साहित्य जगत

कवि नित्यानंद गायेन के साथ कविता, जीवन, राजनीति और नेपाल

नित्यानंद गायेन से प्रमोद धिताल की बातचीत (मई 12, 2019)

(साक्षात्कार ऐसी विधा है जिसके जरिए सवाल जवाब के क्रम में हम उन तमाम व्यक्तिगत, सार्वजनिक, साहित्यिक और रचनात्मक मुद्दों से रु ब रु हो सकते हैं जिससे आम तौर पर परिचित नहीं होते। साक्षात्कार के द्वारा जवाब देने वाले व्यक्ति के निजी संघर्षों, उसकी व्यक्तिगत अभिरुचियों और अवधारणाओं के बारे में जान सकते हैं। अगर सवाल जवाब पहले से प्रायोजित नहीं है तब साक्षात्कार की सहजता और भी निखर कर सामने आती है। सुपरिचित युवा कवि नित्यानंद गायेन से नेपाल के कवि प्रमोद धिताल ने एक बातचीत की है। भूमिका संतोष चतुर्वेदी जी से साभार)

प्रश्न : नित्यानन्द जी, सब से पहले यह बताइए कि आप इन दिनों क्या कर रहे हैं?

जवाब : प्रमोद जी, आपके इस सवाल का जवाब देते हुए मुझे कवि रमा शंकर यादव ‘विद्रोही’ याद आ रहे हैं. कवि विद्रोही ने कहा था – ‘कविता एक कर्म है, जिसे मैं कर रहा हूँ फिर भी लोग पूछते हैं – विद्रोही तुम क्या करते हो?’

कविता ही कवि का कर्म है. मैं इन दिनों भी कविता कर रहा हूँ. कवि कविता से दूर नहीं रह सकता. कविता महज शब्दों से खेलना नहीं है. कविता जिम्मेदारी है.

एक कवि एक्टिविस्ट भी होता है. इसलिए वह सामाजिक और जनांदोलनों से भी अलग नहीं रह सकता. इन दिनों भारत में राजनैतिक माहौल के कारण जनांदोलन तेज हो गए हैं. क्योंकि कविता के साथ-साथ मेरा संबंध पत्रकारिता से भी है. इसलिए इन दिनों मैं तमाम जनांदोलनों में शामिल हो कर उनकी रिपोर्टिंग भी करता हूँ.

प्रश्न : विधा के हिसाब से आप को हम कवि के रूप में जानते हैं। कविता लेखन की तरफ कैसे आना हुआ? शुरुआती पृष्ठभूमि बता सकते हैं?

जवाब : मेरा जन्म भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में हुआ था. भारत में बंगाल को कवि की उर्व भूमि भी कहा जाता है क्योंकि कवि रबीन्द्र नाथ, सुकुमार राय, नज़रुल इस्लाम, शरत चंद्र आदि अनेकों कवि-लेखकों का संबंध बंगाल से है. इसलिए आज भी संगीत, कला और साहित्य के क्षेत्र में बंगाल की अलग पहचान है. बंगाल के हर घर में सुबह से ले कर शाम तक किसी भी वक्त आपको रवीन्द्र संगीत या नज़रुल गीति सुनाई पड़ सकती है. वहां धार्मिक और सामाजिक उत्सव हों या कोई राजनीतिक या सामाजिक आन्दोलन उनमें भी कविता और गीतों को गाया-बजाया जाता है जिसका असर वहां के बच्चों में बचपन से ही पड़ने लगता है. हाँ, इसका यह मतलब कतई नहीं कि वहां हर घर में कवि, चित्रकार या संगीतकार पैदा होता है. किन्तु यह पक्का है कि उस वातावरण के कारण बंगालियों में साहित्य–कला और संगीत की अच्छी रूचि व समझ होती है. कुछ ऐसा मेरे साथ भी हुआ हो शायद. हालांकि मैं जब कक्षा चार में गया उस वक्त मेरे पिता की मृत्यु हो गई और माँ के साथ हम राजधानी दिल्ली आ गये. दिल्ली में आने के बाद मेरी माँ को जवाहर लाल विश्वविद्यालय में कुछ काम मिला और हम वहीं कैम्पस में रहने लगे. जब दिल्ली आया था तब मुझे हिंदी नहीं आती थी. फिर जब यहाँ स्कूल में मेरा दाखिला हुआ तब हिंदी पढ़ते हुए हिंदी के कवियों और लेखकों को जानने लगा. फिर पता चला हिंदी के कई बड़े लेखक-कवि-आलोचक इसी कैम्पस में रहते हैं और उनसे मिलने अनेक बड़े कवि-लेखक वहां आते हैं. कवि केदार नाथ सिंह, आलोचक नामवर सिंह, कथाकार नासिरा शर्मा जैसे लेखक जे. एन. यू में रहते थे.

किन्तु उस वक्त हम छोटे थे और पढ़ाई के साथ–साथ मुझे घर का काम भी करना पड़ता था. मुझे अपने भाई-बहन को स्कूल के लिए तैयार करना होता था, खाना बनाना पड़ता था, कमरे की सफाई करनी पड़ती थी.

बड़ा होकर क्या करूँगा या बनूँगा कुछ सोचने का वक्त नहीं मिला उस समय. हाँ, बचपन से ही पढ़ने की आदत पड़ गई थी मुझे. मैं घंटों पढ़ा करता था. पांचवी कक्षा तक तो हमेशा प्रथम आया स्कूल में और मुझे मेधावी छात्रवृत्ति मिलती थी.

जब कक्षा आठ में था तब पहली बार कवि नागार्जुन को साक्षात देखा. वे जे. एन. यू. आये हुए थे. जे. एन. यू. के दीवारों पर पाश, ब्रेख्त, मुक्तिबोध, गोरख पाण्डेय और नागार्जुन की कविताओं की पंक्तियाँ लिखी होती थी.

यह सब मैं इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि मुझे यह लगता है इन सब परिस्थियों का योगदान अवश्य रहा है मेरे कवि के निर्माण में.

बारहवीं कक्षा में जब पढ़ रहा था तब मुझे लगा कि मैं लिख सकता हूँ. पर कवि-पत्रकार बनूँगा यह नहीं सोचा था. और स्कूल के बाद मनोविज्ञान की पढ़ाई करना चाहता था. ग्यारहवीं और बारहवीं में यह मेरा विषय भी था. किन्तु ऐसा हुआ नहीं. मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से बी. ए. की पढ़ाई करने लगा. इसी दौरान मैंने सामाजिक और राजनैतिक मुद्दों पर लिखने की शुरुआत की. इतना ही नहीं उसे छपवाने के लिए 14 किलोमीटर साईकिल चला कर भोगल से निकलने वाले एक साप्ताहिक अख़बार के कार्यालय तक जाता था. उस अख़बार के सम्पादक मेरे एक स्कूली सहपाठी के पिता थे. इस तरह से लेखन प्रारंभ हुआ. बी. ए. पूरा करने तक उस अख़बार में मेरे अनेक लेख छप चुके थे. यह सिलसिला जारी रहा और बी. ए. के बाद कई अन्य छोटी-छोटी पत्रिकाओं में मेरे लेख छपते रहे. उसी दौरान कविता लेखन का आरम्भ हुआ. किन्तु किसी साहित्यिक पत्रिका में मैंने कविता नहीं भेजी.

मैं केवल सादे पन्नों पर लिखता और एक फाइल में रख देता. फिर जब मैंने मानवाधिकार विषय पर एम. ए. की पढ़ाई कर रहा था उस वक्त तक मेरी फाइल में काफी कविताएँ जमा हो चुकी थी. एम. ए. फाइनल की परीक्षा के बाद वरिष्ठ कवि–लेखक विष्णु चंद्र शर्मा की पत्रिका ‘सर्वनाम’ पढ़ कर मैंने उन्हें फोन किया था. उन्होंने मुझे अपने घर बुलाया मिलने के लिए साथ ही पूछा – ‘तुम क्या करते हो’? मैंने बहुत संकोच के साथ उनसे कहा था – मानवाधिकार की पढ़ाई कर रहा हूँ आगे इसी विषय पर शोध करना चाहता हूँ. उन्होंने आगे पूछा – कुछ लिखते भी हो? जवाब में मैंने कहा था – ‘जी, थोड़ा–बहुत’. तब विष्णु जी ने कहा था – जो लिखते हो वो लेते आना. फिर कुछ समय बाद एक दिन मैं विष्णु जी से मिलने चला गया अपनी फाइल के साथ. उन्होंने बहुत स्नेह के साथ मेरा उत्साह बढ़ाते हुए कहा – अपने संघर्ष को पहचानों, अपने दुःख से लड़ना सीखो और लिखते रहो. फिर उन्होंने कहा – ‘अपनी एक कविता तुम मुझे दो सर्वनाम के अगले अंक के लिए. इस तरह ‘गेंद हूँ’ शीर्षक से मेरी पहली कविता ‘सर्वनाम’ के 80 वें अंक में प्रकाशित हुई.

इस तरह विष्णु चंद्र शर्मा जी मुझे हिंदी कविता की दुनिया में ले आये. सर्वनाम में पहली कविता छपने के बाद कई और अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ प्रकाशित होने लगी और लोग मुझे कवि के रूप में पहचानने लगे. उसके बाद मेरा पहला कविता संग्रह ‘अपने हिस्से का प्रेम’ भी विष्णु जी ने 2011 में सर्वनाम के 100 वें अंक के साथ प्रकाशित करवा दिए. फिर कवि-कथाकार और संपादक अनवर सुहैल जी ने अपनी पत्रिका ‘संकेत’ का एक अंक मेरी कविताओं पर केन्द्रित कर प्रकाशित किया. इस अंक की बहुत चर्चा हुई और इस तरह से मैं हिंदी कविता में आया.

प्रश्न : क्या कविता सामाजिक राजनीतिक रुपान्तरण की औजार बन सकती हैं?

जवाब : बिलकुल बन सकती हैं. आप दुनिया की तमाम महान क्रांतियों का इतिहास उठा कर देख लीजिए पायेंगे कि क्रांति से पहले क्रांति की तैयारी में जो आंदोलन हुए उनमें कविता और कवियों की भूमिका महत्वपूर्ण रही हैं.

चाहे महान रूसी क्रांति हों या फिर भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन हर जगह कविता की भूमिका महत्वपूर्ण रही है. यह सच है कि कविता खुद से कोई क्रांति या आन्दोलन को खड़ा नहीं कर सकती किन्तु सच यह भी है कि हर आन्दोलन में कवि और कविता की भूमिका अहम होती है. एक सशक्त – वैचारिक कविता लोगों के विचार को प्रभावित कर सकती है. उनकी सोच और दृष्टिकोण को बदल सकती है.

हम प्रत्येक जनांदोलन में देखते हैं कि दुनिया भर के महान कवियों के कविता की पंक्तियाँ जुलूस और जन सभाओं में लगी होती हैं. यदि मैं भारत के सन्दर्भ में कहूँ तो यहाँ आज भी जितने जनांदोलन चल रहे हैं उन सभी में कविताएं एक अहम औजार हैं. मुक्तिबोध, पाश, नागार्जुन, गोरख पाण्डेय आदि कवियों की कविताओं के साथ-साथ समकालीन भारतीय कवियों की प्रतिरोधी कविताएँ इन आंदोलनों में आज भी प्रयोग हो रहे हैं.

प्रश्न : लेखक प्रायः अपनी बात और लेखन में सुन्दर और सुन्दरता की चर्चा करते हैं।

आप के विचार में सुन्दरता क्या है? और यह कवि और कविता में किस तरह अभिव्यक्त होती है?

जवाब : पहली बात यह जानना चाहिए कि सुन्दरता क्या है? क्या सुन्दरता की कोई एक निर्धारित सार्वभौमिक परिभाषा है? सुन्दरता को देखने का हर व्यक्ति का अपना एक नज़रिया है. वह अपने हिसाब से सुन्दरता को गढ़ता और पढ़ता है. किन्तु कुछ चीजें प्राकृतिक रूप से सुंदर होते हैं. जैसे एक फूल, सूर्यास्त के समय क्षितिज पर फैले रंगों का अपना सौन्दर्य है. उसी प्रकार सागर में डूबते सूरज और भोर का आकाश हमें सुंदर लगता है. किन्तु यदि कोई जन्म से ही नेत्रहीन हैं, वह इन सुन्दरताओं का अनुभव नहीं कर पाता है. किन्तु वह किसी पक्षी की आवाज़ और मधुर संगीत की सुन्दरता को खूब महसूस कर सकता है. उससे बढ़ कर उसके लिए किसी स्पर्श का अहसास उसके लिए सबसे सुंदर हो सकता है. व्यक्ति जो आखों से देखता है वह सुन्दरता सबके लिए एक समान नहीं होता. हर कोई अपने हिसाब से उस सुन्दरता को देखता और अनुभव करता है. अनुभव जितना गहरा होता अभिव्यक्ति उतनी कठिन हो जाती है. ‘गूंगे का मीठा आम’ कहावत तो सुनी होगी आपने. देह और चेहरे की सुन्दरता स्थाई नहीं होती. अहसास, अनुभव और प्रेम की सुन्दरता स्थाई होती है. इसलिए कोई भी कवि या व्यक्ति किसी भी सुन्दरता को जितना महसूस और अनुभव कर पाता है उसे ही अभिव्यक्त करने की कोशिश करता है. यह अभिव्यक्ति कवि के शब्दकोश पर निर्भर होती है.

इस दुनिया में प्रेम से अधिक सुंदर कुछ भी नहीं. क्या प्रेम की सुन्दरता को अभिव्यक्त करना आसान काम है किसी के लिए?

इस दुनिया में त्वचा के रंग के आधार पर घृणा फैलायी जाती है. भेदभाव किया जाता है. ऐसे में सवाल है कि क्या काले रंग की अपनी सुन्दरता नहीं होती? यदि ऐसा होता तो काले रंग के लोगों से कोई प्रेम नहीं करता. इसलिए मेरा मानना है कि हर व्यक्ति अपने विवेक से सुन्दरता को मापता और महसूस करता है. व्यक्ति का मन और विचार जैसे–जैसे सुंदर होता जाता है वैसे–वैसे सुन्दरता का विस्तार होता जाता है.

प्रश्न : आप कविता किस परिस्थिति में लिखते हैं और लेखन की प्रक्रिया क्या है?

जवाब : मैं जबरन कविता लिखने की कोशिश नहीं करता, यदि कभी करता हूँ तो लिख नहीं पाता. ऊपर सुन्दरता के सवाल पर जो मैंने कहा यहाँ भी कुछ ऐसा ही होता है. मनुष्य में प्रेम, उदासी, घृणा, विद्रोह आदि विकास और विस्तार उसके अनुभव के आधार पर होता है. मैं बिना अहसास या अनुभव के बिना कुछ भी लिख नहीं पाता हूँ. लिखने के लिए मैं जबरदस्ती कोई संघर्ष नहीं करता. जब तक कोई बेचैनी नहीं होती तब तक कुछ नहीं लिख पाता मैं. मुझे लिखने के लिए एकांत चाहिए. मेरी जितनी भी कविताएं आपने पढ़ी हैं उन सब में आप यह महसूस कर सकते हैं. स्टीफन हाकिंग कवि नहीं एक महान अन्तरिक्ष वैज्ञानिक थे. उन्होंने ब्रह्माण्ड के बारे में जितना लिखा सब उनका शोध था. क्या कल्पना के दम पर कोई कवि अपनी कविता में यह सब कह पाता? नहीं.

वरिष्ठ कवि–लेखक विष्णु चन्द्र शर्मा अपने हर पत्र और बातचीत में मुझसे कहते –अपने दुःख से लड़ना सीखो. कवि का काम दुःख से टूटना नहीं, बल्कि उससे लड़ कर जीना है. तभी वह अपने पाठकों को जीवन का महत्त्व समझा सकता है. जीवन संघर्ष प्रक्रिया से गुजरते हुए ही मैं कुछ लिख पाता हूँ या यूँ कह लीजिए वे संघर्ष और अनुभव मुझसे लिखवा लेते हैं.

प्रश्न : क्या सुन्दर विचार होने से ही सुन्दर कविता बन सकती है?

जवाब : इसका जवाब मैं ऊपर दे चुका हूँ. सुंदर विचार को निजी व सार्वजानिक जीवन के व्यवहार में ला कर अच्छा इन्सान बना जा सकता है. किन्तु कौन सा विचार सुंदर है कौन सा नहीं यह हर व्यक्ति और वर्ग अपने हिसाब से तय करता है. उदाहरण के तौर पर यदि हम समाज और मनुष्यता की भलाई के लिए तानाशाही और अधिनायकत्ववादी सत्ता के विरोध में जन विद्रोह का विचार व्यक्त करें तो क्या सत्ता पक्ष उसे सुंदर विचार मानेगा? सुंदर कविता की कोई निर्धारित परिभाषा नहीं है. हर कवि को अपनी कविता सुंदर लगती है. किन्तु सुंदर कविता वही होती है जो पाठकों को सुंदर लगे. पाठकों का भी अपना-अपना सौन्दर्य बोध होता है.

विरह, पीड़ा, उदासी और क्रांति पर लिखी गईं अनेक सुंदर कविताएं हैं. ऐसे में पाठक–आलोचक इन कविताओं का आकलन और विश्लेषण अपने-अपने अनुसार करते हैं. किन्तु रचनाकार अपनी रचना को तो सुंदर ही मान कर चलता है. सुंदर विचार के साथ यदि कवि का शब्दकोश वृहद हो और अभिव्यक्ति की शैली सुंदर हों जो आम पाठक को प्रभावित कर सकें तब कविता सुंदर होती है.

प्रश्न : वर्तमान समग्र साहित्य लेखन और प्रगतिशील लेखन की अवस्था को आप किस तरह से देखते हैं?

जवाब : आप जानते होंगे अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना 1935 में लंदन में हुई। इसके प्रणेता सज्जाद ज़हीर थे. इसमें मुल्क राज आनंद की भी अहम भूमिका थी. जब इसकी स्थापना हुई तब इसका नाम ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव राइटर्स फ्रंट था. इसका पहला अखिल भारतीय अधिवेशन 9 अप्रैल 1936 को लखनऊ में हुआ था. यह लेखक समूह अपने लेखन से सामाजिक समानता का समर्थन करता था और कुरीतियों, अन्याय व पिछड़ेपन का विरोध करता था. प्रलेस में प्रेमचंद की भूमिका को कोई नहीं भुला सकता. इस संगठन का एक गौरवशाली इतिहास है. किन्तु आज तमाम लेखक संगठन जिस तरह के विवादों में फंस जाते है वह सब सुन कर दुःख होता है. इसलिए मैं इन संगठनों के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता.

जहाँ तक वर्तमान लेखन और लेखक का सवाल है तो मुझे लगता है कि आज के लेखकों में आत्ममुग्धता ज्यादा बढ़ गई है. लेखक संगठनों के भीतर और बाहर लेखकों का अलग–अलग गुट बन चुका है. कुछ लेखकों को छोड़ कर बाकी लेखकों ने जनांदोलनों से अपना नाता तोड़ लिया है. अधिकतर लेखकों के लेखन से शोषित, पीड़ित और सर्वहारा वर्ग की पीड़ा और संघर्ष गायब हो चुका है. कुछ ने सत्ता के प्रति अपनी वफ़ादारी के चलते तानाशाही सत्ता के खिलाफ़ चुप्पी साध ली है. ये सभी कमियां हिंदी साहित्य में सबसे अधिक आई हैं. यदि आपको याद हों तो कन्नड़ लेखक कलबुर्गी की हत्या के बाद भारत के अनेक लेखकों ने विरोध दर्ज करते हुए साहित्य अकादमी को अपने पुरस्कार वापस किया था. उन लेखकों को भारत की सत्ता और उससे जुड़े लोग ‘अवार्ड वापसी गैंग’ कह कर संबोधित करते हैं.

आज सोशल मीडिया और मोबाइल क्रांति के दौर में हर कोई खुद को लेखक समझने लगा है. दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि बाकी भारतीय भाषाओँ की तुलना में हिंदी में प्रतिरोध का जो स्वर उभर कर आना चाहिए था वह नहीं हुआ है. साहित्यिक सम्मेलन, आयोजन तो खूब हो रहे हैं किन्तु इस सभी आयोजनों में जिन लेखक और कवियों को बुलाया जाता है उनमें से अधिकतर का प्रतिरोधी साहित्य और जनांदोलन से दूर –दूर तक कोई वास्ता नहीं होता. वे ज्यादातर या तो बड़े-बड़े सरकारी पदों पर विराजमान हैं अथवा उन पदों से सेवामुक्त हैं. इसके बावजूद अनेक युवा लेखक अन्याय और शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध के नये तेवर के साथ उभर कर आये हैं. यह एक अच्छी बात है. खास बात यह है कि ये सभी किसी लेखक संगठन से जुड़े हुए नहीं हैं.

प्रश्न : आप के लेखन की राजनीति क्या है?

जवाब : इस सवाल का जवाब काफी हद तक मैं आपके पहले सवाल के जवाब में दे चुका हूँ. मैं अक्सर मुक्तिबोध को याद करते हुए खुद सवाल करता हूँ – पार्टनर मेरी पॉलिटिक्स क्या है?

जवाब आता है – मेरी पॉलिटिक्स शोषित, दमित सर्वहारा वर्ग की है, जल-जंगल और जमीन से विस्थापित कर दिए गये आदिवासियों के पक्ष में मेरी राजनीति है.

प्रश्न : आप का साहित्यिक जीवन में सब से अधिक प्रभाव किन लेखकों का है?

जवाब : प्रेमचंद, नागार्जुन, निराला, ब्रेख्त, टाल्सटाय, लू शुन, रूसो, मंटो, नाज़िम हिकमत, पाब्लो नेरूदा, नज़रुल, विष्णु चंद्र शर्मा, गोरख पाण्डेय, अदम गोंडवी रमा शंकर यादव ‘विद्रोही’ जैसे अनेक नाम हैं.

प्रश्न : वर्तमान भारतीय युवा लेखक कवियों की कमज़ोरी और सफलताएं क्या हैं आप की नज़र में ?

जवाब : मैं साहित्य का एक पाठक हूँ. इसलिए आपके इस सवाल का जवाब कोई विद्वान् आलोचक ही दे सकता है. मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि बहुत से नये लेखक उभर कर आये हैं और उनमें से बहुत से लोग बहुत बढ़िया लिख रहे हैं.

प्रश्न : क्या आप किसी संगठन और अभियान से जुडे हैं?

जवाब : मैं किसी लेखक संगठन का सदस्य नहीं हूँ. किन्तु मैं हर वाम और जनांदोलन में शामिल होने की कोशिश व समर्थन करता हूँ.

इन दिनों दिल्ली में जितने भी जनांदोलन हुए चाहे वह किसान-मजदूर आन्दोलन हों, जल जंगल और जमीन के अधिकार को ले कर आदिवासियों का आन्दोलन हों या फिर शिक्षा के अधिकार को को ले कर छात्रों का आन्दोलन अथवा पत्रकारों पर हो रहे हमले के खिलाफ कोई आन्दोलन हों, सभी में सक्रिय रूप में शामिल रहा हूँ.

प्रश्न : नेपाल और भारत पड़ोसी मुल्क हैं। दोनों देशों के जनस्तर में सामाजिक, आर्थिक और साँस्कृतिक सम्बन्ध भी प्रगाढ हैं। इसके वाबजूद भी भारतीय सत्ता के प्रति नेपाली जनता सशंकित रहते हैं। इसका क्या वजह हो सकता है?

जवाब : आपने एक बेहद अहम मुद्दे को उठाया है. नेपाल और भारत दो बेहद महत्वपूर्ण पड़ोसी देश हैं. हमारे सांस्कृतिक सम्बन्ध भी बहुत मजबूत हैं. इसके बावजूद आपने नेपाल के लोगों के मन में भारत के प्रति जिस संदेह का जिक्र किया उसके लिए नई दिल्ली और काठमांडू में बैठे राजनेता जिम्मेदार हैं. एक बात यहाँ साफ़ कर दूं कि नेपाल की जनता का संदेह भारत के लोगों के प्रति नहीं, सरकार के प्रति हो सकती है.

दोनों देशों की आम जनता में एक दूसरे के प्रति कोई संदेह या नफ़रत नहीं है. किन्तु भारत क्षेत्रफल में नेपाल से बड़ा और शक्तिशाली है तथा नेपाल की सीमाएं तीनों ओर से भारत से घिरी हुई है इसलिए भारत की सत्ता हमेशा नेपाल की राजनीति में हस्तक्षेप कर वहां की राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश करती है. जयपुर समायांतर साहित्य उत्सव के भारत-नेपाल कवि संवाद में इस विषय पर आपने जो बातें कहीं थी वह सत्य है. कम्यूनिस्ट आन्दोलन के द्वारा नेपाल में राजशाही की समाप्ति के बाद लोकतंत्र की स्थापना और संविधान का निर्माण नेपाल के साथ-साथ भारतीय उपमहाद्वीप के लिए एक महान घटना है. किन्तु जिसे मैं और आप महान कह रहे हैं जरुरी नहीं कि सभी हमसे सहमत हों.

नेपाल के नए संविधान के निर्माण में जिस तरह से भारत ने हस्तक्षेप करने का प्रयास किया और जब उसकी नहीं चली तो उसके बाद सीमा पर ट्रकों को रोक कर महीनों तक नेपाल का सप्लाई रोक दिया गया. यह नेपाली जनता के साथ एक बहुत बड़ा धोखा था. इसी तरह यहाँ के फिल्मों में चौकीदार के रूप में नेपाली को दिखाया जाता है. जबकि भारतीय सेना में सैकड़ों नेपाली जवान हैं. बहरहाल मैं केवल यह कह सकता हूँ कि दोनों देशों की आम जनता में एक –दूसरे के प्रति कोई संदेह या द्वेष नहीं है.

नेपाली जनता के मन में जो संदेह है उसके लिए काठमांडू और नई दिल्ली जिम्मेदार हैं. किसी भी देश द्वारा किसी भी दूसरे देश को उसके आकार के आधार पर छोटा और कमज़ोर मान कर उसकी स्वतंत्रता और संप्रभुता का अपमान नहीं करना चाहिए. हर देश का समान सम्मान होना चाहिए.

प्रश्न : भारत में क्रियाशील जनपक्षीय कहे जाने वाले राजनीतिक और बौद्धिक संगठनों में निहित आत्मसमीक्षा करने योग्य सब से बडी समस्या क्या देखते हैं?

जवाब : सवाल कठिन है. मेरी जो समझ है वह यह कहती है ऐसे संगठनों की समस्या है घमंड, आत्ममुग्धता, गुटबाजी और सत्ता के करीब आने की लालसा.

प्रश्न : हम इस समय तुलनात्मक रुप से विपर्यास और विरोधाभास से भरे हुए समय में जी रहे हैं। एक ओर प्रतिक्रियावादी ताकतें मौजूद हैं और दूसरी तरफ क्रान्ति के नाम में क्रान्ति का कारोबार भी बहुत पनप रहा है। हम किस तरह खडे हों? ताकि दूर तक तमाम व्यवधानों के बाबजूद आगे बढ सकें?

जवाब : यह एक बहुत जरुरी मुद्दा उठाया आपने. इसका जवाब यह हो सकता है कि सबसे पहले इनकी पहचान कर जनता के सामने इनको बेनकाब करें. इनके किसी भी झांसे में आने से खुद को बचा कर रखें और अपना मार्ग ख़ुद तय करें. एक बात तो तय है कि छद्म रूप में कोई भी बहुत दिनों तक छिप कर नहीं रह सकता. एक न एक दिन उनका सच सबके सामने आ ही जाता है. हमारा काम है लोगों तक कारगर और असरदार तरीके से सच को ले जायें. इसके अलावा और कोई रास्ता है क्या?

प्रश्न : उपभोक्तावाद की चकाचौंध भरी इस दुनिया में हमारी सचेतन प्रयत्न क्या होनी चाहिए जो हमारी युवा पीढ़ी की प्रतिरोधी चेतना को आगे बढा सकें?

जवाब : यह एक वैश्विक और जटिल समस्या है हमारे समय की. आज युवाओं पीढ़ी के बड़े हिस्से ने क्लासिक व क्रांतिकारी साहित्य पढ़ना छोड़ दिया है. पूंजीवादी ताकतों को भी ऐसी आवाम की जरुरत है जो सवाल न करें, आज दुनिया भर की तमाम सत्ताएं पूंजीवाद द्वारा नियंत्रित होती हैं. लेनिन, स्टालिन, माओ त्से तुंग आदि के साहित्य पढ़ने वालों को नक्सलवादी करार दिया जाता है. उन्हें विकास विरोधी कहा जाता है. सस्ते इन्टरनेट और मोबाइल के इस युग में गलत सन्देश फैलाना बहुत आसान हो गया है. भारत में बीते दिनों में सोशल मीडिया और व्हाट्स एप के जरिये ग़लत व भड़काऊ सन्देश फ़ैलाने के कारण हिंसा की बहुत घटनाये हुई हैं. उपभोक्तावाद ने लोगों की सोचने की शक्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है. उपभोक्तावाद के कारण ही दुनिया भर में गरीब जनता और किसान –मजदूर का शोषण भी तेज हुआ है. ऐसे में युवा पीढ़ी के लिए चिंतित होना स्वाभाविक है. इससे बचने का उपाय यह है कि तमाम डिजिटल माध्यमों के जरिये युवा पीढ़ी तक सही ज्ञान का प्रचार किया जाये. अच्छे साहित्य के प्रति उनकी रूचि बढ़ाने का काम किया जाये. उनसे सम्वाद किया जाये. किन्तु इस काम में अभिभावक और स्कूल की भूमिका महत्वपूर्ण है. बिना उनके सहयोग के यह बहुत कठिन होगा.

प्रश्न : आप को जीवन अनुभव से प्राप्त सबसे बडी शिक्षा क्या है?

जवाब : अपने दुःख से लड़ना और संघर्ष कर जीना ही जीवन है. कठिनाई से हार कर अपने उसूलों और विचारधारा से समझौता कर लेना कमजोरी है.

प्रश्न : कोई ऐसा सन्देश जो आप नेपाली पाठको को देना चाहते हैं?

जवाब : नेपाल एक सुंदर देश है. नेपाल में मेरे अनेक मित्र हैं. नेपाल के पाठकों से जोडने मे समकालीन तीसरी दुनिया पत्रिका की सराहनीय भूमिका रही है. नेपाल के अनेक कवियों को मैंने पढ़ा और उनसे प्रभावित हुआ हुआ हूँ. मैं नेपाल से प्यार करता हूँ. वहां के अपने मित्रों के प्रति आभार और प्यार भेंट करता हूँ.

नोट:- यह साक्षात्कार एक वर्ष पहले लिया गया था!

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