आलेख राजनीति

माड़ भात चोखा का विकल्प

माड़-भात-चोखा का विकल्प…
बेबाक कौशलेन्द्र

आज बचपन के दिन याद आ रहे हैं। अल्युमिनियम की डेगची में माँ भात बनाती थी। ढभकना और सीझना ये दो शब्द प्रतिदिन कान में पड़ते थे।

स्कूल जाने से पहले रसोई के दरवाजे पर जाकर मेरा कहना- देर हो रही है माँ। मां का उत्तर– भात ढभक रहा है और सीझने ही वाला है। माड़ पसाने के बाद माड़-भात देते हैं बेटा…

दाल-सब्जी पकने में देर होने के विकल्प स्वरूप गरमा-गरम माड़ और भात। उबले आलू में नमक व तेल मिलाकर माँ फटाफट चोखा भी दे देती थीं।

सुर्र-सुर्र की आवाज के साथ माड़-भात और चोखा खाकर असीम संतृप्ति की अनुभूति होती थी।

सब्जी-दाल व अन्य व्यंजन तैयार नहीं होने पर परिस्थितिजन्य विकल्प के तौर पर माड़-भात-चोखा के विकल्प का ऐसा स्वाद जिह्वा पर चढ़ गया था कि आज जब कुकर के जमाने में माड़ मेन्यू से गायब हो गया है तो उसकी बहुत याद आती है।

आज भी नाना व्यंजन उपलब्धता के बावजूद जिस दिन गरमा-गरम भात-दाल (चूंकि माड़ दुर्लभ व्यंजन की श्रेणी प्राप्त कर चुका है) और चोखा मिल जाता है तो संतृप्ति की डकार स्वत:आ जती है।

आप भी सोच रहे होंगे कि आज कौशलेन्द्र बेबाक में माड़–भात–चोखा क्यों परोसने बैठ गया?

सच कहूं तो आज ‘विकल्प’ शब्द का वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में चिंतन कर रहा था। उसी चिंतन क्रम में हिन्दी शब्दकोश खंगाल डाला।

शब्दकोश से ज्ञान वृद्धि हुई कि संज्ञा पुल्लिंग शब्द विकल्प का अर्थ भ्रांति, भ्रम और धोखा भी होता है। शब्दकोश की व्याख्यानुसार– एक बात मन में बैठाकर फिर उसके विरुद्ध सोच विचार और संकल्प का उलटा अर्थात् विपरीत कल्पना करना या निर्धारित करना ही विकल्प होता है। विशेष—मीमांसा में विकल्प दो प्रकार का माना गया है— एक व्यवस्थायुक्त, दूसरा इच्छानुयायी।

अब आप कहेंगे कि विकल्प शब्द की इतनी विषद् विवेचना का राजनीति और विशेषकर सूबे झारखंड की राजनीति से क्या लेना-देना?

निम्न प्रसंगों पर गौर करें और इस दफा बेबाक मूल बने शब्द ‘विकल्प’ की उपस्थिति और एतद् संबंधी सियासी दांव-पेंच आपको भी स्पष्ट दिखाई देने लगेंगे।

बिहार से पृथक् होकर बने राज्य झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बने बाबूलाल मरांडी। सपाट शब्दों में कहें तो झारखंड में भाजपा के नेता। दो से अढाई साल में उनके विकल्प बन गये भाया झारखंड मुक्ति मोर्चा भाजपा में आये अर्जुन मुंडा।

बाद में बाबूलाल मरांडी ने भाजपा का सियासी विकल्प 14 वर्षों तक झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) में तलाशा।

लंबे समय तक भाजपा के सियासी रथ के शाह सवार रहे अर्जुन का तीर अपनी ही विधानसभा में विजय लक्ष्य नहीं भेद पाया और सूबे झारखंड में भाजपा के नेतृत्व विकल्प बने रघुबर दास।

पहली दफा सूबे में भाजपा की सरकार पूरे पांच साल चली। केन्द्रीय भाजपा नेतृत्व को भी लगा कि अब झारखंड में सरकार कायम रखने के लिये विकल्प की तलाश का खेल खत्म।

‘विकल्प’ शब्द की काली छाया कहिये अथवा सूबे के सियासत की माया। उड़ने वाले हाथी ने रघुबर दास की उनके अपने ही विधानसभा क्षेत्र में क्रैश लैंडिंग करा दी।

नतीजा भाजपा का राजयोग खत्म और विनम्रता के सियासी रथ पर सवार हेमंत सोरेन बहुमत की सरकार के वर्तमान नायक बन गये।

हेमंत सोरेन सरकार के क्रियाकलापों, अबतक की उपलब्धियों और नाकामियों का विवेचन फिर कभी।

फिलहाल विकल्प भंवर जाल में उलझे वर्तमान झारखंड भाजपा के नेतृत्व द्वंद्वात्मक खींचतान पर नजर दौड़ा लेते हैं।

14 साल के वनवास के बाद अपने झाविमो को कुतुबमीनार से फेंक कर बाबूलाल मरांडी पुनः भाजपा में लौट आये। भाजपा ने तो उन्हें नेता विधायक दल चुन लिया लेकिन सूबे की वर्तमान विधानसभा के अध्यक्ष उन्हें नेता प्रतिपक्ष का दर्जा देने के बजाय तारीख पर तारीख दिये जा रहे हैं।

मान लिया जाये कि हेमंत सोरेन सरकार बाबूलाल मरांडी को सियासी सबक सिखाने में जुटी है किन्तु झारखंड भाजपा में वापसी के बावजूद बाबूलाल मरांडी संगठन के हासिये पर एकाकी ही दिख रहे हैं। इस दफा विकल्प के आॅडिशन में मरांडी का सियासी भविष्य क्या होगा फिलहाल कहा नहीं जा सकता।

अर्जुन मुंडा बड़ी मशक्कत के बाद खूंटी लोकसभा जीत दिल्ली में अपना खूंटा टिकाये बैठे हैं।

रघुबर की माया और प्रभाव छाया का असर भाजपा प्रदेश संगठन में फिलहाल तो सर्वाधिक दिखाई दे रहा है किन्तु ‘पार्टी विथ डिफरेंस’ कही जाने वाली भाजपा की झारखंड इकाई में ‘लीडर्स विथ डिफरेंस’ की झलक आपको पार्टी बैठकों और सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सहज ही दिख जायेगा।

संघ की पाठशाला से निकले वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष दिपक प्रकाश के ‘टीम दीपक’ और वनवास से भाजपा में लौटे बाबूलाल मरांडी के ‘टीम बाबूलाल मरांडी’ तथा केन्द्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा के ‘टीम अर्जुन मुंडा’ की सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर सक्रिय मौजूदगी के बीच ‘टीम झारखंड भाजपा’ की गैरमौजूदगी मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना को ही स्थापित करती दिख रही है।

हलांकि भाजपा के शीर्ष तक पहुँचने वाले नेताओं का ‘विकल्प’ शब्द से पुराना बैर रहा है।

बिहार पर गौर कीजिये।
पिछले 30-35 साल से बिहार में भाजपा सुशील मोदी का ही विकल्प ढूंढने में जुटी है। छोटे मोदी ने दर्जनों प्रतिभाशाली व विकल्प योग्य भाजपाइयों को लगातार हासिये के आइसोलेशन में रखा।

छत्तीसगढ़ में डेढ़ दशक राज करने के बाद जब रमन सिंह डूबे तो ऐसा हाल कर गए कि डेढ़ साल बाद भी छत्तीसगढ़ भाजपा को विकल्प ढूंढे नहीं मिल रहा। मध्यप्रदेश में शिव का राज विकल्प कंटक विहीन जारी ही है।

राजस्थान प्रकरण तो ताजा ही होगा आपके जेहन में। सचिन पायलट को भाजपा का विकल्प बना गहलोत सरकार को पलटने चले दिल्ली भाजपा दरबार को वसुंधरा राजे ने औकात का अहसास करा दिया।

झारखंड ही नहीं संपूर्ण भारत के सियासी अखाड़े के पहलवान राजनेता, स्वयं का विकल्प छोड़कर सबको विकल्प सुझाते रहते हैं।

सूबे में दुमका और बेरमो विधानसभा उपचुनाव तारीख के ऐलान से पहले सियासी अखाड़ा सज चुका है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन दुमका से चुनावी शंखनाद भी कर चुके हैं।

सत्ता गठबंधन सहयोगी कांग्रेस के प्रभारी आरपीएन सिंह और प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव भी दिवंगत राजेन्द्र सिंह के पुत्रों में जारी उतराधिकार जंग की आग बुझाने और बेरमो किला बचाने की जुगत में लगे हैं.

किन्तु विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनी भाजपा की झारखंड इकाई में फिलहाल विकल्प बनने को आतुर नेताओं की भीड़ तो दिख रही है, किंतु कार्यकर्ताओं की फौज हासिये पर खड़ी होकर तमाशा देखती ही नजर आ रही है।

बिहार से अलग झारखंड बने 20 साल हो चुके हैं, बावजूद इसके बिहारियों की भांति हम झारखंड के लोग विकास की आस में अपने प्राण राजनीति में ही बसाये रखते हैं।

पलायन, विस्थापन, खतियान, मूलवासी, बागी-दागी, दलबदलू और विकल्प बनने के नेताओं की दिशाहीन कलाबाजी देखने में भी माड़-भात-चोखा सरीखा ही आनंद आता है।

गांव में सुना था कि बंटवारे में जिस भाई को दक्षिण का हिस्सा मिलता है उसके विकास का दिपक वैकल्पिक हर्ष की बाट जोहता रह जाता है।
फिलवक्त विकल्प जोगियों की भरमार वाले प्रतिपक्ष से हेमंत सोरेन सरकार को तो कोई खतरा नहीं दिखाई दे रहा, किन्तु विकल्प का भूत यदि झामुमो परिवार में भी घुस गया तो झारखंड की जनता को भी माड़-भात-चोखा से ही संतृप्ति की डकार लेनी होगी।

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