अपराध

“अपराधी ख़त्म पर कानून कि साख दाव पर “

अपराधी के खत्म होने से क्या अपराध खत्म कर पाई कानून व्यवस्था ?

उन 8 पुलिसकर्मियों सहित उन तमाम लोगों को अब भी न्याय नही मिला जिनकी हत्या विकास दुबे ने की थी, असली इंसाफ तब होता जब सफेदपोश किरदार में छुपे गद्दार नेता औऱ उच्चस्तरीय पदों पर बैठे खाफी वर्दी से गद्दारी करने वालो का इतिहास सामने आता, दरअसल पूरा सिस्टम ही ऊपर से नीचे तक भ्रष्ट है, कोई भी गैंगस्टर बिना पुलिस और नेताओ की मदद से गैंगस्टर नही बनता,

ये मत सोचिए कि विकास दुबे के एनकाउंटर से अपराध ख़त्म हो गया, बल्कि अपराध छिप गया।

अगर इन 8 पुलिसकर्मियों की जगह किसी आम नागरिक को मारा होता तो ये मामला दब जाता हर बार की तरह विकास दुबे आज़ाद घूम रहा होता, 8 पुलिसवाले थे इसलिए ये मामला मीडिया में उछल गया, जान कि कीमत सबके लिए एकसमान होती है तो न्याय में भेदभाव क्यों ? पुलिस के जवान भर्ती से पहले स्पेशली ट्रेंड किये जाते है ताकि वो आपराधिक गतिविधियों से निपट सकें, तो फिर क्यों आजतक इस विकास दुबे पर लगाम लगाने में यूपी पुलिस असमर्थ थी, या ये कहें कि खाकी का फर्ज अदा करने की नियत नही थी, इन्ही की छूट पर ऐसे गैंग्स्टर 30 सालों तक राज कर जाते है, और नेताओं के लिए पुलिस कठपुतली है,

पुलिस द्वारा कभी रेपिस्टों के एनकाउंटर नही सुने, निर्भया केस को ही देख लीजिए, निर्भया को न्याय मिलने में लगभग 7 वर्ष लग गए, निर्भया की माँ ने कितने कोर्ट के चक्कर काटे न्याय के लिये, अगर ऐसे रेपिस्ट एनकाउंटर में मरते तो कम से कम सालों तक न्याय के लिए चक्कर न काटने होते,

दूसरी तरफ विकास दुबे जिसके मुँह से बड़े बड़े सच उगलवाने थे उसका एनकाउंटर कर दिया ताकि नेताओं के नाम सामने न आये, न ही पुलिस प्रशासन पर कोई आरोप लगे, कानपुर मुठभेड़ केस में सबका एनकाउंटर कर डाला, अरे किसी को तो ज़िंदा रखते ताकि सच्चाई सामने आती,

दोहरा रवैया ?

सपना
12 -7-2020

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