अंतर्राष्ट्रीय खबरे

नेपाल ‘भविष्य स्थायी संकट में’

यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि भारत और इसके पड़ोसी देशों के साथ के विवादों को सुलझाने में मदद के उलट इनके बीच संघर्षों को और गहरा तथा घना करने में चीन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

फ़िलहाल चीन प्रसारित कोरोना से दुनिया भर में इंसानों को मौत निगल रही है और इंसानों के बीच शारीरिक के साथ एक सामाजिक दूरी उभर आई है. जो कि दुनिया भर में नस्ल, रंग, भाषाई और धार्मिक, तो भारत में जातीय और धार्मिक तौर पर प्रमुखता में पहले से मौजूद है.

नेपाल अपने माओवादी क्रांति के दौर से गुजरता हुआ राजशाही को उलट कर लोकतान्त्रिक राष्ट्र बन गया. नेपाली लोकतान्त्रिक राष्ट्र का मुखिया बनने के लिए माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड कई जोड़तोड़ करते रहे. नेपाल में सर्वहारा राज के लक्ष्य के रास्ते में लोकतंत्र एक पड़ाव है.

राजशाही से मुक्ति दिलाकर नेपाल को एक उन्नत लोकतान्त्रिक देश बनाने का एक बड़ा उदाहरण उनके सामने कथित माओवादी कम्युनिस्ट देश चीन है. शायद नेपाली नेताओं ने इसी कारण चीन से दोस्ती गाढ़ी बनाई है. और, पड़ोसी भारत के साथ कई नए विवादों को इसी आलोक में गढ़ा गया है.

नेपाली क्रांति के बाद कई प्रयासों में “प्रचंड” की कोशिशों के फलस्वरूप एमाले पार्टी के साथ मिलकर एक स्थायी लोकतान्त्रिक सरकार नेता केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में बनी. एमाले और माओवादियों का भी क्रांति के दौरान भारत के कम्युनिस्ट पार्टियों और नेताओं के साथ बहुत गाढ़े रिस्ते रहे और मदद भी, और चीन के साथ भी.

समय आगे बढ़ रहा है. पूंजीवाद अपने मूल चेहरे और चरित्र के साथ कम्युनिस्ट पार्टी के बैनर में भी दुनिया में अपना बाज़ार का बिस्तर सजा चुका है और नेपाल में कम्युनिस्ट बैनर वाला चीन भी इसी रूप में है.

नेपाली जनता के जीवन के रोज व् रोज की समस्याएँ घनी होती जा रही है. बेरोजगारी, मंहगाई, शिक्षा, स्वस्थ आदि के आभाव से आनेवाली नेपाली नौजवानों की नयी पीढ़ी के सामने अंधकार और भी घना होता जा रहा है.

नेपाली नेता केपी शर्मा ओली की भारत के साथ बढ़ाते राजनीतिक विवाद यह बताने के लिए काफी है कि उनके सामने नेपाली जनता को और नेपाल राष्ट्र को उन्नत बनाने की न तो कोई योजना है और न ही दृष्टि.

इतिहास बताता है कि जब एक राष्ट्र की सरकार और उसको चलाने वाली पार्टी व नेता के सामने अपने देश की जनता को उज्जवल भविष्य की दिशा में आगे ले जाने की राजनितिक दृष्टि ख़त्म हो जाती है, तब राष्ट्र और अपनी जनता को पड़ोसी देश के खिलाफ और अपने राष्ट्र में भाषा, जाति, धार्मिक आदि जैसे विवादों की दिशा में मोड़ देना सबसे आसान विकल्प होता है. यही आसान विकल्प नेपाली जनता के लिए श्री केपी शर्मा ओली ने भी चुना है.

—- अरुण प्रधान (07 जुलाई 2020)
(फोटो गूगल Google से साभार)

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