साहित्य जगत

‘आज के कवि’ श्रृंखला : अंजनी कुमार- मुक्तिबोध अक्सर वहां होते थे, जहां द्वंद होता था

‘आज के कवि’
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एक कवि में राजनीतिक और सामाजिक चेतना का होना अनिवार्य है| तभी वह कवि अपने समाज और परिवेश का आकलन कर सकता है, उसकी व्याख्या कर उसे नई राह दे सकता है| ये खूबियां अंजनी कुमार की इन कविताओं में महसूस की जा सकती है|

कवि जब राजनीतिक चेतना के साथ सक्रीय होता है तो सत्ता की नज़र उस पर पैनी हो जाती है और पुलिस और गुप्तचर उससे पूछताछ करने लगते हैं| मतलब कि तब सत्ता कवि से डरने लगता है| कवि क्यों जाता है चांदबाग, जहां महिलाएं और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग नागरिकता कानून के विरोध में धरना दे रहे थे ?

दरअसल कवि को निष्पक्ष नहीं, उसे पक्षधर होना चाहिए, उसे पता होना चाहिए उसे किसके साथ खड़ा होना है| कवि अंजनी कुमार को पता है उन्हें किस तरफ खड़ा होना है और यह भी पता है कि इसके बदले उसे किन चीजों से गुजरना पड़ेगा|

अगले दिन गुप्तचर आता है/ पूछता है-
तुम चांदबाग गये थे क्या ?
फिर आगे क्या ?
आगे सवालों का यह सिलसिला बढ़ता है और कवि से पूछा जाता है –
खुफिया कैमरे में यह दिखने वाली पीठ
तुम्हारी ही है ना ?
मेरे सवालिया निगाह पर वे पूछते हैं-
तुम क्यों हो इस शहर में ?

आज इस देश में सत्ता से सवाल करना देशद्रोह जैसा अपराध हो गया है और दलित-शोषितों के पक्ष में आवाज़ उठाने वालों को फर्ज़ीं मुकदमों में गिरफ्तार किया जा रहा है। ऐसे में एक कवि की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है| तमाम ख़तरों के बावजूद उसे बोलना है अन्याय के खिलाफ़, यह कवि को पता होना चाहिए|

कौन सुन रहा है भीमा कोरगांव/ कौन गढ़ रहा है
गुलाम इंसान के मंसूबे/ कौन हैं जिन्हें भेजा जा रहा है जेल ?

यह बहुत ज़रूरी सवाल हैं जिन्हें कवि ने उठाया है, यही उसका कर्म है इस कठिन समय में| एक सजग कवि को अपनी परंपरा से परिचित होना चाहिए। यह परम्परा कवि और कविता की परम्परा है| अंजनी कुमार का कवि इससे भलीभांति परिचित हैं| तभी वह मुक्तिबोध को याद करते हुए लिखते हैं –

मुक्तिबोध अक्सर वहां होते थे/ जहां द्वंद होता था
जहां आगे बढ़ने का डर होता था/ जहां कांपता सा जल होता था

‘आज के कवि’ श्रृंखला की इस कड़ी में आज पढ़िए कवि अंजनी कुमार की पांच कविताएं|

-नित्यानंद गायेन
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अंजनी कुमार की कविताएं

1.चांदबाग

एक दिन पुलिस आती है मेरे पास
पूछती है- इन दिनों कहां हो तुम?
दिखते नहीं हो कहीं!

अगले दिन गुप्तचर आता है
पूछता है- तुम चांदबाग गये थे क्या?

फिर कुछ दिनों बाद
दोनों आते हैं और दलील देते हैं
खुफिया कैमरे में यह दिखने वाली पीठ
तुम्हारी ही है ना?

मेरे सवालिया निगाह पर वे पूछते हैं-
तुम क्यों हो इस शहर में?
हर बार की तरह
एक लंबी चुप्पी
आगे बढ़ने से इंकार कर देती है
इंकार सवाल बनकर आता है

सवाल, सवाल लेकर आता है
फिर धमकियां
और फिर, ताकत दोनों तरफ से
मुझे नहीं पता अगले दिन
अखबार में क्या छपा!

2.भीमा कोरेगांव

एक शहीद मीनार
गवाह है दलित आवाज की
जिसे सुना नहीं गया
वह आवाज कितनी साफ थी
और कितनी उम्दा फिर भी
सुना नहीं गया अब भी

कौन सुन रहा है भीमा कोरगांव
कौन गढ़ रहा है
गुलाम इंसान के मंसूबे
कौन हैं जिन्हें भेजा जा रहा है जेल?

3.डर

डर कहिए, खौफ कहिए
कहिए उसे और भी नामों से
बस इतना याद रखिए
डर इधर भी है
और उधर भी

डर की शक्ल को नाम दीजिए
अपने डर को अलविदा कहिए।

4.खंडहर

मैं जब भी देखता हूं खंडहर
विरानी नहीं दिखती
समय की चैखट पर बोलती हुई
जिंदगी दिखती है
तुम एक खड़ी इमारत को
गिरा दो बना दो मलबा

वे बोलते रहेंगे
अपने तामीरदारों के नाम,
इंटों पर बने रहेंगे
मेहनतकश हाथों के निशान

मैं जब भी गुजरता हूं खंडहर से
इतिहास की उम्र से
थोड़ा बड़ा हो जाता हूं।

5.मुक्तिबोध

मुक्तिबोध अक्सर वहां होते थे
जहां द्वंद होता था
जहां आगे बढ़ने का डर होता था
जहां कांपता सा जल होता था
जिसमें नहीं दिखता था
अपना ही साफ चेहरा फिर भी बार बार

झांककर देखता था वह
अपना ही विखंडित होता चेहरा

ज्ञान, विद्या, बुद्धि, चेतना
और उसके ऊपर बैठा एक गुरुघंटाल

मुक्तिबोध अक्सर सुना करते थे
मलय से आती हुई आवाज
पुकारती हुई पुकार
शालवन जंगलों से उठती पदचाप।

मुक्तिबोध अक्सर वहां हुआ करते थे

जहां होता था द्वंद
और होती थी संवाद की उम्मीद

वे डरते थे खोह से
जहां बैठा होता था अपना ही आरोंगउटांग।

मुक्तिबोध अक्सर वहां होते थे
जहां पहुंचने में अब भी
निकलता होता है अपने घर से।

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