो!
जिंदगी में तुम सत्ता और धर्म के भव्य लेकिन दागदार ध्वजों की छाया में
घिसटते लुटते-पिटते मिलते हो
उस वक्त मेरी आत्मा खून के घूंट पीती है
मेरे सपनों में उन पूर्वजों की बेबसी सिसकती है
जिनके सपनों में तुम उम्मीद की तरह खिले महके थे

तुम मेरे पास उतनी ही देर रहते हो जितनी देर तक
मेरे आसपास के तानाशाह अपनी तानाशाही से बेख़बर रहते हैं
जितनी देर तक मेरे जीने की अदम्य इच्छाशक्ति
मुझे खत्म करने के तमाम मंसूबों पर भारी पड़ती है

मेरे भोले स्वप्न!
किताबी दोस्त!
मुझे पता है मेरे जरा से लापरवाह होने पर तुम गुमा दिए जाओगे
किसी किताब के छोटे-बड़े शब्दों के बीच
और मेरी भलाई के बहाने वहीं रहने के लिए मजबूर कर दिए जाओगे

मेरे प्यारे दोस्त!
अब मेरे मन में मेरी खुशी, मेरी भलाई की
कोई कामना शेष नहीं रह गयी है

बहुत दिनों से मन चाह रहा है
तुम्हें किताबों के पन्नों से चुपचाप गायब कर दूं
और उन खाली जगहों पर बच्चों से
उनका कोई मनपसंद नया शब्द भरने को कहूं।

2.बुरा समय

यह समय भी बीत जाएगा
बुरे से बुरे समय को भी बीतना ही पड़ता है
बुरे समय के साथ बहुत कुछ बीत जाता है
जिसमें बहुत कुछ उतना बुरा भी नहीं होता
जितना बचा रह जाता है

चूंकि ये बुरा समय सामूहिक रूप से बुरा है तो
कुछ जरूरी सवाल पूछ रहा है

इस बुरे समय के बाद जो बचे रह जाएंगे
क्या थोड़े ज्यादा मानवीय होंगे
जीवन का थोड़ा अधिक मोल समझेंगें
दूसरों के हिस्से की रोटी जगह हवा पानी हक मारते समय
उनके हाथ कांपेंगे
धड़क उठेंगे जोर से उनके दिल
जाएगा अपने बाल बच्चों पर ध्यान
या भूल जाएंगें सब कुछ मिलते ही एक ताजी सांस
पिछले दिनों की भरपाई के लिए टूट पड़ेंगे कई गुना ताकत से
पता नहीं ?

क्या बुरे समय के समय उठे सवाल आएंगें उनकी नींद में
सेाते जागते झकझोड़ेंगे

बुरा समय क्यों आया
क्या इसे टाला जा सकता था
किसने बचाया उन्हें इस बुरे समय में
आगे कभी इतना बुरा समय न आने पाए
इसके लिए अपने जीते जी क्या कर जाएं
कहीं मेरे जाने अंजाने मेरी वजह से तो किसी के जीवन में नहीं आया
कभी कोई बुरा समय
और जब तक सबके हिस्से नहीं आता अच्छा समय
समय ज्यादा देर तक अच्छा नहीं रह पाएगा

च्यूंकि समय सामूहिक रूप में बुरा है
तो क्या इन सवालों के जबाब ढूंढने के सामूहिक जतन किए जाएंगें
क्या इन सवालों को हल करते हुए
कमजोर से कमजोर आदमी का पक्ष सोचा जाएगा

अगर नहीं
तो यह बुरा समय ही क्या बुरा है ?

3.पत्थर दिल

बचपन में खूब सारे पत्थर इकठ्ठे किए थे मैंने
अलग-अलग रंग आकार और भार के
चट्टानों से नदी किनारो से सड़कों से खेतों से
तरह तरह की कहानियां सुनाते पत्थर अपने बनने बिगड़ने की
इन कहानियों का ढूंढना पड़ता था
ऐसा कभी कभी ही संभव था कि राह चलते अचानक मिल जाता कोई पत्थर
और मुझे एक अच्छा श्रोता जान टकरा जाता पैर से
मैं उस नये किस्सागो को झट से उठा लेती
मेरे किस्सों कहानियों के खजाने में एक और कहानी जुड़ जाती
इन पत्थरों से भरे थैले को
छोटे से किराए के घर में भी सम्मानजनक जगह मिली थी
पिता तब निवेशक की भूमिका में नहीं थे
पिता तब खालिस पिता थे
तब मैं राजदुलारी बिटिया थी
घर बदलते समय तमाम सामानों के बीच जगह नहीं बन पायी उस थैले के लिए
अचानक बहुत भारी हो गया था वह

तुम्हें खूब सारे नए पत्थर मिलेंगे वहां
पिता ने दिलासा दिया
सच में खूब सारे नए पत्थर थे नयी जगह में
एक जैसे जिनको तोड़कर रोड़ी बननी थी
रेत से छाने गोल मटोल साफ सुंदर
पर कोई भी मेरे खजाने जैसा नहीं था
खुरदुरा ईंट रंग का मिट्टी से सना
चट्टानों की परतें समेटे
ये तो बिन मांगे पत्थर थे
इन्हें मैंने नहीं चुना था
इनकी खोज में मैने कोई छोटी बड़ी यात्रा नहीं की थी
इनको पाने की खुशी में दोस्तों के सामने इतरायी नहीं थी
मेरा मन किसी कहानी को सुनने का नहीं रहा

पिता यूं ही मेरी मनपसंद चीजों को मुझसे दूर करते रहे
हर बार उनके पास कोई न कोई वजह होती थी
हर बार मैं अच्छी बच्ची की तरह कहना मानती थी
धीरे धीरे पिता , पिता की भूमिका से निवेशक की भूमिका में आ गये
अब मैं दुलारी बिटिया न रही
अब मैं समाज इज्जत मर्यादा परेशानी बन गयी
एक दिन मेरे न चाहने पर भी पिता ने
मुझे अपने घर से निकाल दिया
बिल्कुल उन पत्थरों की तरह
जिनसे उनका कभी कोई लगाव न था
वे सिर्फ मेरा मन रखने के लिए उनकी तारीफ करते थे
वे चाहते थे मैं उन पत्थरों में व्यस्त रहूं
मेरा ध्यान जरूरतों पर से कम हो जाए

पिता अब भी मेरे पास आते हैं
मेरे गमलों के पास पड़े पत्थरों को देख मुसकाते हैं
वे यह नहीं जान पाते
जिन पत्थरों को वे सड़क किनारे छोड़ आए थे
वे उनकी बेटी का पीछा करते रहे
और अन्ततः उसे पत्थर दिल बना के रहे।

4. भारतमाता

आग उगलती सड़क के किनारे
एक पुराने छाते के सहारे बैठी है वह
उसके सामने छोटे-बड़े पत्थरों का ढेर है
बिना रूके चल रही उसकी उंगलियां
मानों उसकी थकान और बेबसी को चुनौती देती हैं
रोड़ी तोड़ने से निकली ध्वनि में एक संगीत तो है
पर वह मन को लुभाता नहीं
मन में एक अजीब सी कसक पैदा करता है
राह चलता हर आदमी जल्दी से गुजरता है वहां से
कहीं कोई टुकड़ा न छिटक कर लग जाए
सड़क किनारे गाड़ी पार्क करने वाले उसे देख चिढ़ते हैं
पुलिसवाला आकर धमका जाता है
पर कोई उन्हें कुछ नहीं कहता
जिनके लिए वह रोड़ी तोड़ती है
उसके आसपास भद्दी आवाजों के शोर हैं
मोबाइल पर बजते बेसुरे गाने हैं
अश्लील मजाक हैं
पर वह फिर भी तोड़ती है रोड़ी सड़क किनारे
क्योंकि कैसी भी बुरी परिस्थिति हो
भूख कोई लिहाज नहीं करती
पट पट चलती लय के बीच में आ जाता है
उसका एक ढेड़ साल का बच्चा
मचलता है भूख से
रोकना चाहता है उसका हाथ थोड़ी देर के लिए
वह जानती है जितनी देर उसका हाथ रूकेगा
उतनी ही कम हो जाएगी रात की रोटी की संभावना
इसलिए अपने कपड़ों में छिपाया
रोटी का सूखा टुकड़ा पकड़ाती है बच्चे को
बच्चा सूखी रोटी को कुछ देर चूसकर फिर से रो उठता है
अबकि बार वह बच्चे को अपनी गोद में उठा लेती है
पानी पर पड़ती धूप सी चमकती है बच्चे की आंखें
अपने सूखे निचुडे़ स्तन से लगाती है उसे
बच्चा कुछ ही देर में हटा लेता है मुंह
खिलखिलाता है मां की चालाकी पर
और फिर से उठा लेता है सूखी रोटी का टुकडा़
इस बीच सामने की दुकान पर कुछ लोग जमा हो गए हैं
टी वी पर हो रही बहस को सुनने के लिए
कोई चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है
भारतमाता की जय न बोलने वाला हर आदमी देशद्रोही है
सही बात है !!!
इन सालों को पाकिस्तान भेज दो !!!
एक और आवाज आती है
सड़क किनारे रोड़ी तोड़ रही भारतमाता का
इस बहस से कोई लेना देना नहीं है।

5. शर्मिंदा मन

रेल की पटरियां बोल पातीं तो क्या यह कहतीं
हम शर्मिंदा हैं
सड़कें समेट लेतीं खुद को किसी कार्पेट की तरह
एक सुबह सिर्फ गाडियां ही गाडियां दिखतीं
सड़क एक भी नहीं

काश रेल की पटरियों और सड़कों को कहना आता
अगर हमें बनाने वाले हमसे होकर अपने घर नहीं पहुंच पा रहे
तो हमें यहां नहीं रहना।

6.पहाड

तीखे ऊंचे ढलान वाले पहाड़
मुझे इसलिए अच्छे लगते हैं
कि इनमें घर नहीं बन सकते
इनमें खेत बनाने की कोई सोचता नहीं
इनके सीने पर सड़क काटनी कठिन होती है
और इस तरह बच जाती है थोड़ी सी जगह
पेड पौधों झाडियों घास कांटों के लिए
पत्थरों काईयों चिडियों जीव जन्तुओं के बसने के लिए।

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