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संतन को कहा सीकरी सो काम ;डॉ० प्रोफेसर टी० के० लहरी,

— अरूण प्रधान

वाराणसी। बात कितनी महत्वपूर्ण होगी यह तो समय बताता है और समय के बीत जाने के बाद वह घटना मानवसमाज के नैतिक इतिहास में उदाहरण बना रहता है. यहाँ हम जिनकी चर्चा बेसमय कर रहे हैं, वह भी यही है. आज के कोरोना काल में चिकित्सा और कुछ चिकित्सकों की कुछ काली सच्चाई धीरे-धीरे सामने आ रही है, बाकि भी समय-समय पर आ जाएगी!

जिस घटना पर जिन्हें हम महापुरुष या संत कहते हैं वह व्यक्ति वास्तव में बड़ा ही साधारण और सामान्य सा काम करता रहता है. हम वह क्यूँ नहीं कर पाते हैं या …? यहाँ सामाजिक, आर्थिक, व्यक्तित्व, मानवशास्त्र, राजनितिशास्त्र आदि से जुड़े कई सवाल हो सकते हैं! मुनाफे-घाटे और सामाजिक-न्याय की दुनियादारी के समाज में यह सन्दर्भ यहाँ जोड़ रहा हूँ वाराणसी के एक डॉक्टर प्रोफ़ेसर टी० के० लहरी से जिनकी उम्र लगभग 79 वर्ष है.

आधुनिक ‘संतों’ का नये जमाने की ‘सीकरियों’ में हमेशा ही जमावड़ा बना रहता है. जबकि मुग़ल सम्राट अकबर ने कवि कुंभनदास को जब अपनी राजधानी फतेहपुर सीकरी (सन 1570-1585 ईस्वी) में आमंत्रित किया, तो कवि ने सम्राट के दूत को कहला भेजा –
” संतन को कहा सीकरी सो काम,
आवत जात पनहियाँ टूटी,
बिसरि गयो हरि नाम!
जिनको मुख देखे दुःख उपजत,
तिनको करिबे परी सलाम! ”
(भावार्थ यह कि संतों को ‘सीकरी’ से यानी राजधानी से भला क्या काम? वहां आते-जाते ‘पनहियाँ’ यानी चप्पलें टूट गयी और मैं हरि का नाम लेना भूल गया! वहां तो जिन लोगों का मुखड़ा देखकर दुःख उपजने लगता है, हमें उनको भी सलाम करना पड़ता है!)
कुंभनदास हिन्दी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल के कवि माने जाते हैं. वह धन-दौलत और मान-सम्मान की लालसा से कोसों दूर रहते थे.

सीएम योगी आदित्यनाथ बीजेपी के संपर्क टू समर्थन के तहत पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी गए थे. वहां उनसे एक डॉक्टर ने मिलने से मना कर दिया. ये घटना 10 जून 2018 की है और सोशल मीडिया में वायरल रही.

खुद को अजेय बनाने के लिए 2019 लोकसभा चुनाव की तैयारियों के लिए भारतीय जनता पार्टी देशभर में संपर्क टू समर्थन अभियान चला रही थी. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की तरफ से शुरू हुआ यह अभियान उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आगे बढ़ा रहे थे. इस क्रम में योगी आदित्यनाथ अपने दो दिवसीय दौरे पर वाराणसी पहुंचे और 10 जून की सुबह यानी रविवार को शहर के अलग-अलग इलाकों में प्रबुद्धजनों से इस अभियान के तहत उनके घर पर मिल रहे थे. लेकिन सत्ता के विजय अभियान को वास्तविक संत एक डॉक्टर प्रोफेसर टी० के० लहरी ने झटका दे दिया था.

वह डॉक्टर बीएचयू के प्रोफेसर टी के लहरी थे. जिनसे योगी आदित्यनाथ को उनके घर पर मुलाकात करनी थी. लेकिन डॉक्टर लहरी ने यह कहकर मुलाकात से इंकार कर दिया कि यदि एक पेशेंट के तौर पर मिलना है तो अस्पताल के ओपीडी में मिले ना कि घर पर. जिसके बाद आनन-फानन में टी के लहरी का नाम हटाकर प्रोफेसर सरोज चूड़ामणि का नाम डाला गया था. मुख्यमंत्री ने कहा था कि “वे चाहते तो डॉ लहरी से उनके ओपीडी में मिल सकते थे लेकिन वीवीआईपी की वजह से वहां मरीजों के लिए असुविधा पैदा हो सकती थी”.

इस मामले पर बि० एच० यु० के रिटायर्ड हो चुके डॉक्टर प्रोफेसर टी के लहरी ने कहा था कि “मैं बहुत छोटा आदमी हूं, मुख्यमंत्री मुझसे मिलकर क्या करेंगे? मैंने इनकार नहीं किया. मैंने तो यह कहा कि मैं डॉक्टर हूं यदि वह मुझसे मिलना चाह रहे हैं तो एक पेशेंट के तौर पर अस्पताल के ओपीडी में मिले ना कि मेरे घर पर.”

लोगों का निःशुल्क इलाज करने वाले बीएचयू के जाने-माने कार्डियोथोरेसिक सर्जन पद्म श्री डॉ तपन कुमार लहरी को किसी भी दिन शहर के अन्नपूर्णा होटल में पच्चीस रुपए की थाली का खाना खाते हुए देखा जा सकता है. इसके साथ ही वह आज भी बीएचयू में अपनी चिकित्सा सेवा निःशुल्क जारी रखे हुए हैं. डॉ लहरी को आज भी एक हाथ में बैग, दूसरे में काली छतरी लिए हुए पैदल घर या बीएचयू हास्पिटल की ओर जाते हुए देखा जा सकता है.

इससे पहले डॉ लहरी तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को भी इसी तरह न मिलने का दो टूक जवाब दे चुके हैं. सचमुच ‘धरती के भगवान’ जैसे डॉ लहरी वह चिकित्सक हैं, जो वर्ष 1994 से ही अपनी पूरी तनख्वाह गरीबों को दान करते रहे हैं. अब रिटायरमेंट के बाद उन्हें जो पेंशन मिलती है, उसमें से उतने ही रुपए लेते हैं, जिससे वह दोनो वक्त की रोटी खा सकें. बाकी राशि बीएचयू कोष में इसलिए छोड़ देते हैं कि उससे वहां के गरीबों का भला होता रहे. वह इतने स्वाभिमानी और अपने पेशे के प्रति इतने समर्पित रहते है कि कभी उन्होंने बीएचयू के बीमार कुलपति को भी उनके घर जाकर देखने से मना कर दिया था.

ऐसे ही डॉक्टर को भगवान का दर्जा दिया जाता है. तमाम चिकित्सकों से मरीज़ों के लुटने के किस्से तो आए दिन सुनने को मिलते हैं, इस कोरोना महामारी के समय में भी कुछ डॉक्टरों और अस्पतालों की लूट जारी है. अपनी इस सेवा के लिए डॉ. लहरी को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2016 में चौथे सर्वश्रेष्ठ नागरिक पुरस्कार ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया जा चुका है. वर्ष 1941 के 1 मार्च को कोलकाता में जन्में डॉ लहरी ने सन् 1974 में प्रोफेसर के रूप में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अपना करियर शुरू किया था और आज भी वह बनारस में किसी देवदूत से कम नहीं हैं. बनारस में उन्हें लोग साक्षात भगवान की तरह जानते-मानते हैं. जिस ख्वाब को संजोकर मदन मोहन मालवीय ने बीएचयू की स्थापना की, उसको डॉ लहरी आज भी जिन्दा रखे हुए हैं. अमेरिका से डॉक्टरी की पढ़ाई करने के बाद 1974 में वह बीएचयू में 250 रुपए महीने पर लेक्चरर नियुक्त हुए थे. गरीब मरीजों की सेवा के लिए उन्होंने शादी तक नहीं की. सन् 1997 से ही उन्होंने वेतन लेना बंद कर दिया था. उस समय उनकी कुल सैलरी एक लाख रुपए से ऊपर थी. रिटायर होने के बाद जो पीएफ मिला, वह भी उन्होंने बीएचयू के लिए छोड़ दिया.

वर्ष 2003 में बीएचयू से रिटायरमेंट के बाद से भी उनका नाता वहां से नहीं टूटा है. आज, जबकि ज्यादातर डॉक्टर चमक-दमक, ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं. मामूली कमीशन के लिए दवा कंपनियों और पैथालॉजी सेंटरों से सांठ-गांठ करते रहते हैं. वहीँ मेडिकल कॉलेज में तीन दशक तक पढ़ा-लिखाकर सैकड़ों डॉक्टर तैयार करने वाले डॉ लहरी के पास खुद का चारपहिया वाहन नहीं है. उनमें जैसी योग्यता शोहरत और इज्जत है, चाहते तो वह भी आलीशान हास्पिटल खोलकर करोड़ों की कमाई कर सकते थे. लेकिन वह नौकरी से रिटायर होने के बाद भी स्वयं को मात्र चिकित्सक के रूप में गरीब-असहाय मरीजों का सामान्य सेवक बनाए रखना चाहते हैं.

डॉ लहरी जितने अपने पेशे के साथ प्रतिबद्ध हैं, उतने ही अपने समय के पाबंद भी हैं. आज उनकी उम्र लगभग 75 साल हो चुकी है, उन्हें देखकर बीएचयू के लोग अपनी घड़ी की सूइयां मिलाते हैं. वे हर रोज नियत समय पर बीएचयू आते हैं और जाते हैं. रिटायर्ड होने के बाद विश्वविद्यालय ने उन्हें इमेरिटस प्रोफेसर का दर्जा दिया था. वह वर्ष 2003 से 2011 तक वहाँ इमेरिटस प्रोफेसर रहे. इसके बाद भी उनकी कर्तव्य निष्ठा को देखते हुए उनकी सेवा इमेरिटस प्रोफेसर के तौर पर अब तक ली जा रही है. जिस दौर में लाशों को भी वेंटीलेटर पर रखकर बिल भुनाने से कई डॉक्टर नहीं चूकते, उस दौर में इस देवतुल्य चिकित्सक की कहानी किसी भी व्यक्ति को श्रद्धानत कर सकती है. वाराणसी के लोग उन्हें महापुरुष कहते हैं.
20/07/2020

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