विचार कॉलम

कोरोना काल से दम तोड़ता युवा

देश में पहले ही सरकारी नौकरियों में अव्यवस्था फैली हुई थी.. दो तीन सालों में किसी परीक्षा का परिणाम निकलता था. लेकिन कोरोना काल में तो सरकारी नौकरी ही खत्म करने की शुरुआत हो गयी है. उत्तर प्रदेश सरकार समूह “ख” और “ग” में पांच वर्ष के लिए संविदा पर नियुक्ति के लिए विचार कर रही है. इस योजना में छमाही मूल्यांकन किया जाएगा और 60% से कम अंक लाने वालों को बाहर कर दिया जाएगा. इस तरह के हर छमाही मूल्यांकन से जो पांच वर्ष में खरा उतरेगा उसे ही केवल मौलिक नियुक्ति मिलेगी. इस पांच वर्ष के दौरान नियमित सरकारी सेवकों को मिलने वाले लाभ नहीं दिए जाएंगे. इसे कैबिनेट के समक्ष विचार करने के तैयार किया जा रहा है. सरकार का तर्क है कि राज्य कर्मचारियों में दक्षता बढ़ेगी, वित्तीय बोझ कम होगा और लोगों में कर्तव्यपरायणता, देश भक्ति और नैतिकता के मूल्यों का विकास होगा.

वही दूसरी तरफ वित्त मंत्रालय ने एक मेमोरेंडम इशू करके नए सरकारी पदों पर रोक की बात कही ये जुलाई से अनिश्चितकाल के लिए लगी रोक हैं. ये रोक बैंक और सार्वजनिक क्षेत्र की अन्य कंपनियों पर भी लगेगी. यहां भी वज़ह वित्तीय संकट बताया गया है.

सवाल ये उठता है कि क्या वाकई केवल छह महीने के कोरोना काल से स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि नए पद सृजन नहीं होंगे? कहीं ऐसा तो नहीं है कि कोरोना महामारी के पीछे सरकार अपने पिछले वर्षों की नाकामी बाहर कर रही है.

अगर वाकई देश इतने भयंकर आर्थिक संकट में आ चुका है तो क्या अन्य उपायों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए? क्या वित्तीय संकट का बोझ देश का युवा ही वहन करेगा? कुछ सुझाव सरकार को हम युवा से लेने चाहिए ताकि आगे पैसे की कमी से कोई अन्य विभाग की नौकरी पर असर न पड़े,
सरकार के लिए सुझाव है कि–

* इस कोरोना काल में भी जिनकी संपत्ति बढ़ी है या लाभ हुआ है.. उनसे लाभ का 50% सरकारी खजाने में जमा करा लेना चाहिए.

* देश के बड़े उद्योग पति, बिजनेसमैन पर लगने वाला टैक्स दोगुना किया जाए.

* सभी नेता, मंत्री, विधायक की सैलरी को वित्तीय संकट टलने तक तत्काल रोक दी जाए और साथ ही इन्हें अपनी भौतिक सम्पत्ति का कुछ हिस्सा दान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए.

* सभी सरकारी कार्यक्रम पर भौतिक रूप से रोक लगायी जाए और उन्हें PM, CM वर्चुअल ही attend करें और सभी सरकारी खर्च को सार्वजनिक किया जाए जिससे वित्तीय बचत को प्रोत्साहन मिले

इससे देश के खजाने में तुरंत ही कैश की वृद्धि होगी और पुरानी किसी व्यवस्था को भंग करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

कल ही इलाहाबाद में रहकर उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की तैयारी कर रहे राजीव ने फांसी लगा ली है. क्यूकि उनका इंटरव्यू नहीं निकल पाया था जिससे वो हताश हो गए. राजीव कई बार से इंटरव्यू नहीं निकाल पा रहे थे. इस कोरोना काल से छात्रों की मानसिक स्थिति अच्छी नहीं चल रही है. उनका काफी समय खराब हो गया है और फिर ये नौकरी चयन में बदलाव उन्हें अवसाद में ले जा रहा है. कम से कम छात्रों की मनःस्थिति देखते हुए अभी बदलाव नहीं किए जाने चाहिए . स्थिति ठीक होने पर बदलाव पर चर्चा होनी चाहिए अगर सरकार का तर्क है कि इससे व्यवस्था में सुधार होगा लोगों में कर्तव्यनिष्ठा, नैतिकता पनपेगी. इस नाजुक वक्त में ऐसे निर्णय थोपना युवाओं के साथ अन्याय होगा.

प्रधानमंत्री जी का एक तर्क है कि लोग आत्मनिर्भर बने, स्व रोजगार को बढावा दे, खिलौने बनाए.. उनके ये सारे सुझाव उम्दा है मगर जब सरकारी नौकरी खत्म हो रही है, व्यापार मंदा पड़ रहा है तो लोगों के हाथ में पैसे नहीं होंगे, फिर इन स्व रोजगार युवा के उत्पाद को खरीदेगा कौन? हाथ में पैसे न होने से क्रय शक्ति कम होगी ही. लाइव आकर कोई भी सुझाव देने से पहले उस पर प्रधानमंत्री को गम्भीरता से विचार कर लेना चाहिए ताकि देश का युवा उनकी बात सुनकर फ्रस्ट्रेट न हो.

जो युवा अब तक अपने प्रधानमंत्री पर गर्व कर रहे थे वही ताली, थाली पीटकर, दिए, टार्च, मोमबत्ती जलाकर रोजगार की मांग कर रहा है. निराश युवा सरकार को अपनी निराशा और परेशानी समझाने के लिए अब 17 सितम्बर को बेरोजगारी दिवस, जुमला दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है. उसे उम्मीद है कि सरकार उनकी बात समझेगी और रोज रोज नए नए निर्णय देने के बजाय स्थिति को सामान्य होने तक सभी नियुक्ति पूर्ववत करेगी और किसी भी बदलाव के लिए युवाओं से भी व्यापक चर्चा करेगी बजाय निर्णय थोपने के. अभी तो देश का आधे से ज्यादा युवा गांव में बैठा हुआ है जिन्हें तेजी से हो रहे परिवर्तन की खबर भी नहीं होगी और जब पता चलेगा तो वो खुद को छला हुआ ही महसूस करेगा. नौकरी की आस में चार – पांच साल और परिवार से कोचिंग में फीस देकर वो अच्छी नौकरी का सुनहरा ख्वाब खुद देखता है और परिवार को दिखाता है. जब उसके कई साल और पैसे खर्च होने के बाद खाली हाथ रह जाए तो इलाहाबाद के राजीव की तरफ गलत कदम न उठा ले ये सोचना सरकार का ही दायित्व है.

— रीता शर्मा

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